पैर गंवाने के बाद भी नहीं रूकीं किरन, हाफ मैराथन में दौड़कर ब्लेड रनर के लिए नाम से हुईं मशहूर
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हादसे में ट्रेन के नीचे आकर एक पैर गंवाने वाली किरन कनौजिया युवाओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं हैं। हादसे में पैर गंवाने के बावजूद दौड़ने की जिद और कड़ी मेहनत ने ओल्ड फरीदाबाद निवासी किरन कनौजिया को देश की पहली महिला ब्लेड रनर बना दिया।
हैदराबाद और मुबंई हाफ मैराथन जीत कर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान बनाई गई है। इसके साथ ही परिवार की आर्थिक स्थिति को सुधारने में भी अहम भूमिका अदा की है।
ओल्ड फरीदाबाद निवासी किरन के परिवार में पांच सदस्य हैं। मम्मी-पापा के अलावा दो छोटे भाई बहन हैं। पिता भीखा कनौजिया सेक्टर-14 में कपड़े प्रेस करने का काम करते हैं। अपने जन्मदिन के ठीक एक दिन पहले किरन ने एक हादसे में बायां पैर गंवा दिया था।
24 दिसंबर, 2011 को किरन ट्रेन से हैदराबाद से फरीदाबाद आ रही थीं। वे दरवाजे के पास लोअर बर्थ पर बैठी थीं। पलवल के पास बदमाशों ने हाथ से बैग छीनने का प्रयास किया। वह बदमाशों से भिड़ गईं। इस दौरान वह आपाधापी में ट्रैक पर गिर पड़ीं। शोर मचाया तो ट्रेन रोककर लोगों ने उन्हें ट्रैक से उठाया और पटरी में फंसे पैर को निकाला।
इसके बाद वह वापस ट्रेन से फरीदाबाद पहुंचीं। वहां से उन्हें अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टरों ने कहा कि उनकी नर्व क्रैश हो गई है। ऐसे में पैर काटना पड़ेगा। इसके बाद किरन का पैर काट दिया गया। छह महीने के बाद दर्द कम नहीं होने पर जब डॉक्टरों से मिलीं तो उन्होंने कहा कि तुम्हें दौड़ना थोड़े ही है, एक ऑपरेशन और करना पड़ेगा।
यह बात सुनकर किरन को बड़ा धक्का लगा। उन्होंने उसी वक्त मन में ठान लिया कि एक दिन जरूर दौड़कर दिखाऊंगी। इसके बाद किरन 21 किलोमीटर जिसे हॉफ मैराथन कहा जाता है में भी छह बार हिस्सा ले चुकी हैं। वह पांच से 10 किलोमीटर के मैराथन में 15 बार हिस्सा ले चुकी हैं। उनके इस साहस पर दर्जनों संगठन सम्मानित कर चुके हैं।
पापा के शब्दों ने दिया हौंसला
किरन ने बताया कि पापा भीखा कनौजिया हमेशा कहते थे कि जान बची तो लाखों पाए। यह लाइन मुझे हौसला देती है। अस्पताल आते-जाते समय अपने जैसे लोगों को देखतीं, जो मुझसे भी अधिक दर्दनाक हादसे झेल चुके थे। उनसे जीने की प्रेरणा मिलती। हादसे के बाद जब हैदराबाद लौटी तो वहां के एक अस्पताल में आना जाना हुआ करता था।
उसमें कुछ ऐसे थे जो रनिंग व साइकलिंग करते थे। इसके बाद मैंने अपने जैसों का एक ग्रुप बनाया। डॉक्टरों ने सहायता की और कामयाबी का सफर शुरू कर दिया। शुरूआत में जब कृत्रिम पैर लगाकर अभ्यास करती तो पैर की खाल छिल जाती थी। यह दर्द आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता।
किरन बताती हैं कि मेरे अंदर इतनी क्षमता है, यह मुझे बाद में पता चला। वर्ष 2013 में पांच किलोमीटर के मैराथन से सफर शुरू किया। बाद में यह 10 फिर 21 किलोमीटर हाफ मैराथन तक पहुंचा।
घटना के बाद यह तय कर लिया था कि किसी भी सूरत में घर नहीं बैठना है। उन्होंने बताया कि हैदराबाद में हाफ मैराथन साढ़े तीन घंटे, दिल्ली की रेस 2.58 और इस बार मुंबई मैराथन 2.44 मिनट में पूरी की है।