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बोलने की आजादी का बहुसंख्यकों की राय से मेल खाना जरूरी नहीं : हाईकोर्ट
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नई दिल्ली। बोलने की आजादी का बहुसंख्यकों की राय से मेल खाना जरूरी नहीं, एक अलग राय रखना जीवंत लोकतंत्र का सार है। हाईकोर्ट ने ये बात पूर्व मंत्री सलमान खुर्शीद की किताब के खिलाफ दायर याचिका खारिज करते हुए कही। किताब के प्रकाशन, वितरण और बिक्री पर रोक के लिए याचिका दायर की गई थी।
पेश याचिका में दावा किया गया था कि सलमान खुर्शीद की किताब ‘सनराइज ओवर अयोध्या : नेशनहुड इन अवर टाइम्स’ अन्य लोगों के विश्वास पर चोट करती है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि बोलने की आजादी समेत संविधान में दिए अधिकारों को कुछ अप्रिय होने की आशंका से सीमित या वंचित नहीं किया जा सकता। कानून से चलने वाले लोकतंत्र के लिए ये खतरनाक होगा अगर रचनात्मक आवाजों या बौद्धिक स्वतंत्रता को दबाया जाए।
न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने छह पन्नों के फैसले में फ्रांसीसी लेखक वाल्तेयर का जिक्र करते हुए कहा कि भले ही मैं आपकी बात से असहमत हूं पर आपकी बात रखने की आजादी का समर्थन करता हूं। बोलने की आजादी की पूरे जोश से रक्षा होनी चाहिए। बशर्ते वह सांविधानिक और कानूनी प्रतिबंधों के अनुसार गलत न हो।
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उन्होंने 25 नवंबर के अपने फैसले में कहा कि समसामयिक या एतिहासिक घटनाओं के प्रति अलग मत रखना या उनके प्रति अलग राय व्यक्त करना जीवंत लोकतंत्र का सार है। संविधान में दिए गए मौलिक और बहुमूल्य अधिकारों को कुछ अप्रिय होने या कई लोगों को पसंद न आने की आशंका से वंचित या सीमित नहीं किया जा सकता। आजादी से बोलने या विचार व्यक्त करने के अधिकार को बहुसंख्यकों से मेल न खाने के कारण कम नहीं किया जा सकता।
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि अदालत के विचार करने के लिए पूरी किताब पेश नहीं की गई। वहीं ये पूरा मामला किताब के एक अध्याय के कुछ अंशों पर आधारित है।
पेश याचिका में याची ने दावा किया था कि किताब के कुछ अंश हिंदू समुदाय में रोष पैदा कर रहे हैं। इसके साथ ही ये देश की सुरक्षा, शांति और सौहार्द के लिए भी खतरा पैदा कर रहे हैं।
याची के वकील ने तर्क रखा था कि किताब में अध्याय ‘द सैफरॉन स्काई’ में हिंदुत्व की तुलना कट्टर आईएसआई और बोको हरम से की गई है, इससे शांति भंग हो सकती है।
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पेश याचिका में दावा किया गया था कि सलमान खुर्शीद की किताब ‘सनराइज ओवर अयोध्या : नेशनहुड इन अवर टाइम्स’ अन्य लोगों के विश्वास पर चोट करती है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि बोलने की आजादी समेत संविधान में दिए अधिकारों को कुछ अप्रिय होने की आशंका से सीमित या वंचित नहीं किया जा सकता। कानून से चलने वाले लोकतंत्र के लिए ये खतरनाक होगा अगर रचनात्मक आवाजों या बौद्धिक स्वतंत्रता को दबाया जाए।
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न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने छह पन्नों के फैसले में फ्रांसीसी लेखक वाल्तेयर का जिक्र करते हुए कहा कि भले ही मैं आपकी बात से असहमत हूं पर आपकी बात रखने की आजादी का समर्थन करता हूं। बोलने की आजादी की पूरे जोश से रक्षा होनी चाहिए। बशर्ते वह सांविधानिक और कानूनी प्रतिबंधों के अनुसार गलत न हो।
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उन्होंने 25 नवंबर के अपने फैसले में कहा कि समसामयिक या एतिहासिक घटनाओं के प्रति अलग मत रखना या उनके प्रति अलग राय व्यक्त करना जीवंत लोकतंत्र का सार है। संविधान में दिए गए मौलिक और बहुमूल्य अधिकारों को कुछ अप्रिय होने या कई लोगों को पसंद न आने की आशंका से वंचित या सीमित नहीं किया जा सकता। आजादी से बोलने या विचार व्यक्त करने के अधिकार को बहुसंख्यकों से मेल न खाने के कारण कम नहीं किया जा सकता।
अदालत ने इस बात पर भी गौर किया कि अदालत के विचार करने के लिए पूरी किताब पेश नहीं की गई। वहीं ये पूरा मामला किताब के एक अध्याय के कुछ अंशों पर आधारित है।
पेश याचिका में याची ने दावा किया था कि किताब के कुछ अंश हिंदू समुदाय में रोष पैदा कर रहे हैं। इसके साथ ही ये देश की सुरक्षा, शांति और सौहार्द के लिए भी खतरा पैदा कर रहे हैं।
याची के वकील ने तर्क रखा था कि किताब में अध्याय ‘द सैफरॉन स्काई’ में हिंदुत्व की तुलना कट्टर आईएसआई और बोको हरम से की गई है, इससे शांति भंग हो सकती है।