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Noida News: नजर न लग जाए इस कारोबार को
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संशोधित
नजर न लग जाए इस कारोबार को
पान की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक लटकता है नजरबट्टू, आस्था के नाम पर कारोबार
मोहम्मद हमजा
नोएडा। इसे आस्था कहे या अंधविश्वास मगर सच्चाई यह भी है कि सात हरी मिर्च और नींबू से बने नजरबट्टू का हर सप्ताह शहर में लाखों रुपये का कारोबार हो रहा है। मकान, दुकान या अन्य प्रतिष्ठान की नजर इस नजरबट्टू से उतरती है या नहीं, लेकिन सप्ताह में एक दिन के इस कारोबार से शहर में कई परिवारों का पेट पल रहा है। बीते कुछ सालों में इसमें तेजी आई है। करीब 20 से 40 रुपये तक में बिकने वाले नजरबट्टू के कारोबार से कई परिवारों का पेट पल रहा है।
एक अनुमान के मुताबिक जिले में रोजाना करीब 3.20 लाख रुपये के नजरबट्टू का कारोबार होता है। आस्था के नाम पर लोग हर साल करोड़ों रुपये नींबू-मिर्च की लड़ी पर खर्च कर रहे हैं। सेक्टर-66 स्थित ममूरा चौक से अंदर की ओर बनी मार्केट में कपड़े की दुकान चलाने वाले सोनू गुप्ता का कहना है कि घर के बड़े-बूढ़े कहते है कि नींबू मिर्च लगाने से कारोबार में तरक्की होती है, साथ ही इसे किसी की बुरी नजर भी नहीं लगती। इसे लगाने में बड़ी रकम भी खर्च नहीं होती। इसलिए वह दुकान पर इसे हर सप्ताह लगाते हैं। वहीं अट्टा मार्केट में लक्ष्मी फुटवेयर के दीपक, सेक्टर-37 में ठेली लगाने वाले रतन सिंह, सेक्टर-135 नंगला-नंगली के पास जनरल स्टोर चलाने वाले भूपेंद्र कुमार, ग्रेनो के तुगलपुर में होटल चलाने वाले विवेक अन्य दुकानदार भी पूरी श्रद्धा के साथ अपने प्रतिष्ठानों पर हर सप्ताह नींबू-मिर्च की लड़ी लगाते आ रहे हैं।
ममूरा चौक के पास नींबू-मिर्च की लड़ी बेचने वाले प्रमोद कहते हैं वहां 30 से ज्यादा लोग नजरबट्टू बेचते हैं। अगर जिले की बात की जाए तो यह आंकड़ा हजारों में पहुंचेगा। प्रमोद कहते हैं कि परिवार के सदस्य एक दिन पहले नजरबट्टू तैयार कर लेते हैं, फिर अगले दिन सुबह-सुबह इसे लेकर दुकानों की नजर उतारने निकल जाते हैं। सुबह जल्दी खुलने वाली दुकान पर यह नींबू-मिर्च लगाकर हाथों हाथ हिसाब कर लेते हैं। वहीं, देर से 10-11 बजे तक खुलने वाली दुकानों पर नजरबट्टू लटका कर चले जाते हैं और महीने के अंतिम दिन हिसाब करते हैं।
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कारोबार का आंकड़ा करोड़ों के पार
जिले में पंजीकृत दुकानों की संख्या एक लाख से ज्यादा है। वहीं करीब दो गुना गैरपंजीकृत दुकानें हैं। इसी तरह जिले में 25 हजार से अधिक पंजीकृत ऑटो हैं। अगर तीन लाख दुकानों में से 50 फीसदी दुकानें और 40 फीसदी ऑटो-रिक्शा शामिल करें तो इनका जोड़ 1.60 लाख होता है। 60 रुपये लड़ी के हिसाब से एक लाख साठ हजार का गुणांक करें तो प्रतिमाह 96 लाख रुपये का कारोबार बैठता है। यानी प्रतिदिन 3.20 लाख का कारोबार होता है। जबकि जिले में दुकानों, ऑटो-रिक्शा के अलावा बड़ी संख्या में नींबू-मिर्च की लड़ी का इस्तेमाल घरों, दफ्तरों में भी होता है। ऐसे में यह आंकड़ा करोड़ के पार पहुंच जाता है।
कुछ लोग नजरबट्टू को आस्था के साथ वातावरण के लिए भी फायदेमंद मानते हैं। उनका कहना होता है कि इससे पर्यावरण साफ रहता है, साथ ही इसके लगाने से कीट-पतंगे भी जल्दी नहीं आते। जबकि मेरे अनुसार ऐसा कुछ नहीं है यह वैज्ञानिक पहलुओं से ज्यादा आस्था व विश्वास का प्रतीक है।
डॉ. आरके बंसल मनोचिकित्सक
मैं पिछले दस साल से नजरबट्टू की लड़ी बेच रहा हूं, 55-60 की करीब दुकान निर्धारित हैं। इसके अलावा कभी तीन-चार बिकते तो कभी दस से पंद्रह लड़ी रोजाना बिक जाते हैँ। पिता भी यही काम करते थे। अब पिता नहीं रहे तो मैं इस काम को कर रहा हूं। अब इस व्यापार के सहारे तो घर नहीं चलने वाला। इसलिए साथ में दूसरे काम भी करने पड़ते हैं।
