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Noida News: मौत के बाद महिला के शरीर में फिर शुरू हुआ रक्त संचार, तीन लोगों को मिल गया नया जीवन
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-दावा, 55 वर्षीय महिला की मौत के बाद डॉक्टरों ने उनके शरीर में खून का दौरा दोबारा शुरू किया
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली के निजी अस्पताल में एशिया में पहली बार एक अनोखी चिकित्सा सफलता हासिल हुई है। अस्पताल ने दावा किया कि एक 55 वर्षीय गीता चावला की मौत के बाद डॉक्टरों ने उनके शरीर में खून का संचार दोबारा शुरू कर दिया। यह काम एक खास मशीन ईसीएमओ की मदद से नॉर्मोथर्मिक रीजनल परफ्यूजन (एनआरपी) तकनीक से किया गया। इससे उनके लिवर और दोनों किडनी को चार घंटे तक पूरी तरह जिंदा रखा गया और तीन मरीजों की जान बचाई गई।
गीता चावला मोटर न्यूरॉन बीमारी से पीड़ित थीं और 6 नवंबर की रात उन्होंने अंतिम सांस ली। परिवार ने तुरंत अंगदान की सहमति दी। डॉक्टरों ने सिर्फ पेट के हिस्से तक खून का प्रवाह शुरू किया ताकि लिवर और किडनी सुरक्षित रहें। गीता का लिवर आईएलबीएस अस्पताल में 48 साल के मरीज को दिया गया, जबकि दोनों किडनी साकेत के एक अस्पताल में 63 और 58 साल के दो मरीजों को प्रत्यारोपित की गईं। यही नहीं, उनकी कॉर्निया और त्वचा भी दान की गई। डॉक्टर श्रीकांत श्रीनिवासन और डॉक्टर अवनीश सेठ ने बताया कि देश में ज्यादातर अंगदान ब्रेन डेथ के बाद होते हैं, लेकिन अब यह नई तकनीक दिल रुकने के बाद भी अंगदान को आसान बनाएगी। अस्पताल ने कम खर्च वाली स्वदेशी ईसीएमओ मशीन भी विकसित की है। भविष्य में इससे फेफड़े, हृदय और पैक्रियाज जैसे अंग भी बचाए जा सकेंगे।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली के निजी अस्पताल में एशिया में पहली बार एक अनोखी चिकित्सा सफलता हासिल हुई है। अस्पताल ने दावा किया कि एक 55 वर्षीय गीता चावला की मौत के बाद डॉक्टरों ने उनके शरीर में खून का संचार दोबारा शुरू कर दिया। यह काम एक खास मशीन ईसीएमओ की मदद से नॉर्मोथर्मिक रीजनल परफ्यूजन (एनआरपी) तकनीक से किया गया। इससे उनके लिवर और दोनों किडनी को चार घंटे तक पूरी तरह जिंदा रखा गया और तीन मरीजों की जान बचाई गई।
गीता चावला मोटर न्यूरॉन बीमारी से पीड़ित थीं और 6 नवंबर की रात उन्होंने अंतिम सांस ली। परिवार ने तुरंत अंगदान की सहमति दी। डॉक्टरों ने सिर्फ पेट के हिस्से तक खून का प्रवाह शुरू किया ताकि लिवर और किडनी सुरक्षित रहें। गीता का लिवर आईएलबीएस अस्पताल में 48 साल के मरीज को दिया गया, जबकि दोनों किडनी साकेत के एक अस्पताल में 63 और 58 साल के दो मरीजों को प्रत्यारोपित की गईं। यही नहीं, उनकी कॉर्निया और त्वचा भी दान की गई। डॉक्टर श्रीकांत श्रीनिवासन और डॉक्टर अवनीश सेठ ने बताया कि देश में ज्यादातर अंगदान ब्रेन डेथ के बाद होते हैं, लेकिन अब यह नई तकनीक दिल रुकने के बाद भी अंगदान को आसान बनाएगी। अस्पताल ने कम खर्च वाली स्वदेशी ईसीएमओ मशीन भी विकसित की है। भविष्य में इससे फेफड़े, हृदय और पैक्रियाज जैसे अंग भी बचाए जा सकेंगे।
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