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Delhi NCR News: मिर्गी के लंबे दौरों में क्लोबाजम भी हो सकती है कारगर, अध्ययन में मिडाजोलम जितना असर
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- एम्स और जीबी पंत अस्पताल के विशेषज्ञों का अध्ययन; दोनों दवाओं से करीब एक मिनट में रुके लंबे दौरे, बड़े अध्ययन की जरूरत
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। मिर्गी के लंबे समय तक चलने वाले दौरों को रोकने में मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम दवा नाक के जरिए दी जाने वाली मिडाजोलम जितनी प्रभावी हो सकती है। एम्स नई दिल्ली और जीबी पंत अस्पताल के विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक अध्ययन में दोनों दवाओं के प्रभाव में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया। हालांकि, विशेषज्ञों ने इसे छोटे स्तर का अध्ययन बताते हुए व्यापक स्तर पर इसकी पुष्टि के लिए बड़े अध्ययन की जरूरत बताई है।
शोधकर्ताओं ने ऐसे 95 मरीजों को अध्ययन में शामिल किया, जिन्हें नियमित दवा लेने के बावजूद मिर्गी के दौरे आते थे। इनमें 47 मरीजों को नाक के जरिए मिडाजोलम और 48 मरीजों को मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम दी गई। जब दौरा दो मिनट से अधिक समय तक जारी रहा, तब संबंधित दवा दी गई। अध्ययन के दौरान दोनों दवाओं से लंबे दौरे करीब एक मिनट में रुक गए। दौरा रोकने में लगे समय के मामले में दोनों दवाओं के बीच अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, किसी मरीज में इलाज विफल होने या दौरा दोबारा आने का मामला सामने नहीं आया। गंभीर दुष्प्रभाव भी नहीं देखे गए। मिडाजोलम लेने वाले कुछ मरीजों में छींक, आंखों से पानी आने और नाक में जलन जैसी हल्की समस्याएं हुईं। वहीं, क्लोबाजम लेने वाले एक मरीज को खांसी की शिकायत हुई।
ग्रामीण इलाकों में हो सकती है उपयोगी
एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर एवं प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी के अनुसार, मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम का एक फायदा यह है कि इसे देने के लिए नाक में स्प्रे करने की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही गोली को पीसने की आवश्यकता भी नहीं होती। अध्ययन में कहा गया है कि नाक के जरिए दी जाने वाली दवा की लागत अधिक हो सकती है और ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में इसकी उपलब्धता भी चुनौती हो सकती है। ऐसे में सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में क्लोबाजम एक सुविधाजनक विकल्प हो सकती है।
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हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह सीमित संख्या में मरीजों पर किया गया अध्ययन है। इसलिए आपातकालीन उपचार में क्लोबाजम के व्यापक इस्तेमाल की सिफारिश से पहले बड़े और विस्तृत अध्ययनों की आवश्यकता होगी। अध्ययन का निष्कर्ष है कि दोनों दवाओं का असर लगभग समान पाया गया, जबकि क्लोबाजम कुछ परिस्थितियों में अपेक्षाकृत सुविधाजनक और कम लागत वाला विकल्प हो सकती है।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। मिर्गी के लंबे समय तक चलने वाले दौरों को रोकने में मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम दवा नाक के जरिए दी जाने वाली मिडाजोलम जितनी प्रभावी हो सकती है। एम्स नई दिल्ली और जीबी पंत अस्पताल के विशेषज्ञों द्वारा किए गए एक अध्ययन में दोनों दवाओं के प्रभाव में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं पाया गया। हालांकि, विशेषज्ञों ने इसे छोटे स्तर का अध्ययन बताते हुए व्यापक स्तर पर इसकी पुष्टि के लिए बड़े अध्ययन की जरूरत बताई है।
शोधकर्ताओं ने ऐसे 95 मरीजों को अध्ययन में शामिल किया, जिन्हें नियमित दवा लेने के बावजूद मिर्गी के दौरे आते थे। इनमें 47 मरीजों को नाक के जरिए मिडाजोलम और 48 मरीजों को मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम दी गई। जब दौरा दो मिनट से अधिक समय तक जारी रहा, तब संबंधित दवा दी गई। अध्ययन के दौरान दोनों दवाओं से लंबे दौरे करीब एक मिनट में रुक गए। दौरा रोकने में लगे समय के मामले में दोनों दवाओं के बीच अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं पाया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, किसी मरीज में इलाज विफल होने या दौरा दोबारा आने का मामला सामने नहीं आया। गंभीर दुष्प्रभाव भी नहीं देखे गए। मिडाजोलम लेने वाले कुछ मरीजों में छींक, आंखों से पानी आने और नाक में जलन जैसी हल्की समस्याएं हुईं। वहीं, क्लोबाजम लेने वाले एक मरीज को खांसी की शिकायत हुई।
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ग्रामीण इलाकों में हो सकती है उपयोगी
एम्स के न्यूरोलॉजी विभाग की प्रोफेसर एवं प्रमुख डॉ. मंजरी त्रिपाठी के अनुसार, मुंह में घुलने वाली क्लोबाजम का एक फायदा यह है कि इसे देने के लिए नाक में स्प्रे करने की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही गोली को पीसने की आवश्यकता भी नहीं होती। अध्ययन में कहा गया है कि नाक के जरिए दी जाने वाली दवा की लागत अधिक हो सकती है और ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में इसकी उपलब्धता भी चुनौती हो सकती है। ऐसे में सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में क्लोबाजम एक सुविधाजनक विकल्प हो सकती है।
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हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह सीमित संख्या में मरीजों पर किया गया अध्ययन है। इसलिए आपातकालीन उपचार में क्लोबाजम के व्यापक इस्तेमाल की सिफारिश से पहले बड़े और विस्तृत अध्ययनों की आवश्यकता होगी। अध्ययन का निष्कर्ष है कि दोनों दवाओं का असर लगभग समान पाया गया, जबकि क्लोबाजम कुछ परिस्थितियों में अपेक्षाकृत सुविधाजनक और कम लागत वाला विकल्प हो सकती है।