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Noida News: मुझे कविता से मिली पहचान, पिता को लगता था लड़िका हाथे से निकरि गै

Sun, 21 Sep 2025 02:48 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Sun, 21 Sep 2025 02:48 AM IST
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I got recognition through poetry, my father thought the boy had slipped out of his hands.
जाने माने युवा कवि रामायण धर द्विवेदी
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पॉडकास्ट-रामायण धर द्विवेदी

...इसी से मिलती है संतुष्टि
गांव में क्रिकेट खेलते हुए एक लड़का अपने दोस्तों से कहा करता था कि तुम लोग मेरा वक्त बर्बाद कर रहे हो। मुझे इंजीनियर बनना है। यही ख्वाहिश उन्हें सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की ओर ले गई। वो इंजीनियरिंग तो नहीं कर पाए, लेकिन आज अपनी कविताओं के माध्यम से हजारों लोगों के दिलों में घर जरूर बना रहे हैं। गांव की गलियों से निकलकर देश-विदेश के मंचों पर स्थान पाने वाले युवा कवि रामायण धर द्विवेदी ने अमर उजाला पॉडकास्ट पर अपने जीवन, कॅरिअर और कविताओं पर खुलकर बात की । पेश हैं इसके कुछ चुनिंदा अंश। नीचे लगे क्यूआर कोड को स्कैन कर आप पूरा पॉडकास्ट देख सकते हैं।

मैकेनिकल इंजीनियरिंग की नीरस दुनिया से कविताओं के रसमयी संसार में कैसे आए?

अंबेडकरनगर में पॉलीटेक्निक की पढ़ाई कर रहा था। इसी दौरान पहली बार लाइव काव्य पाठ सुना। मुझे बहुत आनंद आया। यहीं से मेरे अंदर बदलाव शुरू हुआ। कविता लिख पाऊं इसके लिए हमेशा चिंतन करता रहता था। यह मेरे लिए बिल्कुल नई विधा थी इसलिए काफी समय तक दिमाग में कुछ नहीं आता था। एक दिन ऐसे ही बैठकर बाबा जी को याद कर रहा था। तभी दैवी कृपा से मैंने अपनी पहली चार पंक्तियां लिखीं। जब कविताओं में समझ बढ़ी तब पता चला कि जो मैंने लिखा वो एक घनाक्षरी छंद था।
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पढ़ाई छोड़कर काव्य पाठ करने लगे तो माता-पिता की क्या प्रतिक्रिया थी?

सब को उम्मीद थी कि मैं इंजीनियर बनूंगा। कविताओं में रुचि बढ़ने से मैं काव्य पाठ भी करने लगा। कई बार देर रात कार्यक्रम होते हैं तो खाने में भी लेट हो जाता है। माताजी आज भी इस बात से दुखी होती हैं। पिताजी लोगों से कहते थे, लड़िका हाथ से निकरि गै भइया। हालांकि पिछले एक-डेढ़ साल में उनका नजरिया बदला है। अब वह भी मानने लगे हैं कि कोई गलत काम नहीं कर रहा हूं। अब जान पहचान भी ठीक-ठाक हो गई है तो कभी किसी का अटका काम करा देता हूं तो पिताजी को भी खुशी होती है।
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क्या मंच पर इतना पैसा है कि काव्यपाठ को पेशा बनाने वाला अपने परिवार को अच्छा जीवन दे सके?

अब मंच पर इतना बदलाव तो आ गया है कि महीने के पांच-सात काव्य पाठ कर इंसान अच्छा जीवन व्यतीत कर सकता है। बहुत आलीशान जिंदगी का ख्वाब रखने वालों के लिए किसी भी फील्ड में धन हमेशा कम ही पड़ेगा। ईश्वर की कृपा से काव्य पाठ के जरिये ही अपने परिवार को अच्छा जीवन दे पा रहा हूं। इसके अलावा भी कई तरह से लोगों की आर्थिक मदद कर पा रहा हूं। ये पैसा काव्य पाठ कर के ही मिल रहा है।

अब कविता का मंच मजमा ज्यादा लगता है, क्या ऐसे में एक कवि को आत्मिक शांति मिल पाती है?
यह बात सच है कि आजकल मंचों का स्वरूप बदल चुका है। मेरे लिए कविता साधन नहीं साधना का विषय है। मुझे काव्यपाठ कर के ही संतुष्टि मिलती है। आजकल कवि पहले ताली बजवाते हैं तब कविता पढ़ते हैं। मुझे लगता है अगर आपकी कविता अच्छी है तो तालियां अपने आप बजेंगी। जब मंच से उतरता हूं तो लोग घेर लेते हैं। कहते हैं कि हमें आपकी कविताओं से प्रेरणा मिलती हैं। इसी में मेरी संतुष्टि है।

आप प्रेम और श्रृंगार लिखते हैं लेकिन क्या आपने कभी प्रेम किया?

एक उम्र होती है जब सबमें किसी न किसी के प्रति आकर्षण तो होता ही है। कई बार परिवार के मूल्य भी ऐसे होते हैं जिनकी वजह से आप कुछ चीजों के लिए तैयार नहीं हो पाते। मेरे जनपद की ही एक लड़की थी। मैं उससे काफी प्रभावित था। कई मामलों में उससे राय लेता था। हम कभी साथ उठ-बैठ नहीं पाए। उसकी शादी के लिए लड़का भी मैंने ही बताया। हालांकि इस समय ऐसी किसी भावना में नहीं फंसा हूं। पूरी तरह से अध्यात्म में ही मन लगा हुआ है।


कभी किसी राजनीतिक पार्टी की तरफ से कोई प्रस्ताव आया?

हां ऐसा कई बार हुआ है। कई पार्टियों ने ऑफर दिए हैं। सभी ने पार्टी और संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने की बात भी की। हालांकि मेरी ऐसी कोई इच्छा नहीं है। मुझे लगता है कि मैं उससे बड़ी जिम्मेदारी निभा रहा हूं। मैं काव्य पाठ करके भी समाज को दिशा दिखा सकता हूं।
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