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गाजियाबाद में कांग्रेस ने उतारा ब्राह्मण उम्मीदवार, गड़बड़ाया महागठबंधन का गणित

Tue, 19 Mar 2019 08:39 PM IST
Amit Digital अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली
अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Amit Digital Updated Tue, 19 Mar 2019 08:39 PM IST
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lok sabha elections 2019 congress gave ticket to dolly sharma from ghaziabad Parliamentary seat
कांग्रेस प्रत्यासी डॉली शर्मा - फोटो : facebook

कांग्रेस ने गाजियाबाद से ब्राह्मण उम्मीदवार डॉली शर्मा को मैदान में उतारकर सपा-बसपा महागठबंधन का गणित गड़बड़ा दिया है। चर्चा तो यहां तक है कि महागठबंधन गाजियाबाद से अपने उम्मीदवार को बदलने पर भी विचार कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो इसे महागठबंधन के लिए एक झटके के रूप में देखा जा सकता है जो

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उसके लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है जबकि कांग्रेस इसका मनोवैज्ञानिक लाभ लेगी।

दरअसल, यूपी के सपा-बसपा महागठबंधन ने सुरेंद्र कुमार मुन्नी को गाजियाबाद से अपना संयुक्त उम्मीदवार बनाया था। एक ब्राह्मण चेहरे के रूप में मुन्नी को गाजियाबाद से ब्राह्मणों के आलावा सपा-बसपा के आधार वोट और अन्य वर्गों से समर्थन मिलने की उम्मीद की जा रही थी। इसी कारण से उन्हें महागठबंधन के जिताऊ उम्मीदवार की तरह देखा जा रहा था। सपा के एक कार्यकर्ता के मुताबिक अब उनका पार्टी के अंदर ही विरोध बढ़ रहा है। एक वर्ग विशेष के लोग उनसे नाराज बताए जा रहे हैं। चुनाव शुरू होते ही वे आचारसंहिता के उल्लंघन के एक मामले में भी फंस गए हैं।
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सोमवार रात को कांग्रेस ने डॉली शर्मा को अपना उम्मीदवार बनाकर गाजियाबाद के चुनावी मैदान में एक नए घमासान का आगाज कर दिया। दरअसल, डॉली शर्मा स्वयं पिछला मेयर का चुनाव लड़ चुकी हैं। उन्हें जीत भले ही हासिल नहीं हुई लेकिन वे दूसरे नंबर पर रहीं। पार्टी में इसे उनकी मजबूती के रूप में देखा गया। लगभग 35 वर्षीय डॉली शर्मा एमबीए हैं और युवा होने के नाते कार्यकर्ताओं में विशेष अपील भी रखती हैं। उनके पिता पुराने कांग्रेसी रहे हैं और वर्तमान में भी संगठन में मजबूत कद रखते हैं। माना जा रहा है कि उन्हें ब्राह्मण मतदाताओं के साथ-साथ मुस्लिम वर्ग से भी बेहतर समर्थन मिल सकता है। 
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लेकिन डॉली शर्मा के मैदान में उतरने से ब्राह्मणों का वोट बंटने की उम्मीद की जा रही है जो सपा-बसपा के गठबंधन के उम्मीदवार मुन्नी के समीकरण के खिलाफ जा सकता है। इसलिए गठबंधन अब यहां से मुन्नी का टिकट बदलकर किसी बनिया उम्मीदवार को मैदान में मौका दे सकता है। हालांकि, इस सवाल पर मुन्नी ने अमर उजाला से कहा कि उन्हें पार्टी की तरफ से अभी तक कोई नकारात्मक संदेश नहीं मिला है और वे अपनी तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे पार्टी के कार्यकर्ता हैं और उन्हें जो भी कहा जाएगा, वे उसे करने के लिए तैयार हैं।


वहीं, अगर भाजपा की बात करें, तो पिछले कुछ चुनाव में गाजियाबाद पार्टी के गढ़ के रूप में तब्दील होता नजर आ रहा है। 2009 में राजनाथ सिंह तो 2014 में वीके सिंह को यहां से बड़ी जीत हासिल हुई थी। विधानसभा चुनाव में भी पार्टी ने यहां से जीत हासिल की थी। लेकिन इन दोनों ही नेताओं के ऊपर हाई प्रोफाइल होने के नाते क्षेत्र में कम समय देने के आरोप लगते रहे हैं। वीके सिंह के खिलाफ तो ‘गुमशुदगी’ के पोस्टर तक जारी कर दिए गए थे। पार्टी संगठन में भी उन्हें पसंद करने वालों की संख्या कम है। कार्यकर्ताओं की शिकायत रही है कि वीके सिंह के ‘जनरल’ होने के स्वभाव ने उन्हें जमीनी हकीकत से दूर कर दिया है। इस तरह अगर पार्टी वीके सिंह को मैदान में उतारती है तो भाजपा को कुछ मुश्किल हो सकती है। 

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