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राममंदिर ट्रस्ट को घेरने की कोशिशों को झटका: रजिस्ट्री के एक माह बाद तहसीलदार ने दी क्लीनचिट, यहां से शुरू हुई थी गड़बड़ी
Fri, 18 Jun 2021 08:30 AM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
Published by: शाहरुख खान
Updated Fri, 18 Jun 2021 08:30 AM IST
सार
वक्फ डीड के परीक्षण का हवाला देते हुए तहसीलदार ने लिखा है कि जिन पुराने नंबरों से नए नंबर का दावा किया जा रहा है, वह गलत है। वक्फ की जमीन के पुराने गाटा संख्या 271, 272, 273, 274, 275,276 व 277 का कोई भी क्षेत्रफल नई गाटा संख्याओं 242, 243,244, 246 में शामिल नहीं है। बल्कि इसका गाटा संख्या 256, 257,258, 259. 260 और 262 है।
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श्रीरामजन्म भूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की ओर से खरीदी गई भूमि
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
97 साल पुराने वक्फ डीड के आधार पर श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को घेरने की तैयारी कर रहे लोगों को झटका लगा है। रजिस्ट्री के एक माह बाद हरीश पाठक और कुसुम पाठक के पक्ष में हुए नामांतरण में सभी आरोप खारिज कर दिए गए।
वक्फ डीड के परीक्षण का हवाला देते हुए तहसीलदार ने लिखा है कि जिन पुराने नंबरों से नए नंबर का दावा किया जा रहा है, वह गलत है। वक्फ की जमीन के पुराने गाटा संख्या 271, 272, 273, 274, 275,276 व 277 का कोई भी क्षेत्रफल नई गाटा संख्याओं 242, 243,244, 246 में शामिल नहीं है। बल्कि इसका गाटा संख्या 256, 257,258, 259. 260 और 262 है। 13 मई 1924 को फकीर मोहम्मद पुत्र निरह व उनकी पत्नी बख्तावर बीबी निवासी बरवारी टोला अयोध्या की कोई औलाद नहीं होने से अपनी समस्त भूमि अल्लाहताला के नाम वक्फ को देने का आवेदन किया। तब पूरी मिल्कियत की मालियत 12 हजार थी, जो दफा-30 के तहत 20 मई 1924 को रजिस्टर्ड हो गया।
इसके साथ संपत्ति को बेचना, खरीदना, गिरवी रखना अवैध हो गया। रजिस्टर्ड वक्फनामा में भूमि बंदोबस्त के पहले के नंबर गाटा संख्या 271, 272, 275, 276, 274, 273 व 277 से मौजा बाग बिजैसी दर्ज था, इसे लेकर दावे किए गए कि भूमि बंदोबस्त के बाद बदलकर उक्त गाटा संख्या 242/1, 242/2, 243, 244 246 हो गया।
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वक्फ कर्ता बख्तावर बीबी व फकीर मोहम्मद के नाम फसली 1344 में खाता संख्या 3 में अंकित गाटे 242, 243, 244 व 240 मौजा बाग बिजेसी अंकित है। खतौनी उर्दू में है। इससे बने नए गाटे पूरी तरह स्पष्ट हैं। गाटा संख्या 274 व 276 से नया गाटा 242 बना है।
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वक्फ डीड के परीक्षण का हवाला देते हुए तहसीलदार ने लिखा है कि जिन पुराने नंबरों से नए नंबर का दावा किया जा रहा है, वह गलत है। वक्फ की जमीन के पुराने गाटा संख्या 271, 272, 273, 274, 275,276 व 277 का कोई भी क्षेत्रफल नई गाटा संख्याओं 242, 243,244, 246 में शामिल नहीं है। बल्कि इसका गाटा संख्या 256, 257,258, 259. 260 और 262 है। 13 मई 1924 को फकीर मोहम्मद पुत्र निरह व उनकी पत्नी बख्तावर बीबी निवासी बरवारी टोला अयोध्या की कोई औलाद नहीं होने से अपनी समस्त भूमि अल्लाहताला के नाम वक्फ को देने का आवेदन किया। तब पूरी मिल्कियत की मालियत 12 हजार थी, जो दफा-30 के तहत 20 मई 1924 को रजिस्टर्ड हो गया।
