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दीपशिखा गुरु जैसी हो जिद तो हर सरकारी विद्यालय बनेगा स्मार्ट
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ग्रेटर नोएडा (नवीन कुमार)। ग्रेनो वेस्ट के रोजा जलालपुर गांव के प्राथमिक विद्यालय से छह वर्ष पहले एक पिता ने बेटी को यह कहकर निकाल लिया था कि यहां अंग्रेजी में प्रार्थना नहीं होती। यह बात सहायक अध्यापिका दीपशिखा शर्मा को काफी चुभी और उन्होंने स्कूल को बदलने की ठान ली। आज यह सरकारी स्कूल किसी निजी स्कूल से कम नहीं है। यहां स्मार्ट क्लास रूम है और अंग्रेजी में प्रार्थना होती है। कक्षा एक के बच्चों के क्लास रूम में प्री नर्सरी जैसी सुविधाएं हैं। विद्यार्थियों संख्या भी 120 से 255 पहुंच गई है।
दीपशिखा ने 10 वर्ष पूर्व बतौर सहायक अध्यापिका यह कार्यभार संभाला था। छह साल पहले स्कूल में सीमा नामक बच्ची पढ़ती थी। दीपशिखा को उससे काफी लगाव था, लेकिन पिता ने निजी स्कूल जैसी पढ़ाई और अंग्रेजी में प्रार्थना नहीं होने पर बच्ची को स्कूल से निकाल लिया। इस पर दीपशिखा ने तभी प्रार्थना अंग्रेजी में कराने का फैसला लिया। काफी मुश्किल आई, लेकिन अब स्कूल में रोज अंग्रेजी में प्रार्थना होती है। पांच वर्ष पहले पूर्व प्राथमिक स्कूल को निजी स्कूल जैसा बनाने की शुरुआत की। निजी स्तर पर जन समुदाय से सहयोग लिया। परिणाम यह रहा कि तीन वर्ष से स्कूल में विद्यार्थियों को बेहतर सुविधा मिल रही हैं। प्रोजेक्टर युक्त स्मार्ट क्लास में विद्यार्थी पढ़ते हैं। अच्छा फर्नीचर, बोर्ड, खिलौने, झूले, अलमारी, डस्टबिन आदि की सुविधा है। स्कूल का फेसबुक पेज भी है। जहां विद्यार्थियों की हर गतिविधियों का फोटो अपलोड किया जाता है।
बर्तन से लेकर पेंसिल तक मिलती है विद्यार्थियों को
तीन वर्ष से विद्यार्थियों को घर से किसी भी तरह की पाठ्य सामग्री लाने की जरूरत नहीं है। उनको बर्तन से लेकर पेंसिल तक स्कूल में मिलती है। विभाग की तरफ से भी काफी सुविधा मिलती है, लेकिन जन समुदाय के सहयोग से बच्चों को हर सुविधा मिल रही है। उनको मिड डे मील के बर्तन दिए गए। ड्रेस, जूते, बैग, रबर, नोटबुक, किताब आदि सभी सुविधाएं मिलती हैं।
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अभिभावक के अंगूठा पर रोक
विद्यालय में अभिभावकों के अंगूठा लगाने पर रोक है। यहां अभिभावकों की अलग से कक्षा लगती है। जिसमें उनको नाम लिखना सिखाया जाता है। ताकि वे हस्ताक्षर करें। नए अभिभावकों को भी नाम लिखना सिखाया जाता है।
पिछले साल गया था नेशनल अवार्ड के लिए नाम
दीपशिखा का नाम पिछले साल जिला बेसिक शिक्षा विभाग की तरफ से नेशनल अवार्ड के लिए भेजा गया था। जिले से दो नाम और भेजे गए थे। हालांकि किसी को अवार्ड नहीं मिला। एसोसिएशन ऑफ टॉप एचीवर्स की तरफ से नेशनल एचीवर्स का खिताब मिल चुका है। शासन स्तर से छपने वाली प्रेरणा मैगजीन में भी उनकी मेहनत को स्थान मिल चुका है। दीपशिखा बालिकाओं की शिक्षा पर भी काम कर रही है।
साथी शिक्षकों का सहयोग मिला। प्रधान अध्यापिका ने प्रोत्साहित किया। स्कूल को निजी स्कूलों से बेहतर बनाने का मकसद है। काफी हद तक सफलता मिली है। भविष्य में बच्चों को बेहतर सुविधा देने का प्रयास रहेगा। निजी स्तर पर और सुविधा विकसित की जाएंगी। - दीपशिखा शर्मा, सहायक अध्यापिका
