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माया मिली न राम: घाटे का सौदा साबित हुआ कांग्रेस को 'आप' के साथ जाना, पार्टी के नेता भी चले गए और सीटें भी
Tue, 04 Jun 2024 11:29 PM IST
श्याम जी.
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: श्याम जी.
Updated Tue, 04 Jun 2024 11:29 PM IST
सार
प्रदेश कांग्रेस के अधिकांश नेता आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने पार्टी आलाकमान के समक्ष ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक तौर पर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करने का विरोध किया था।
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राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
कांग्रेस के लिए आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ना काफी घाटे का सौदा साबित हुआ। कांग्रेस को एक ओर अपने हिस्से में आई एक भी सीट पर जीत नसीब नहीं हुई। वहीं, दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के साथ जाने के विरोध में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष व अन्य नेताओं ने चुनाव के बीच में पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। इस तरह उसे न राम मिला न माया।
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प्रदेश कांग्रेस के अधिकांश नेता आम आदमी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने पार्टी आलाकमान के समक्ष ही नहीं, बल्कि सार्वजनिक तौर पर आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करने का विरोध किया था। मगर कांग्रेस आलाकमान ने राष्ट्रीय परिदृश्य के मद्देनजर भाजपा को हराने के लिए अपने नेताओं के विरोध को दरकिनार करके आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि उसके प्रदेश अध्यक्ष अरविंदर सिंह लवली ने कुछ नेताओं के साथ त्याग पत्र देकर भाजपा का दामन थाम लिया। उन्होंने यह कदम उठाने से पहले गठबंधन को लेकर पार्टी की जमकर किरकिरी करने का कार्य किया था। इस दौरान कांग्रेस व आम आदमी पार्टी के समक्ष असहज स्थिति पैदा हो गई थी।
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लवली के इस कदम की वजह से कांग्रेस व आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच एक-दूसरे के प्रति अविश्वास का भाव पैदा हो गया था। इसका असर चुनाव परिणाम में स्पष्ट रूप से देखने को मिला। दिल्ली के पड़ोसी राज्यों में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा, जबकि दिल्ली में भाजपा ने लगातार तीसरी बार क्लीन स्वीप कर दिया। इतना ही नहीं, उसके अधिकतर उम्मीदवारों ने बड़े अंतर से जीत हासिल की।
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