जरा याद करो कुर्बानी : मैनपुरी कांड के बाद रामपुर जागीर में बिस्मिल ने ली थी शरण
क्रांतिकारी शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का ग्रेटर नोएडा से गहरा संबंध रहा है। मैनपुरी कांड के बाद उन्होंने यहीं शरण ली थी और यहां वह ग्रामीणों की गाय और बकरियां चराते थे, जिसके बदले उन्हें खाना और रहने की जगह मिलती थी। यहां वह चार माह तक भेष बदलकर रुके थे और यहीं पर उपन्यास मन की लहर की रचना की थी।
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सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है। देखना है जोर कितना, बाजू-ए कातिल में है।
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां, हम अभी से क्या बताएं, क्या हमारे दिल में है।
देश के लिए फांसी पर चढ़ने से एक दिन पहले अपने मित्र को कुछ यूं पत्र लिखने वाले क्रांतिकारी शहीद रामप्रसाद बिस्मिल का ग्रेटर नोएडा से गहरा नाता रहा था। साल 1918 में मैनपुरी कांड के बाद ग्रेटर नोएडा के रामपुर जागीर गांव में लगभग चार माह तक शरण ली थी। यहां वह भेष बदलकर ग्रामीणों की गाय और बकरियां चराते थे। यहीं रहकर उन्होंने उपन्यास मन की लहर की रचना की थी।
मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में जन्मे बिस्मिल ने यूपी शाहजहांपुर में पढ़ाई की थी। किशोरावस्था पार करते ही वह बाद स्वतंत्रता आंदोलन में कूद पड़े। उन्होंने संगठन बनाकर अंग्रेजों की खिलाफत शुरू कर दी थी। औरेया के शिक्षक गेंदालाल दीक्षित के साथ मिलकर देशवासियों के नाम संदेश (मैनपुरी की प्रतिज्ञा के नाम से चर्चित) मैनपुरी कस्बे में जगह-जगह पर्चे छापकर चिपकाए थे। मैनपुरी कांड में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ हल्ला बोलने वाले बिस्मिल और गेंदालाल के पीछे पुलिस पड़ गई थी। जिस समय पुलिस उन्हें मैनपुरी में ढूंढ रही थी उस दौरान वह दिल्ली के कांग्रेस अधिवेशन में किताबें बेच रहे थे। दिल्ली-आगरा के रास्ते अंग्रेजों से लूट की तैयारी कर रहे बिस्मिल और गेंदालाल पर पुलिस टीम ने हमला कर दिया। गोलियों की बौछारों के बीच बिस्मिल यमुना में कूद पड़े। कुछ देर तक पानी से बाहर नहीं निकलने पर अंग्रेजों ने उन्हें मृत समझ लिया। जबकि गेंदालाल को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था।
पुलिस से भिड़ंत की जगह से करीब 30 किमी तक पैदल चलकर ग्रेटर नोएडा बीटा-1 (उस दौरान बुलंदशहर) के रामपुर जागीर गांव आ गए। यमुना और हिंडन नदी के बीच में बसे गांव में उन्होंने शरण ली। उस दौरान बारिश का मौसम था। ऊंचाई पर बसा होने की वजह से आसपास के इलाके में केवल यही गांव बाढ़ में नहीं डूबता था। गांव और आसपास क्षेत्र में अधिकतर नीम और बबूल के पेड़ थे। पैदावार कम होने के आबादी कम थी। बिस्मिल भेष बदलकर यहां रहने लगे। ग्रामीणों की गाय और बकरियां चराने के एवज में उन्हें खाना और सिर छुपाने की जगह मिल गई थी। यहीं उनकी मुलाकात क्रांतिकारी कोतवाल धन सिंह गुर्जर, राव उमराव सिंह गुर्जर और विजय सिंह पथिक से हुई। यहीं वह अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर योजनाएं बनाया करते थे। उपन्यास ‘मन की लहर’ की रचना के साथ ही उन्होंने दो बंगाली किताबों का हिंदी अनुवाद भी किया था।
जहां बिस्मिल ने ली थी शरण वहां आज है गैराज और निजी स्कूल
जिस स्थान पर वह रुके थे वहां आज कारों का गैराज और एक निजी स्कूल बना है। बीटा-1 निवासी और इतिहास के जानकार मदनलाल क्रांत इन तथ्यों की पुष्टि करते हुए बताते हैं कि यह हमारे लिए बेहद गौरव की बात है कि बिस्मिल यहीं रहे थे। वह कहते हैं कि हम सभी को बिस्मिल की स्मृतियों को स्थायी करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रशासन और प्राधिकरण इस ओर गंभीर नहीं है।
वर्ष 2006 में ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने बनवाया पार्क
स्थानीय लोगों की मांग पर ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने वर्ष 2006 में अमर शहीद पंडित राम प्रसाद बिस्मिल पार्क बनवाया था। हालांकि बीटा-1 निवासी मूर्तिकार पीपी रंजन ने इस पार्क में उनकी मूर्ति बनाने का भी प्रस्ताव दिया है। उनका कहना है कि यह उनकी ओर से क्रांतिकारी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।