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Noida News: गामा नाइफ से आंखों के कैंसर पर वार, रहता है रोशनी का एतबार

Mon, 18 Mar 2024 07:17 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 18 Mar 2024 07:17 PM IST
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Gamma knife attacks eye cancer, remains dependent on light
-एम्स ने यूवेल मेलेनोमा के 15 मरीजों का किया इलाज, बेहतर मिले परिणाम
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-अब तक होती थी सामान्य सर्जरी, ट्यूमर के साथ निकालनी पड़ती थी आंख
-30 मिनट में रेडिएशन देकर होता है इलाज, उसी दिन मिल जाती है छुट्टी
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-40 साल की उम्र के लोगों में मिल रहे हैं मामले देश में
-60 साल के उम्र में मिलते हैं ऐसे मामलेपश्चिमी देशों में
-महज 14 साल है एम्स में मिले सबसे छोटे मरीज की उम्र
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। एम्स में गामा नाइफ से आंखों में होने वाले कैंसर पर वार कर रोशनी को सुरक्षित बचाया गया। पिछले ढाई साल में इस तकनीक की मदद से संस्थान के डॉक्टरों ने 15 मरीजों का इलाज किया है और सभी के परिणाम बेहतर मिले। अभी तक ट्यूमर को निकालने के लिए सर्जरी करनी पड़ती थी। इस सर्जरी में ट्यूमर के साथ आंख को भी निकालना पड़ता था, जिस कारण उक्त मरीज की स्थायी रूप से रोशनी भी चली जाती थी। नई तकनीकी से इस समस्या से स्थाई रूप से छुटकारा मिल रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि आंखों की रोशनी को बचाने के लिए एम्स के नेत्र विज्ञान विभाग ने न्यूरोलॉजी विभाग के साथ मिलकर आंखों के कैंसर (यूवेल मेलेनोमा) के इलाज के लिए गामा नाइफ रेडियो सर्जरी की शुरुआत की। इसमें 30 मिनट में ट्यूमर पर 0.1 मिली मीटर की सटीकता के साथ गामा किरणें दी गई। जो एक बार में ही ट्यूमर का इलाज कर देती है। मरीज को इलाज देकर उसी दिन छुट्टी भी कर दी जाती है। जिस कारण मरीजों की इलाज की गति बढ़ेगी और इंतजार कम होगा।
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एम्स के डॉ. आर पी सेंटर की प्रोफेसर डॉ. भावना चावला ने कहा कि एम्स ने पिछले ढाई साल में 15 मरीजों का इस तकनीक से इलाज किया। इसमें सबसे छोटा मरीज 14 साल का था। सभी मरीजों पर परिणाम बेहतर मिले हैं। इस आधुनिक तकनीक की मदद से रोशनी को बचाया जा सकता है। यह मरीज के लिए काफी राहत की बात है। अभी तक सामान्य सर्जरी में रौशनी चली जाती थी।
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इन्हें होने का खतरा
- गोरा चेहरा
- भूरी आंखें
- आंखों में तिल
- पराबैंगनी किरणों का प्रभाव

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20 साल पहले आ रही भारत में समस्या
पश्चिमी देशों की तुलना में यह कैंसर 20 साल पहले हो रहा है। हालांकि इसका कारण पता नहीं है। इसे जानने के लिए शोध चल रहा है। पश्चिमी देशों में यह कैंसर 60 की उम्र में मिलता है, जबकि भारत में यह कैंसर 40 की उम्र में ही मिलने लगा है। वहीं एम्स में सबसे छोटा मरीज 14 साल का मिला। इसके पीछे हार्मोन को कारण माना जा रहा हैं।

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अंतिम स्टेज पर भी कारगर
न्यूरोलॉजी विभाग के प्रोफेसर दीपक ने कहा कि यह तकनीक चौथे स्टेज के कैंसर पर भी कारगर है। अभी तक सामान्य तकनीक में पूरे माह रेडियोथेरेपी देनी पड़ती थी। जबकि नई तकनीक में एक बार में ही इलाज कर दिया जाता है। इस तकनीक से इलाज करने पर ट्यूमर दिमाग के दूसरे हिस्से में नहीं फैलता और मरीज की हालत जल्द खराब नहीं होती। दर्द कम होता है और मरीज अंतिम समय तक होश में रहता है।

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यह है यूवेल मेलेनोमा
यूवेल मेलेनोमा एक दुर्लभ प्रकार का कैंसर है, जो आंख के ऊतकों में होता है। यह मामले प्रति दस लाख में पांच लोगों में पाए जाते हैं। यह बीमारी आंखों में बाहरी, मध्य और भीतरी परत में हो सकती है। इलाज में देरी से यह पूरे शरीर में तेजी से फैल सकता है। इलाज न मिलने से मरीज की मौत तक हो सकती है।


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गामा नाइफ सबसे बेहतर
प्रोफेसर दीपक ने कहा कि एम्स में गामा नाइफ का इस्तेमाल 40 साल से हो रहा है। अभी तक इसकी मदद से अलग-अलग कैंसर की 10 हजार से अधिक रेडियोसर्जरी हो चुकी है। पिछले साल एक हजार सर्जरी की गई हैं। यह गले के ऊपर के सभी तरह के ट्यूमर के लिए फायदेमंद है। इसकी सटीकता 0.1 मिली मीटर की होती है। जबकि साइबर नाइफ व प्रोटोन बीम की ज्यादा है। कई तरह के कैंसर दिमाग के दूसरे हिस्से में फैल जाते हैं। इसमें मेटास्टेटिक, गलाइमा, कान का ट्यूमर, दिमाग में नसों के गुच्छे में कैंसर सहित अन्य सभी में गामा नाइफ कारगर है। इसका इस्तेमाल पहले तीन से चार मिली मीटर तक किया जाता था, अब इसका बड़े आकार के कैंसर पर भी हो रहा है।
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