अपने स्तर पर शिक्षक स्कूल को बेहतर बनाने का प्रयास कर सकते हैं। इससे बेसिक स्कूलों में शिक्षा के स्तर में सुधार आएगा। प्रशासन की तरफ से भी बेसिक स्कूलों में बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। - सुहास एलवाई, जिलाधिकारी
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दीपशिखा ने 10 वर्ष पूर्व बतौर सहायक अध्यापिका यह कार्यभार संभाला था। छह साल पहले स्कूल में सीमा नामक बच्ची पढ़ती थी। दीपशिखा को उससे काफी लगाव था, लेकिन पिता ने निजी स्कूल जैसी पढ़ाई और अंग्रेजी में प्रार्थना नहीं होने पर बच्ची को स्कूल से निकाल लिया। इस पर दीपशिखा ने तभी प्रार्थना अंग्रेजी में कराने का फैसला लिया। काफी मुश्किल आई, लेकिन अब स्कूल में रोज अंग्रेजी में प्रार्थना होती है। पांच वर्ष पहले पूर्व प्राथमिक स्कूल को निजी स्कूल जैसा बनाने की शुरुआत की। निजी स्तर पर जन समुदाय से सहयोग लिया। परिणाम यह रहा कि तीन वर्ष से स्कूल में विद्यार्थियों को बेहतर सुविधा मिल रही हैं। प्रोजेक्टर युक्त स्मार्ट क्लास में विद्यार्थी पढ़ते हैं। अच्छा फर्नीचर, बोर्ड, खिलौने, झूले, अलमारी, डस्टबिन आदि की सुविधा है। स्कूल का फेसबुक पेज भी है। जहां विद्यार्थियों की हर गतिविधियों का फोटो अपलोड किया जाता है।
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बर्तन से लेकर पेंसिल तक मिलती है विद्यार्थियों को
तीन वर्ष से विद्यार्थियों को घर से किसी भी तरह की पाठ्य सामग्री लाने की जरूरत नहीं है। उनको बर्तन से लेकर पेंसिल तक स्कूल में मिलती है। विभाग की तरफ से भी काफी सुविधा मिलती है, लेकिन जन समुदाय के सहयोग से बच्चों को हर सुविधा मिल रही है। उनको मिड डे मील के बर्तन दिए गए। ड्रेस, जूते, बैग, रबर, नोटबुक, किताब आदि सभी सुविधाएं मिलती हैं।
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अभिभावक के अंगूठा पर रोक
विद्यालय में अभिभावकों के अंगूठा लगाने पर रोक है। यहां अभिभावकों की अलग से कक्षा लगती है। जिसमें उनको नाम लिखना सिखाया जाता है। ताकि वे हस्ताक्षर करें। नए अभिभावकों को भी नाम लिखना सिखाया जाता है।
पिछले साल गया था नेशनल अवार्ड के लिए नाम
दीपशिखा का नाम पिछले साल जिला बेसिक शिक्षा विभाग की तरफ से नेशनल अवार्ड के लिए भेजा गया था। जिले से दो नाम और भेजे गए थे। हालांकि किसी को अवार्ड नहीं मिला। एसोसिएशन ऑफ टॉप एचीवर्स की तरफ से नेशनल एचीवर्स का खिताब मिल चुका है। शासन स्तर से छपने वाली प्रेरणा मैगजीन में भी उनकी मेहनत को स्थान मिल चुका है। दीपशिखा बालिकाओं की शिक्षा पर भी काम कर रही है।
साथी शिक्षकों का सहयोग मिला। प्रधान अध्यापिका ने प्रोत्साहित किया। स्कूल को निजी स्कूलों से बेहतर बनाने का मकसद है। काफी हद तक सफलता मिली है। भविष्य में बच्चों को बेहतर सुविधा देने का प्रयास रहेगा। निजी स्तर पर और सुविधा विकसित की जाएंगी। - दीपशिखा शर्मा, सहायक अध्यापिका
अपने स्तर पर शिक्षक स्कूल को बेहतर बनाने का प्रयास कर सकते हैं। इससे बेसिक स्कूलों में शिक्षा के स्तर में सुधार आएगा। प्रशासन की तरफ से भी बेसिक स्कूलों में बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। - सुहास एलवाई, जिलाधिकारी