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राष्ट्रपति के गोद लिए गांव में नहीं है पीने का पानी, महिलाएं खींच रही बैलगाड़ी

Fri, 01 Jul 2016 07:58 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव
ब्यूरो/अमर उजाला, गुड़गांव Updated Fri, 01 Jul 2016 07:58 PM IST
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in President adopted village do not have drinking water, women pull cart
हरचंदरपुर गांव - फोटो : अमर उजाला

एक ओर जहां देश की बेटियां  लड़ाकू विमान उड़ा कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं, वहीं  राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के गोद लिए गांव हरचंदपुर गांव की महिलाएं बैलगाड़ी खींचने पर मजबूर हैं। शिक्षा का दूर-दूर तक कोई इंतजाम नहीं है।

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लोगों के पास रोजगार नहीं है। बता दें कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुड़गांव व मेवात के पांच गांवों को गोद लिया है। जिसमें से एक गांव हरचंदपुर है। हरचंदपुर गांव जिला मुख्यालय से 33 किमी की दूरी पर है, जो अरावली पहाड़ी के नीचे बसा हुआ है।
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गांव की सरपंच सविता ने बताया कि गांव की समस्याओं की जानकारी राष्ट्रपति सचिवालय को दे दी गई है। किसी जमाने में अंग्रेजों से लोहा लेने वाले गांव के लोग आजादी के 66 साल बाद भी पीने के पानी को तरस रहे हैं। पेश है अमर उजाला संवाददाता मयंक तिवारी व फोटो जर्नलिस्ट दिनेश कुमार की ग्राउंड रिपोट।

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मेरी बेटियों को शिक्षा व रोजगार दिला दो साहब

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हरचंदरपुर गांव - फोटो : अमर उजाला

हरचंदपुर गांव में प्रवेश करते ही एक बैलगाड़ी पर चारा लिए चार-पांच महिलाएं गांव की ओर जाती दिखीं। अमर उजाला के कैमरा मैन के रुकते ही वह पहले तो झिझकीं फिर बाद में राष्ट्रपति का हवाला देते हुई बोलीं कि उनके बच्चों को रोजगार दिलवा दें।

संवाददाता ने पूछा कि बैलगाड़ी क्यों चलाती हैं तो गीता बोल पड़ती है कि बालिकाओं के पढ़न का इंतजाम नहीं है। बच्चों को रोजगार नहीं मिल रहा है। घर के पुरुष किसी और की नौकरी करते हैं तो वह खेत का काम करने पर मजबूर हैं।

गांव में महिलाओं की शिक्षा के लिए कोई इंतजाम नहीं है। आठवीं तक की शिक्षा के बाद पढ़ाई के लिए सोहना जाना पड़ता है। गांव के लोगों की मांग है कि गांव में डिग्री कॉलेज खोला जाए।

1856 में गांव वालों ने अंग्रेजों पर किया था हमला

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हरचंदरपुर गांव - फोटो : अमर उजाला
गुलामी के दौरान 1856 में अंग्रेजों की टुकड़ी रेवाड़ी के राव तुलाराम के पास से बल्लभगढ़ स्टेशन लौट रही थी। उस दौरान हरचंदपुर गांव के लोगों ने अभय गुर्जर के साथ मिल कर उन पर हमला कर दिया था।

अंग्रेजी सेना के कई लोग मारे गए थे। हमले से गुस्साएं अंग्रेजों ने उस गांव का राजस्व बगल के राजपूतों को सौंप दिया था। गांव का पूरा रिकॉर्ड कच्चे में था।

गांव के लोगों ने धीरे-धीरे राजपूतों से अपनी जमीन खरीदी है।

गांव में सबसे ज्यादा बोर, पर पीने को नहीं है  पानी

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हरचंदरपुर गांव - फोटो : अमर उजाला

गांव के रहने वाले मास्टर जीत राम कहते हैं कि उनके गांव में सबसे ज्यादा बोर हैं। पहाड़ी के नीचे बसे होने के कारण पानी का संकट भी है। पाइप टूटी हुई। लोगों के घर तक पानी नहीं पहुंच पा रहा है।

गांव के रहने वाले विक्रम कहते हैं कि महिलाओं को डिलवरी के लिए दस किमी दूर सोहना ले जाना पड़ता है। गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं है।

महिपाल का कहना है कि सबसे पहले तो गांव में पानी की व्यवस्था होनी चाहिए। जिसके बाद शिक्षा का इंतजाम होना चाहिए। राष्ट्रपति के गोद लिए जाने के बाद गांव वालों के दिन सुधरने की उम्मीद है।

गांव की जमीन है बाहरी लोगों के पास

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हरचंदपुर गांव सभा में साढ़े चार हजार किले जमीन है। जिसमें से महज पांच सौ एकड़ जमीन ही गांव के मूल किसानों के पास है। बाकी अन्य जमीन बाहरी लोगों ने खरीद रखी है। सरकार जमीन का अधिग्रहण करे, डिग्री कॉलेज खोले व अन्य विकास काम करे।

इसे भी जानें
- गांव की आबादी साढ़े चार हजार है।
- गांव में 475 घर हैं।
- 1700 वोट हैं।
- गांव में 9 बोर हैं। जिससे पानी की आपूर्ति होती है।

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