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Noida News: ताजगंज में बिक गए रास्ते, खेल मैदान और श्मशान
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आगरा। ताजगंज में सरकारी सड़क व रास्ते, खेल मैदान से लेकर श्मशान तक बिक गए। सरकारी जमीन पर निर्माण कर लिया गया। यह सब ताजमहल के साये में एक ट्रस्ट की आड़ में होता रहा। शिकायतों पर जिम्मेदार आंखें मूंदे रहे। क्षेत्रीय लोगों ने न्याय के लिए हाईकोर्ट में गुहार लगाई। सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने नगर निगम को दो महीने में जांच कर अवैध कब्जे हटाने के आदेश दिए हैं।
मामला मौजा बसई का है, जो स्मार्ट सिटी क्षेत्र घोषित है। क्षेत्रीय निवासी वीरेश राठौर और दीपक राजपूत ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें कहा कि गाटा संख्या 679, 670, 1087, 1436, 1646 में सार्वजनिक प्रयोग की भूमि वृंदावन के एक ट्रस्ट ने पट्टे की आड़ में बेच दी। इस भूमि का स्वामित्व नगर निगम के पास है। सरकारी रिकार्ड में भूमि श्रेणी 15(2) यानी सार्वजनिक मार्ग में दर्ज है। सेल्फी प्वाइंट के पास खेल मैदान और बसई में गाटा 1636 में 1500 वर्ग मीटर श्मशान भूमि भी बिक गई।
लेखपाल, तहसीलदार, आरआई पर सवाल
इस मामले में नगर निगम अधिकारी, राजस्व निरीक्षक से लेकर तहसीलदार, लेखपाल की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने ट्रस्ट से हुए पट्टा विलेख साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किए। इसमें एक हजार रुपये वार्षिक किराए पर 30 साल के पट्टे किए गए थे। सुनवाई के बाद 17 अक्तूबर को हाईकोर्ट ने नगरायुक्त को आदेश दिए हैं कि नगर निगम एक्ट की धारा 272 के तहत सार्वजनिक भूमि को दो माह में जांच कर कब्जा मुक्त कराया जाए।
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सरकारी रिकॉर्ड में किया गया खेल
याचिकाकर्ता वीरेश ने बताया कि ट्रस्ट के पास मौजा बसई में 1845 बीघा की जमींदारी थी। 1950 में जमींदारी उन्मूलन के बाद जो आसामी किसान थे, उन्होंने 10 फीसदी फ्री होल्ड शुल्क दिया और करीब हजार बीघा जमीन उनके नाम चढ़ गई। बाकी करीब 800 बीघा जमीन ट्रस्ट के नाम रही। फिर चकबंदी में आम रास्ते, खेल मैदान, श्मशान व अन्य सार्वजनिक प्रयोग की भूमि का बंदोबस्त सरकार के नाम हो गया। लेकिन, सरकारी रिकार्ड में खेल हुआ। आरोप है कि नगर निगम व तहसील अधिकारियों की मिलीभगत से चकबंदी के बाद भी भूमि का मालिकाना हक ट्रस्ट के पास रहा। इसकी आड़ में ट्रस्ट से मिलकर भूमाफिया ने सार्वजनिक भूमि के बंदरबांट का खेल रचा।
200 बीघा भूमि पर हो गए कब्जे, खड़े निर्माण
- ताजगंज वार्ड से नगर निगम के पूर्व पार्षद अरुण प्रकाश ने बताया कि करीब 200 बीघा सरकारी भूमि अवैध ढंग से बेची गई है। इस पर दुकान, मकान से लेकर तमाम निर्माण खड़े हो गए। सैकड़ों अवैध कब्जे हैं। नगर निगम और तहसील के अधिकारियों की सांठगांठ से यह फर्जीवाड़ा हुआ है।
उच्च अधिकारियों को करते रहे गुमराह
- नगला डीम निवासी याचिकाकर्ता दीपक राठौर ने बताया कि कि सीएम हेल्पलाइन, मंडलायुक्त, डीएम से लेकर नगरायुक्त व एसडीएम तक 20 से अधिक प्रार्थना पत्र दिए। जिम्मेदार जांच के नाम पर उच्च अधिकारियों को गुमराह करते रहे। जब, सरकारी तंत्र से न्याय की आस टूट गई, तब हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
