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नेपाल की बाढ़ से सबक लेने की जरूरत, विकास मॉडल पर पुनर्विचार जरूरी: सुनीता नारायण
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हिमालय में लगातार निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं के विस्तार को प्राकृतिक संतुलन के लिए हानिकारक
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने नेपाल की हालिया बाढ़ और हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं को जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी बताया है। उन्होंने बुधवार को इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन 2026 में कहा कि विकास के मौजूदा तरीके पर दोबारा सोचने की जरूरत है। नारायण ने जोर दिया कि प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि वर्तमान विकास मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।
नारायण ने कहा, जलवायु परिवर्तन अब साफ दिखाई दे रहा है और हमें विकास के पुराने तरीके पर दोबारा सोचने की जरूरत है। उन्होंने हिमालय में लगातार निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं के विस्तार को प्राकृतिक संतुलन के लिए हानिकारक बताया। भारत में भी मौसम की चरम घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। सीएसई के विश्लेषण के अनुसार, देश में औसतन हर दिन एक चरम मौसम की घटना सामने आ रही है। कहीं भीषण गर्मी तो कहीं भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बन रही है। नारायण ने कहा कि जलवायु संकट से निपटने के लिए केवल छोटे बदलाव पर्याप्त नहीं होंगे, इसके लिए बड़े फैसले और नई सोच की आवश्यकता है। उन्होंने दिल्ली के प्रदूषण का उदाहरण देते हुए सार्वजनिक परिवहन तंत्र में बदलाव की वकालत की। शहरों की योजना ऐसी होनी चाहिए कि हर काम के लिए निजी कार जरूरी न हो।
यमुना की सफाई और शहरी परिवहन
नारायण ने दिल्ली की यमुना नदी की खराब हालत पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि दिल्ली में प्रवेश के समय यमुना में घुलित ऑक्सीजन का स्तर करीब छह होता है, जो आईएसबीटी तक शून्य हो जाता है। वैज्ञानिक रूप से शून्य घुलित ऑक्सीजन वाली नदी को मृत माना जाता है। उन्होंने यमुना की सफाई के लिए सीवेज व्यवस्था में बदलाव की जरूरत बताई। स्थानीय स्तर पर सीवेज प्रबंधन और विकेंद्रीकृत व्यवस्था जैसे विकल्पों पर काम करने का सुझाव दिया।
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टिकाऊ खेती और नए विकास का अवसर
टिकाऊ खेती के संदर्भ में, नारायण ने मिट्टी की गुणवत्ता और जैव विविधता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इसका मतलब केवल जैविक खेती करना नहीं है, बल्कि मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों और बैक्टीरिया की भूमिका को समझना भी है। नारायण ने कहा, बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं चिंता का विषय जरूर हैं लेकिन इनके बीच विकास का नया रास्ता चुनने का मौका भी है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे पुराने विकास मॉडल को भविष्य पर न थोपें। भविष्य में चीजों को अलग और बेहतर तरीके से करने का अवसर हमारे पास है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण ने नेपाल की हालिया बाढ़ और हिमालयी क्षेत्र में बढ़ती प्राकृतिक आपदाओं को जलवायु परिवर्तन की गंभीर चेतावनी बताया है। उन्होंने बुधवार को इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन 2026 में कहा कि विकास के मौजूदा तरीके पर दोबारा सोचने की जरूरत है। नारायण ने जोर दिया कि प्रकृति बार-बार संकेत दे रही है कि वर्तमान विकास मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ नहीं है।
नारायण ने कहा, जलवायु परिवर्तन अब साफ दिखाई दे रहा है और हमें विकास के पुराने तरीके पर दोबारा सोचने की जरूरत है। उन्होंने हिमालय में लगातार निर्माण और जलविद्युत परियोजनाओं के विस्तार को प्राकृतिक संतुलन के लिए हानिकारक बताया। भारत में भी मौसम की चरम घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। सीएसई के विश्लेषण के अनुसार, देश में औसतन हर दिन एक चरम मौसम की घटना सामने आ रही है। कहीं भीषण गर्मी तो कहीं भारी बारिश और बाढ़ की स्थिति बन रही है। नारायण ने कहा कि जलवायु संकट से निपटने के लिए केवल छोटे बदलाव पर्याप्त नहीं होंगे, इसके लिए बड़े फैसले और नई सोच की आवश्यकता है। उन्होंने दिल्ली के प्रदूषण का उदाहरण देते हुए सार्वजनिक परिवहन तंत्र में बदलाव की वकालत की। शहरों की योजना ऐसी होनी चाहिए कि हर काम के लिए निजी कार जरूरी न हो।
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यमुना की सफाई और शहरी परिवहन
नारायण ने दिल्ली की यमुना नदी की खराब हालत पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि दिल्ली में प्रवेश के समय यमुना में घुलित ऑक्सीजन का स्तर करीब छह होता है, जो आईएसबीटी तक शून्य हो जाता है। वैज्ञानिक रूप से शून्य घुलित ऑक्सीजन वाली नदी को मृत माना जाता है। उन्होंने यमुना की सफाई के लिए सीवेज व्यवस्था में बदलाव की जरूरत बताई। स्थानीय स्तर पर सीवेज प्रबंधन और विकेंद्रीकृत व्यवस्था जैसे विकल्पों पर काम करने का सुझाव दिया।
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टिकाऊ खेती और नए विकास का अवसर
टिकाऊ खेती के संदर्भ में, नारायण ने मिट्टी की गुणवत्ता और जैव विविधता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि इसका मतलब केवल जैविक खेती करना नहीं है, बल्कि मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीवों और बैक्टीरिया की भूमिका को समझना भी है। नारायण ने कहा, बढ़ती प्राकृतिक आपदाएं चिंता का विषय जरूर हैं लेकिन इनके बीच विकास का नया रास्ता चुनने का मौका भी है। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे पुराने विकास मॉडल को भविष्य पर न थोपें। भविष्य में चीजों को अलग और बेहतर तरीके से करने का अवसर हमारे पास है।