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इसके साथ संपत्ति को बेचना, खरीदना, गिरवी रखना अवैध हो गया। रजिस्टर्ड वक्फनामा में भूमि बंदोबस्त के पहले के नंबर गाटा संख्या 271, 272, 275, 276, 274, 273 व 277 से मौजा बाग बिजैसी दर्ज था, इसे लेकर दावे किए गए कि भूमि बंदोबस्त के बाद बदलकर उक्त गाटा संख्या 242/1, 242/2, 243, 244 246 हो गया।
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वक्फ कर्ता बख्तावर बीबी व फकीर मोहम्मद के नाम फसली 1344 में खाता संख्या 3 में अंकित गाटे 242, 243, 244 व 240 मौजा बाग बिजेसी अंकित है। खतौनी उर्दू में है। इससे बने नए गाटे पूरी तरह स्पष्ट हैं। गाटा संख्या 274 व 276 से नया गाटा 242 बना है।
जबकि गाटा संख्या 272 से गाटा संख्या 243 और गाटा संख्या 273 व 275 से नया गाटा संख्या 244 बना है। जबकि गाटा संख्या 277 व 270 से नया गाटा संख्या 246 बना है। बोर्ड में पंजीकृत दस्तावेज में व्यवस्था दी गई है कि खानदान का एक सदस्य इसका मुतवल्ली होता रहेगा। जबकि कुछ लोग सदस्य चुने जाएंगे।
वक्फ की प्रॉपर्टी समाज के लिए प्रयोग की जाएगी व्यक्तिगत नहीं। मुतवल्ली के नाम प्रॉपर्टी की वरासत दर्ज होती रहेगी। पहली कमेटी हिंदू-मुस्लिम एकता की परिचायक थी, इसमें सैयद अब्दल, बाबू केशव प्रसाद और जगन्नाथ सिंह शामिल थे।
ऐसे बदलती रही वक्फ बोर्ड की व्यवस्था
वक्फ की प्रॉपर्टी समाज के लिए प्रयोग की जाएगी व्यक्तिगत नहीं। मुतवल्ली के नाम प्रॉपर्टी की वरासत दर्ज होती रहेगी। पहली कमेटी हिंदू-मुस्लिम एकता की परिचायक थी, इसमें सैयद अब्दल, बाबू केशव प्रसाद और जगन्नाथ सिंह शामिल थे।
ऐसे बदलती रही वक्फ बोर्ड की व्यवस्था
- 1955: हाजी फकीर मोहम्मद के इंतकाल के बाद खानदान के लोगों ने मो. रमजान को मुतवल्ली चुना। इनके नाम यह संपत्ति राजस्व अभिलेखों में उनके इंतकाल 1955 तक रही।
- 1982 : मो. फायक के नाम यह संपत्ति दर्ज हुई, जो इसके मुतवल्ली थे।
- 1986-1994 : मो. फायक के बाद मो. आलम मुतवल्ली चुने गए और उनके नाम यह संपत्ति दर्ज थी।
- 1996-2015: मो. आलम के इंतकाल के बाद मो. असलम मुतवल्ली बने। कमेटी में मकबूल अहमद, अलाउद्दीन, मो. युनुस, मो. अयूब, शकील अहमद, मो. याकूब समेत सात लोग थे।
यहां से शुरू हुई गड़बड़ी तत्कालीन मुतवल्ली मो. असलम ने तहसीलदार के यहां पूर्ववर्ती
तत्कालीन मुतवल्ली मो. असलम ने तहसीलदार के यहां पूर्ववर्ती मुतवल्ली मो. आलम का नाम खारिज करके अपना नाम दर्ज कराने का आवेदन किया। तब पता चला कि मो. आलम के चारों पुत्र महफूज आलम, जावेद आलम, नूर आलम और फिरोज आलम ने 15 अक्तूबर 1997 को वक्फ की संपत्ति की पैतृक संपत्ति के रूप में वरासत दर्ज करा ली है।
इसके विरोध में मो. असलम ने वर्ष 2009 में तहसीलदार कोर्ट में वाद संख्या 1053 असलम बनाम महफूज आलम दाखिल किया था। तत्कालीन तहसीलदार ने खानदान के लोगो की वंशावली बनवाई और मौके पर निरीक्षण भी किया। कानूनगो ने रिपोर्ट में कहा कि अगर इस संपत्ति पर मुतवल्ली मो. आलम के पुत्रों का नाम दर्ज होता है तो उस खानदान में और भी लोग हैं जिनका नाम दर्ज होना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार ने 29 जून 2009 को महमूद आलम के पुत्रों के नाम खतौनी में दर्ज होने के आदेश को स्थगित कर दिया।
इसके विरोध में मो. असलम ने वर्ष 2009 में तहसीलदार कोर्ट में वाद संख्या 1053 असलम बनाम महफूज आलम दाखिल किया था। तत्कालीन तहसीलदार ने खानदान के लोगो की वंशावली बनवाई और मौके पर निरीक्षण भी किया। कानूनगो ने रिपोर्ट में कहा कि अगर इस संपत्ति पर मुतवल्ली मो. आलम के पुत्रों का नाम दर्ज होता है तो उस खानदान में और भी लोग हैं जिनका नाम दर्ज होना चाहिए। इस रिपोर्ट के आधार पर तहसीलदार ने 29 जून 2009 को महमूद आलम के पुत्रों के नाम खतौनी में दर्ज होने के आदेश को स्थगित कर दिया।