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एक ही कंपनी को न मिले देश में ऑक्सीटोसिन निर्माण अधिकार, आईएमए ने की पुनर्विचार की मांग
Thu, 14 Feb 2019 12:53 AM IST
Priyesh Mishra
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Priyesh Mishra
Updated Thu, 14 Feb 2019 12:53 AM IST
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आईएमए
- फोटो : पानीपत
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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) ने केंद्र सरकार से मांग की है कि ऑक्सीटोसिन दवा का निर्माण देश में सिर्फ एक ही कंपनी को नहीं दिया जाना चाहिए। ऑक्सीटोसिन की मांग अधिक होने के कारण एक ही कंपनी इसे इतनी मात्रा में तैयार नहीं कर सकती। आमतौर पर डेयरी और प्रसव के दौरान अस्पतालों में ऑक्सीटोसिन का इस्तेमाल किया जाता है।
सरकार ने इसका दुरुपयोग रोकने के लिए हाल ही में कर्नाटक की एक कंपनी को निर्माण अधिकार दिया। इसके अलावा पूरे देश में ऑक्सीटोसिन निर्माण पर प्रतिबंध लगाया गया था। अब आईएमए ने इसी फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है।
आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सांतनु सेन के मुताबिक, पशु चिकित्सा संबंधी उद्देश्य के लिए ऑक्सीटोसिन निर्माण की जिम्मेदारी केएपीएल को दिए जाने पर संगठन को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इस जीवन रक्षक दवा के निर्माण पर रोक लगाने से उपलब्धता प्रभावित होगी।
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वहीं, इसके उत्पादन में अनावश्यक अड़चनों का सामना करना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे आवश्यक दवाओं की सूची में रखा है। नतीजतन, सिर्फ एक कंपनी को इसके निर्माण की अनुमति देने से बच्चे के जन्म के बाद रक्तस्राव के कारण कई माताओं के जीवन को खतरा हो सकता है। वहीं बीमारी और मृत्युदर में बढ़ोत्तरी भी हो सकती है।
दरअसल, दुनिया भर में गर्भावस्था और प्रसव के कारण होने वाली मौतों में से 20 प्रतिशत (56 हजार) केवल भारत में होती हैं। नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि पोस्टपार्टम हेमरेज (पीपीएच) भारत में मातृ मृत्यु दर के लगभग 22 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार है।
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सरकार ने इसका दुरुपयोग रोकने के लिए हाल ही में कर्नाटक की एक कंपनी को निर्माण अधिकार दिया। इसके अलावा पूरे देश में ऑक्सीटोसिन निर्माण पर प्रतिबंध लगाया गया था। अब आईएमए ने इसी फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है।
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आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सांतनु सेन के मुताबिक, पशु चिकित्सा संबंधी उद्देश्य के लिए ऑक्सीटोसिन निर्माण की जिम्मेदारी केएपीएल को दिए जाने पर संगठन को कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन इस जीवन रक्षक दवा के निर्माण पर रोक लगाने से उपलब्धता प्रभावित होगी।
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वहीं, इसके उत्पादन में अनावश्यक अड़चनों का सामना करना होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे आवश्यक दवाओं की सूची में रखा है। नतीजतन, सिर्फ एक कंपनी को इसके निर्माण की अनुमति देने से बच्चे के जन्म के बाद रक्तस्राव के कारण कई माताओं के जीवन को खतरा हो सकता है। वहीं बीमारी और मृत्युदर में बढ़ोत्तरी भी हो सकती है।
दरअसल, दुनिया भर में गर्भावस्था और प्रसव के कारण होने वाली मौतों में से 20 प्रतिशत (56 हजार) केवल भारत में होती हैं। नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि पोस्टपार्टम हेमरेज (पीपीएच) भारत में मातृ मृत्यु दर के लगभग 22 प्रतिशत मामलों के लिए जिम्मेदार है।