टीम से कराएंगे जांच
- मामला संज्ञान में आया है। जांच के लिए टीम गठित होगी। न्यायालय के आदेश का अनुपालन होगा। सरकारी भूमि को कब्जा मुक्त कराएंगे। - अंकित खंडेलवाल, नगरायुक्त
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मामला मौजा बसई का है, जो स्मार्ट सिटी क्षेत्र घोषित है। क्षेत्रीय निवासी वीरेश राठौर और दीपक राजपूत ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की। इसमें कहा कि गाटा संख्या 679, 670, 1087, 1436, 1646 में सार्वजनिक प्रयोग की भूमि वृंदावन के एक ट्रस्ट ने पट्टे की आड़ में बेच दी। इस भूमि का स्वामित्व नगर निगम के पास है। सरकारी रिकार्ड में भूमि श्रेणी 15(2) यानी सार्वजनिक मार्ग में दर्ज है। सेल्फी प्वाइंट के पास खेल मैदान और बसई में गाटा 1636 में 1500 वर्ग मीटर श्मशान भूमि भी बिक गई।
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लेखपाल, तहसीलदार, आरआई पर सवाल
इस मामले में नगर निगम अधिकारी, राजस्व निरीक्षक से लेकर तहसीलदार, लेखपाल की भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता ने ट्रस्ट से हुए पट्टा विलेख साक्ष्य के तौर पर प्रस्तुत किए। इसमें एक हजार रुपये वार्षिक किराए पर 30 साल के पट्टे किए गए थे। सुनवाई के बाद 17 अक्तूबर को हाईकोर्ट ने नगरायुक्त को आदेश दिए हैं कि नगर निगम एक्ट की धारा 272 के तहत सार्वजनिक भूमि को दो माह में जांच कर कब्जा मुक्त कराया जाए।
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सरकारी रिकॉर्ड में किया गया खेल
याचिकाकर्ता वीरेश ने बताया कि ट्रस्ट के पास मौजा बसई में 1845 बीघा की जमींदारी थी। 1950 में जमींदारी उन्मूलन के बाद जो आसामी किसान थे, उन्होंने 10 फीसदी फ्री होल्ड शुल्क दिया और करीब हजार बीघा जमीन उनके नाम चढ़ गई। बाकी करीब 800 बीघा जमीन ट्रस्ट के नाम रही। फिर चकबंदी में आम रास्ते, खेल मैदान, श्मशान व अन्य सार्वजनिक प्रयोग की भूमि का बंदोबस्त सरकार के नाम हो गया। लेकिन, सरकारी रिकार्ड में खेल हुआ। आरोप है कि नगर निगम व तहसील अधिकारियों की मिलीभगत से चकबंदी के बाद भी भूमि का मालिकाना हक ट्रस्ट के पास रहा। इसकी आड़ में ट्रस्ट से मिलकर भूमाफिया ने सार्वजनिक भूमि के बंदरबांट का खेल रचा।
200 बीघा भूमि पर हो गए कब्जे, खड़े निर्माण
- ताजगंज वार्ड से नगर निगम के पूर्व पार्षद अरुण प्रकाश ने बताया कि करीब 200 बीघा सरकारी भूमि अवैध ढंग से बेची गई है। इस पर दुकान, मकान से लेकर तमाम निर्माण खड़े हो गए। सैकड़ों अवैध कब्जे हैं। नगर निगम और तहसील के अधिकारियों की सांठगांठ से यह फर्जीवाड़ा हुआ है।
उच्च अधिकारियों को करते रहे गुमराह
- नगला डीम निवासी याचिकाकर्ता दीपक राठौर ने बताया कि कि सीएम हेल्पलाइन, मंडलायुक्त, डीएम से लेकर नगरायुक्त व एसडीएम तक 20 से अधिक प्रार्थना पत्र दिए। जिम्मेदार जांच के नाम पर उच्च अधिकारियों को गुमराह करते रहे। जब, सरकारी तंत्र से न्याय की आस टूट गई, तब हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई।
टीम से कराएंगे जांच
- मामला संज्ञान में आया है। जांच के लिए टीम गठित होगी। न्यायालय के आदेश का अनुपालन होगा। सरकारी भूमि को कब्जा मुक्त कराएंगे। - अंकित खंडेलवाल, नगरायुक्त