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गलत मॉडल उत्तर कुंजी को कोर्ट में दी जा सकती है चुनौती : हाईकोर्ट
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- अदालत ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के आदेश को किया रद्द
- यूपीएससी फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा-2022 के एक अभ्यर्थी की याचिका बिना मेरिट पर विचार किए खारिज कर दी गई थी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ल। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी भर्ती परीक्षा की मॉडल आंसर की (ऑफिशियल उत्तर कुंजी) के सही होने पर सवाल उठाना और उत्तर पुस्तिका के दोबारा मूल्यांकन (री-इवैल्यूएशन) की मांग करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि मॉडल आंसर की में दिया गया उत्तर स्पष्ट रूप से गलत है तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सी हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें यूपीएससी फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा-2022 के एक अभ्यर्थी की याचिका बिना मेरिट पर विचार किए खारिज कर दी थी।
याचिकाकर्ता ओबीसी (नॉन-क्रीमी लेयर) वर्ग का अभ्यर्थी था, जो यूपीएससी फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा-2022 में सफल नहीं हो पाया था। उसने जनरल स्टडीज पेपर-1 के प्रश्न संख्या 88 और 96 की मॉडल आंसर की को चुनौती देते हुए कहा था कि दोनों प्रश्नों के सही उत्तर गलत घोषित किए गए हैं। ऑफिशियल आंसर की में दोनों प्रश्नों का उत्तर विकल्प (डी) बताया गया था, जबकि अभ्यर्थी का दावा था कि सही उत्तर क्रमशः विकल्प (सी) और (बी) हैं। कैट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि उम्मीदवार उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मांग नहीं कर सकते। इस फैसले के खिलाफ अभ्यर्थी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
उत्तर स्पष्ट रूप से गलत हो तो न्यायालय कर सकता है हस्तक्षेप : हाईकोर्ट
पीठ ने कहा कि कैट ने यह समझने में गलती की कि अभ्यर्थी उत्तर पुस्तिका का दोबारा मूल्यांकन नहीं, बल्कि मॉडल आंसर की की शुद्धता को चुनौती दे रहा था। अदालत ने कहा कि यदि मॉडल आंसर की में दिया गया उत्तर स्पष्ट रूप से गलत हो तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। पीठ ने कहा कि अदालतें हर मामले में दखल नहीं देंगी, लेकिन जहां उत्तर स्पष्ट रूप से गलत होगा, वहां न्याय के हित में हस्तक्षेप करना जरूरी है। हाईकोर्ट ने कैट का आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई और मेरिट के आधार पर निर्णय लेने के लिए वापस कैट के पास भेज दिया।
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- यूपीएससी फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा-2022 के एक अभ्यर्थी की याचिका बिना मेरिट पर विचार किए खारिज कर दी गई थी
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ल। हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सरकारी भर्ती परीक्षा की मॉडल आंसर की (ऑफिशियल उत्तर कुंजी) के सही होने पर सवाल उठाना और उत्तर पुस्तिका के दोबारा मूल्यांकन (री-इवैल्यूएशन) की मांग करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। यदि मॉडल आंसर की में दिया गया उत्तर स्पष्ट रूप से गलत है तो अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है। यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सी हरि शंकर और न्यायमूर्ति ओम प्रकाश शुक्ला की पीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अदालत ने सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (कैट) के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें यूपीएससी फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा-2022 के एक अभ्यर्थी की याचिका बिना मेरिट पर विचार किए खारिज कर दी थी।
याचिकाकर्ता ओबीसी (नॉन-क्रीमी लेयर) वर्ग का अभ्यर्थी था, जो यूपीएससी फॉरेस्ट सर्विस परीक्षा-2022 में सफल नहीं हो पाया था। उसने जनरल स्टडीज पेपर-1 के प्रश्न संख्या 88 और 96 की मॉडल आंसर की को चुनौती देते हुए कहा था कि दोनों प्रश्नों के सही उत्तर गलत घोषित किए गए हैं। ऑफिशियल आंसर की में दोनों प्रश्नों का उत्तर विकल्प (डी) बताया गया था, जबकि अभ्यर्थी का दावा था कि सही उत्तर क्रमशः विकल्प (सी) और (बी) हैं। कैट ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी थी कि उम्मीदवार उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मांग नहीं कर सकते। इस फैसले के खिलाफ अभ्यर्थी ने हाईकोर्ट का रुख किया।
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उत्तर स्पष्ट रूप से गलत हो तो न्यायालय कर सकता है हस्तक्षेप : हाईकोर्ट
पीठ ने कहा कि कैट ने यह समझने में गलती की कि अभ्यर्थी उत्तर पुस्तिका का दोबारा मूल्यांकन नहीं, बल्कि मॉडल आंसर की की शुद्धता को चुनौती दे रहा था। अदालत ने कहा कि यदि मॉडल आंसर की में दिया गया उत्तर स्पष्ट रूप से गलत हो तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकता है। पीठ ने कहा कि अदालतें हर मामले में दखल नहीं देंगी, लेकिन जहां उत्तर स्पष्ट रूप से गलत होगा, वहां न्याय के हित में हस्तक्षेप करना जरूरी है। हाईकोर्ट ने कैट का आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई और मेरिट के आधार पर निर्णय लेने के लिए वापस कैट के पास भेज दिया।
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