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दिल्ली हाईकोर्ट ने किया साफ: नाबालिग से दुष्कर्म कर विवाह करना अपराध को पवित्र नहीं बना सकता, जमानत खारिज

Sun, 03 Aug 2025 02:16 AM IST
दुष्यंत शर्मा नितिन राजपूत, नई दिल्ली
नितिन राजपूत, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sun, 03 Aug 2025 02:16 AM IST
सार

अदालत ने एक व्यक्ति की तरफ से दायर उस मामले में जमानत याचिका खारिज कर दी जिसमें उसने लगभग 16 साल की एक नाबालिग लड़की का बार-बार यौन उत्पीड़न करने और बाद में आत्महत्या कर लेने का आरोप लगाया था।

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Molesting  a minor and then marrying her cannot sanctify the crime
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

हाईकोर्ट ने हाल ही के अपने आदेश में कहा कि नाबालिग से दुष्कर्म कर बाद में विवाह करने से इस अपराध को पवित्र नहीं बनाया जा सकता है। अदालत ने एक व्यक्ति की तरफ से दायर उस मामले में जमानत याचिका खारिज कर दी जिसमें उसने लगभग 16 साल की एक नाबालिग लड़की का बार-बार यौन उत्पीड़न करने और बाद में आत्महत्या कर लेने का आरोप लगाया था। यह मामला दुष्कर्म और पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज किया गया था। मृतक की बहन के अनुसार, आरोपी ने कथित तौर पर नाबालिग लड़की को बहलाकर उसके साथ संबंध बनाए और बाद में उसे अपने साथ ले गया।

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शिकायत के मुताबिक, आरोप लगाया गया कि मृतका लगभग दो महीने की गर्भवती थी। साथ ही आरोपी उसके साथ शारीरिक दुर्व्यवहार कर रहा था। यह भी आरोप लगाया गया कि उसके आचरण के चलते मृतका ने अपनी जान दे दी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति संजीव नरूला ने कहा कि इस संदर्भ में कथित विवाह कानूनी रूप से अमान्य है।
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इसे कानून की तरफ से वैधानिक दुष्कर्म के रूप में परिभाषित अपराध को दोषमुक्त करने के लिए सहारा नहीं लिया जा सकता। 34 वर्षीय अभियुक्त ने मृतका के साथ अपने कथित संबंध को इस आधार पर उचित ठहराया कि यह सहमति से हुआ था। इसके अलावा कथित विवाह की सीमा के चलते किया गया है। उसने आगे तर्क दिया कि इस संबंध से उत्पन्न गर्भधारण सहमति से हुआ था। ऐसे में यह दुष्कर्म का अपराध नहीं बनता।
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उम्र का स्पष्ट अंतर शोषण और गलत प्रभाव के बारे में गंभीर चिंताएं बढ़ाता है
न्यायमूर्ति ने याचिका को खारिज करते हुए पाया कि आरोपी की यह दलील कि विवाह के नाम पर सहमति से संबंध बनाया गया था, यह पूरी तरह से अमान्य और गलत है। उन्होंने कहा कि आवेदक 34 वर्ष का होने के चलते पीड़िता की उम्र से दोगुने से भी अधिक उम्र में बड़ा है।

उम्र का यह स्पष्ट अंतर शोषण और गलत प्रभाव के बारे में गंभीर चिंताएं बढ़ाता है खासकर ऐसे माहौल में जहां पीड़िता आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर थी। अदालत ने कहा कि उनके बीच यह असमानता केवल उम्र नहीं बल्कि एक बुनियादी असंतुलन को दर्शाती है जो सहमति की किसी भी धारणा को भ्रामक बना देती है।

ऐसे विवाद का निपटारा उचित साक्ष्य प्रस्तुत करके किया जाना चाहिए
न्यायमूर्ति नरूला ने कहा कि वह अभियुक्त के इस वैकल्पिक तर्क से सहमत नहीं हैं कि कथित घटना के समय मृतका की आयु 19 वर्ष थी। अदालत ने कहा कि इस प्रकार के विवाद का निपटारा मुकदमे के दौरान उचित साक्ष्य प्रस्तुत करके किया जाना चाहिए। यह जमानत देने का आधार नहीं बन सकता विशेषकर जब आरोप किसी नाबालिग से संबंधित हों।


अदालत ने आगे कहा कि वह इस संभावना को नजरअंदाज नहीं कर सकती कि मृतका ने आत्महत्या जैसा चरम कदम इसी तरह के दुर्व्यवहार के कारण उठाया हो जिससे आरोपों की गंभीरता और भी बढ़ जाती है। अदालत ने कहा कि ऐसे में आवेदक के खिलाफ आरोपों की गंभीरता, साक्ष्यों से छेड़छाड़ और भागने के जोखिम व बच्चों के विरुद्ध यौन अपराधों को रोकने में व्यापक जनहित को देखते हुए आरोपी राहत का हकदार नहीं है।
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