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सावधान! शोध में दावा: धूम्रपान नहीं, वायु प्रदूषण से भी बढ़ रहा फेफड़ों का कैंसर, ये दवाएं भी हैं घातक

Mon, 14 Jul 2025 08:43 AM IST
अनुज कुमार अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: अनुज कुमार Updated Mon, 14 Jul 2025 08:43 AM IST
सार

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो और नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट (एनसीआई)  के शोध में खुलासा हुआ है कि नॉन-स्मोकर्स में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। कुछ पारंपरिक हर्बल दवाएं भी इंसान के डीएनए को इतना नुकसान पहुंचा रही हैं कि फेफड़ों में ट्यूमर बनना शुरू हो जाता है। 

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Lung cancer is increasing not due to smoking but due to air pollution
कैंसर का खतरा - फोटो : Adobe stock photos

विस्तार

अब सिर्फ धूम्रपान ही नहीं, वायु प्रदूषण और कुछ पारंपरिक हर्बल दवाएं भी इंसान के डीएनए को इतना नुकसान पहुंचा रही हैं कि फेफड़ों में ट्यूमर बनना शुरू हो जाता है। ताजा अध्ययन में जिन लोगों ने कभी सिगरेट नहीं छुई, उनके फेफड़ों में भी ऐसे म्यूटेशन पाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि प्रदूषित वातावरण में रहने वाले लोगों के ट्यूमर में यह म्यूटेशन अधिक मात्रा में मिले हैं।

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म्यूटेशन से तात्पर्य है डीएनए अनुक्रम (जेनेटिक कोड) में होने वाला स्थायी परिवर्तन। यह परिवर्तन कोशिकाओं के भीतर जीन की संरचना को प्रभावित करता है, जिससे प्रोटीन बनने की प्रक्रिया में गड़बड़ी हो सकती है। म्यूटेशन स्वाभाविक रूप से हो सकता है या बाहरी कारकों जैसे वायु प्रदूषण, धूम्रपान, रेडिएशन या रसायनों के संपर्क से भी हो सकता है।
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इसकी वजह से कैंसर जैसी घातक बीमारियां भी हो सकती हैं। अध्ययन के अनुसार फेफड़ों का कैंसर अब केवल धूम्रपान करने वालों की बीमारी नहीं रहा। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया सैन डिएगो और नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट (एनसीआई) द्वारा किए गए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया है कि नॉन-स्मोकर्स में भी फेफड़ों के कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और इसका सीधा संबंध वायु प्रदूषण और पर्यावरणीय कारकों से जुड़ा है। यह शोध नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ है और इसके निष्कर्ष वैश्विक स्वास्थ्य नीति और शहरी नियोजन के लिए चेतावनी की घंटी की तरह हैं।
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सेकंड हैंड स्मोक से अधिक घातक
सेकंड हैंड स्मोक यानी परोक्ष रूप से धूम्रपान के धुएं का संपर्क कैंसर म्यूटेशन का उतना मजबूत कारण नहीं है, जितना वायु प्रदूषण है। शोध में पाया गया कि जो लोग स्वयं धूम्रपान नहीं करते थे लेकिन सेकंडहैंड स्मोक में रहते थे, उनके ट्यूमर में केवल हल्के बदलाव हुए। न ही उनमें कैंसर बढ़ाने वाला कोई खास जेनेटिक सिग्नेचर मिला।

हर्बल दवाएं भी घातक
शोध में सामने आया कि ताइवान में पारंपरिक चीनी औषधियों में इस्तेमाल होने वाला एरिस्टोलोचिक एसिड भी फेफड़ों के कैंसर से जुड़ा हो सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन औषधियों का धुआं सांस के माध्यम से फेफड़ों तक पहुंचता है और डीएनए को नुकसान पहुंचाता है।


भारत के लिए चेतावनी
अध्ययन भारत के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, जहां बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे नॉन-स्मोकर्स होते हुए भी हर दिन जानलेवा प्रदूषण में सांस ले रहे हैं। फेफड़ों के कैंसर की स्क्रीनिंग नॉन-स्मोकर्स के लिए भी शुरू करने पर विचार किया जाना चाहिए।

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