-शिवम राज (नजरबट्टू विक्रेता)
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नजर न लग जाए इस कारोबार को
पान की दुकान से लेकर बड़े शोरूम तक लटकता है नजरबट्टू, आस्था के नाम पर कारोबार
मोहम्मद हमजा
नोएडा। इसे आस्था कहे या अंधविश्वास मगर सच्चाई यह भी है कि सात हरी मिर्च और नींबू से बने नजरबट्टू का हर सप्ताह शहर में लाखों रुपये का कारोबार हो रहा है। मकान, दुकान या अन्य प्रतिष्ठान की नजर इस नजरबट्टू से उतरती है या नहीं, लेकिन सप्ताह में एक दिन के इस कारोबार से शहर में कई परिवारों का पेट पल रहा है। बीते कुछ सालों में इसमें तेजी आई है। करीब 20 से 40 रुपये तक में बिकने वाले नजरबट्टू के कारोबार से कई परिवारों का पेट पल रहा है।
एक अनुमान के मुताबिक जिले में रोजाना करीब 3.20 लाख रुपये के नजरबट्टू का कारोबार होता है। आस्था के नाम पर लोग हर साल करोड़ों रुपये नींबू-मिर्च की लड़ी पर खर्च कर रहे हैं। सेक्टर-66 स्थित ममूरा चौक से अंदर की ओर बनी मार्केट में कपड़े की दुकान चलाने वाले सोनू गुप्ता का कहना है कि घर के बड़े-बूढ़े कहते है कि नींबू मिर्च लगाने से कारोबार में तरक्की होती है, साथ ही इसे किसी की बुरी नजर भी नहीं लगती। इसे लगाने में बड़ी रकम भी खर्च नहीं होती। इसलिए वह दुकान पर इसे हर सप्ताह लगाते हैं। वहीं अट्टा मार्केट में लक्ष्मी फुटवेयर के दीपक, सेक्टर-37 में ठेली लगाने वाले रतन सिंह, सेक्टर-135 नंगला-नंगली के पास जनरल स्टोर चलाने वाले भूपेंद्र कुमार, ग्रेनो के तुगलपुर में होटल चलाने वाले विवेक अन्य दुकानदार भी पूरी श्रद्धा के साथ अपने प्रतिष्ठानों पर हर सप्ताह नींबू-मिर्च की लड़ी लगाते आ रहे हैं।
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ममूरा चौक के पास नींबू-मिर्च की लड़ी बेचने वाले प्रमोद कहते हैं वहां 30 से ज्यादा लोग नजरबट्टू बेचते हैं। अगर जिले की बात की जाए तो यह आंकड़ा हजारों में पहुंचेगा। प्रमोद कहते हैं कि परिवार के सदस्य एक दिन पहले नजरबट्टू तैयार कर लेते हैं, फिर अगले दिन सुबह-सुबह इसे लेकर दुकानों की नजर उतारने निकल जाते हैं। सुबह जल्दी खुलने वाली दुकान पर यह नींबू-मिर्च लगाकर हाथों हाथ हिसाब कर लेते हैं। वहीं, देर से 10-11 बजे तक खुलने वाली दुकानों पर नजरबट्टू लटका कर चले जाते हैं और महीने के अंतिम दिन हिसाब करते हैं।
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कारोबार का आंकड़ा करोड़ों के पार
जिले में पंजीकृत दुकानों की संख्या एक लाख से ज्यादा है। वहीं करीब दो गुना गैरपंजीकृत दुकानें हैं। इसी तरह जिले में 25 हजार से अधिक पंजीकृत ऑटो हैं। अगर तीन लाख दुकानों में से 50 फीसदी दुकानें और 40 फीसदी ऑटो-रिक्शा शामिल करें तो इनका जोड़ 1.60 लाख होता है। 60 रुपये लड़ी के हिसाब से एक लाख साठ हजार का गुणांक करें तो प्रतिमाह 96 लाख रुपये का कारोबार बैठता है। यानी प्रतिदिन 3.20 लाख का कारोबार होता है। जबकि जिले में दुकानों, ऑटो-रिक्शा के अलावा बड़ी संख्या में नींबू-मिर्च की लड़ी का इस्तेमाल घरों, दफ्तरों में भी होता है। ऐसे में यह आंकड़ा करोड़ के पार पहुंच जाता है।
कुछ लोग नजरबट्टू को आस्था के साथ वातावरण के लिए भी फायदेमंद मानते हैं। उनका कहना होता है कि इससे पर्यावरण साफ रहता है, साथ ही इसके लगाने से कीट-पतंगे भी जल्दी नहीं आते। जबकि मेरे अनुसार ऐसा कुछ नहीं है यह वैज्ञानिक पहलुओं से ज्यादा आस्था व विश्वास का प्रतीक है।
डॉ. आरके बंसल मनोचिकित्सक
मैं पिछले दस साल से नजरबट्टू की लड़ी बेच रहा हूं, 55-60 की करीब दुकान निर्धारित हैं। इसके अलावा कभी तीन-चार बिकते तो कभी दस से पंद्रह लड़ी रोजाना बिक जाते हैँ। पिता भी यही काम करते थे। अब पिता नहीं रहे तो मैं इस काम को कर रहा हूं। अब इस व्यापार के सहारे तो घर नहीं चलने वाला। इसलिए साथ में दूसरे काम भी करने पड़ते हैं।
-शिवम राज (नजरबट्टू विक्रेता)