'सुरक्षा की राजनीति' का शिकार बने केजरीवाल!
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अरविंद केजरीवाल पर एक कार्यक्रम के दौरान महिला द्वारा स्याही फेंकने के बाद दिल्ली के सीएम की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। आम आदमी पार्टी ने प्रेस कांफ्रेंस कर दिल्ली पुलिस पर सीएम की सुरक्षा को लेकर कोताही बरतने का आरोप लगाया था।
हालांकि दिल्ली के सीएम को पहले ही जेड श्रेणी की सुरक्षा भी मिली है और अब उनकी सुरक्षा को बढ़ा भी दिया गया है। लेकिन अगर राजनीति में आने से पहले अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी द्वारा गिनाए गए सिद्धान्तों और वसूलों को याद किया जाए तो इसमें बड़ा विरोधाभास नजर आता है।
केजरीवाल ने अपनी राजनीति का ककहरा आम आदमी और उसकी सादगी के ईर्द-गिर्द बुना था। साफ सुथरी राजनीति का दावा और वीआईपी कल्चर के खिलाफ उनका विरोध एक तरह से दिल्ली के सीएम का ट्रेडमार्क बन गया था।
बदल गए हैं आप की राजनीति के सिद्धान्त
इसका फायदा उन्हें विधानसभा चुनावों में जीत और उनकी पार्टी को बढ़ते जनाधार के तौर पर मिला। दिल्ली का आम आदमी केजरीवाल के रूप में सत्ता में अपनी भागीदारी को महसूस करने लगा था।
जनता के अटूट विश्वास का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां एक ओर 49 दिनों की सरकार के बाद इस्तीफे पर आलोचक एवं विरोधी केजरीवाल को भगौड़ा और ड्रामेबाज करार दे रहे थे।
वहीं दूसरी ओर जनता केजरीवाल के दूसरी ताजपोशी पर विचार कर रही थी। याद रहे कि सरकार के इस्तीफे का कारण दिल्ली पुलिस से टकराव ही था।
सुरक्षा को लेकर सीएम बनने से पहले और सीएम की कुर्सी पर काबिज होने के बाद भी अरविंद केजरीवाल दावा करते रहे कि उन्हें और उनके मंत्रिमंडल को किसी भी तरह की अतिरिक्त सुरक्षा की जरूरत नहीं है।
अब सीएम केजरीवाल को चाहिए सुरक्षा
उस समय तक केजरीवाल उसी सुरक्षा व्यव्स्था और जीवनशैली से संतुष्ट नजर आते थे जो देश के एक आम नागरिक को प्राप्त है। इतना ही नहीं उन्हें सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही सरकारी बंगले और सरकारी गाड़ियों से भी परहेज था।
लेकिन मौजूदा दौर में अगर केजरीवाल और दिल्ली की राजनीति विश्लेषण किया जाए तो सच यही है कि समय बदला तो सियासत भी बदल गई, दिल्ली का सीएम बदला तो उसकी सादगी और शैली भी बदल गई।
इसमें कोई दोराय नहीं है कि आज स्याही प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से मुद्दों को जन्म दे रही है। विरोध के लिए लिखने के साथ फेंकना भी चलन बन गया है।
यह दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के दूसरे लोगों के साथ पहले भी हो चुका है। लेकिन क्या इस चलन के साथ आप की साफ सुथरी राजनीति के सिद्धान्त और वीआईपी कल्चर के कलेवर का पैमाना भी बदल गया है।