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Noida News: जारचा पुलिस पर गंभीर आरोपों की एफआईआर की मांग खारिज

Tue, 07 Jul 2026 05:43 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Tue, 07 Jul 2026 05:43 PM IST
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Demand for FIR against Jarcha police over serious allegations rejected.
जारचा पुलिस पर गंभीर आरोपों की एफआईआर की मांग खारिज
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अदालत ने कहा- एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देना हर मामले में अनिवार्य नहीं
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। जारचा थाना पुलिस पर मारपीट, लूट, झूठे मुकदमे में फंसाने और सत्ता के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाकर एफआईआर दर्ज कराने की मांग कर रहे अधिवक्ता की आपराधिक निगरानी (क्रिमिनल रिवीजन) को गौतमबुद्ध नगर की अदालत ने खारिज कर दिया है। सत्र अदालत ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें धारा 173(4) बीएनएसएस के तहत दिए गए प्रार्थना पत्र को एफआईआर दर्ज कराने के बजाय परिवाद (कंप्लेंट केस) के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।
मामले में जारचा थाना क्षेत्र के ऊंचा अमीपुर निवासी अधिवक्ता योगेंद्र सिंह ने थाना प्रभारी, चौकी प्रभारी समेत कई पुलिसकर्मियों और गांव के कुछ लोगों पर गंभीर आरोप लगाए थे। उनका कहना था कि गांव में एक प्लॉट खरीदने के लिए उन्होंने दिसंबर 2024 में 2.50 लाख रुपये बतौर बयाना दिए थे लेकिन बाद में प्लॉट देने से इन्कार कर दिया गया। इसके बाद विवाद बढ़ने पर उनके साथ मारपीट की गई और पुलिस ने निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय उन्हें ही प्रताड़ित किया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि 28 दिसंबर 2024 को पुलिस उन्हें जबरन घर से उठाकर ले गई, मोबाइल छीन लिया, मारपीट की और थाने में बंद कर दिया। इतना ही नहीं, पत्नी को भी गिरफ्तार करने की धमकी दी गई। बाद में उच्च अधिकारियों से शिकायत करने पर पुलिस और अधिक रंजिश रखने लगी और मार्च 2025 में रास्ते में रोककर पांच हजार रुपये छीनने, धमकाने और कार्यालय में घुसकर मारपीट करने जैसे आरोप भी लगाए गए। इन घटनाओं के सीसीटीवी फुटेज और अन्य साक्ष्य उसके पास मौजूद हैं।
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मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने शिकायत पर एफआईआर दर्ज कराने का आदेश देने के बजाय उसे परिवाद के रूप में दर्ज कर आगे की कार्यवाही शुरू करने का आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए आपराधिक निगरानी दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मामले में पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आपराधिक आरोप हैं और सीसीटीवी, कॉल डिटेल तथा अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की जांच केवल पुलिस विवेचना से ही संभव है, इसलिए एफआईआर दर्ज कर जांच कराई जानी चाहिए। सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि मजिस्ट्रेट के पास यह विवेकाधिकार है कि वह परिस्थितियों के अनुसार एफआईआर दर्ज कराने का आदेश दे या शिकायत को परिवाद के रूप में स्वीकार करे। यदि शिकायतकर्ता के पास अपने आरोपों के समर्थन में पर्याप्त प्रारंभिक साक्ष्य उपलब्ध हैं और वह उन्हें न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है, तो हर मामले में पुलिस विवेचना आवश्यक नहीं होती।
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