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Delhi NCR News: जेब में बस पास, सफर के लिए रोज देना पड़ रहा किराया
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पांचवें दिन भी दिल्ली रही बेहाल
बस हड़ताल ने बिगाड़ा यात्रियों का बजट, ऑटो-ई-रिक्शा और मेट्रो पर बढ़ी निर्भरता, कुछ चालक लौटे, कई अब भी मांगों पर अड़े
नई दिल्ली/ पूर्वी दिल्ली।
दिल्ली में बस चालकों की हड़ताल शनिवार को पांचवें दिन भी यात्रियों पर भारी पड़ी। बस पास बनवाकर पूरे महीने के सफर का खर्च तय कर चुके लोगों को अब रोज अतिरिक्त किराया देना पड़ रहा है। कहीं बस के इंतजार में यात्री घंटों खड़े रहे तो कहीं ऑटो, ई-रिक्शा और कैब ही सहारा बने। कुछ डिपो से चालक ड्यूटी पर लौटे और कुछ रूटों पर बसें चलीं, लेकिन कई डिपो में बसें खड़ी रहीं। जहां बस पहुंची, वहां यात्रियों की भीड़ टूट पड़ी। सीट पाने के लिए यात्रियों में धक्का-मुक्की और कहासुनी तक की स्थिति बनी।
कालकाजी, आनंद विहार, सीलमपुर और मौजपुर समेत कई प्रमुख बस स्टैंडों पर शनिवार को यात्रियों की लंबी कतारें नजर आईं। बस सेवा बाधित होने का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ा जो रोज काम, पढ़ाई या इलाज के लिए बसों पर निर्भर हैं। सीलमपुर बस स्टैंड पर मिले सौरव ने बताया कि उन्होंने पूरे महीने का बस पास इस उम्मीद में बनवाया था कि रोजाना आने-जाने का खर्च सीमित रहेगा। हड़ताल शुरू होने के बाद पास का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है और हर दिन अलग से किराया देना पड़ रहा है। मौजपुर के सुनील कुमार ने बताया कि पहले एक बस से सीधे गंतव्य तक पहुंच जाते थे। अब कई बार साधन बदलने पड़ रहे हैं। इससे सफर का समय भी बढ़ा है और जेब पर बोझ भी।
एम्स के बाहर कैंसर मरीज की बेटी बीना ने कहा कि अस्पताल पहुंचने के लिए बस का इंतजार करना मुश्किल हो गया है। घरेलू सहायिका किरण देवी के मुताबिक, बस नहीं मिलने पर एक तरफ के सफर में ही 80 रुपये ऑटो का किराया देना पड़ा। डीयू की छात्रा सौम्या ने बताया कि बस के विकल्प के तौर पर मेट्रो लेने पर भीड़ काफी बढ़ गई है। बुजुर्ग रामलाल गुप्ता के लिए मेट्रो स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो रहा है।
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यमुनापार में सामने आई कनेक्टिविटी की पुरानी परेशानी
हड़ताल ने यमुनापार के गांवों और अंदरूनी बस्तियों में सार्वजनिक परिवहन की पुरानी समस्या को भी सामने ला दिया। घड़ौली, कोंडली, चिल्ला सरोदा बांगर, दल्लूपुरा, समसपुर जागीर और पटपड़गंज गांव के कई हिस्सों में लोगों को पहले ही ई-रिक्शा या ऑटो से मुख्य सड़क अथवा मेट्रो स्टेशन तक पहुंचना पड़ता है। संकरी गलियां, अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग के कारण कई अंदरूनी इलाकों में बड़ी बसों की पहुंच सीमित है। पुश्ता और यमुना से सटे क्षेत्रों में पैदल रास्तों और फुटपाथ की कमी समस्या को और बढ़ाती है। बस सेवा ठप होने पर छोटी दूरी का यही अतिरिक्त सफर लोगों की जेब पर बड़ा बोझ बन गया है। बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और रोज काम पर जाने वालों को इसका ज्यादा सामना करना पड़ रहा है।
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मांग : 45 हजार हाथ में हर महीने दे सरकार
हड़ताल कर रहे कर्मचारी न्यूनतम दिहाड़ी 862 रुपये से बढ़ाकर 2,000 रुपये प्रतिदिन या करीब 45 हजार रुपये मासिक इन-हैंड वेतन की मांग कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि कर्मचारियों की मांग के अनुरूप वेतन वृद्धि करना संभव नहीं है। सरकार के सामने यह चुनौती भी है कि एक वर्ग के अनुबंध कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने पर दूसरे विभागों के अनुबंध कर्मचारी भी इसी तरह की मांग उठा सकते हैं।
आरोप : निजी ऑपरेटरों का दबदबा बढ़ा
-डीटीसी कर्मचारी एकता यूनियन के अध्यक्ष ललित चौधरी का आरोप है कि निजी ऑपरेटरों के बढ़ते दबदबे के कारण चालकों और परिचालकों की स्थिति खराब हुई है। उनके मुताबिक 862 रुपये की न्यूनतम दिहाड़ी में चालक बस चलाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं और दुर्घटना या बस को नुकसान होने की स्थिति में आर्थिक दंड भी भुगतना पड़ता है। यूनियन का कहना है कि वेतन समेत प्रमुख मांगों पर लिखित और ठोस निर्णय होने तक हड़ताल वापस नहीं ली जाएगी। वहीं डीटीसी अधिकारियों के अनुसार हड़ताल खत्म कराने के लिए कर्मचारियों से लगातार बातचीत की जा रही है।
असर : रोजाना 40-41 लाख यात्री हो रहे हलकान
आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में रोज करीब 40-41 लाख यात्री बसों से सफर करते हैं। सेवा बाधित होने से काम, स्कूल, कॉलेज और अस्पताल जाने वाले यात्रियों की मुश्किलें बढ़ी हैं। टिकट और पास से रोज करीब पांच करोड़ रुपये का राजस्व संग्रह होता है। चार दिन की हड़ताल में अब तक करीब 15 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का अनुमान है।
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बस हड़ताल ने बिगाड़ा यात्रियों का बजट, ऑटो-ई-रिक्शा और मेट्रो पर बढ़ी निर्भरता, कुछ चालक लौटे, कई अब भी मांगों पर अड़े
नई दिल्ली/ पूर्वी दिल्ली।
दिल्ली में बस चालकों की हड़ताल शनिवार को पांचवें दिन भी यात्रियों पर भारी पड़ी। बस पास बनवाकर पूरे महीने के सफर का खर्च तय कर चुके लोगों को अब रोज अतिरिक्त किराया देना पड़ रहा है। कहीं बस के इंतजार में यात्री घंटों खड़े रहे तो कहीं ऑटो, ई-रिक्शा और कैब ही सहारा बने। कुछ डिपो से चालक ड्यूटी पर लौटे और कुछ रूटों पर बसें चलीं, लेकिन कई डिपो में बसें खड़ी रहीं। जहां बस पहुंची, वहां यात्रियों की भीड़ टूट पड़ी। सीट पाने के लिए यात्रियों में धक्का-मुक्की और कहासुनी तक की स्थिति बनी।
कालकाजी, आनंद विहार, सीलमपुर और मौजपुर समेत कई प्रमुख बस स्टैंडों पर शनिवार को यात्रियों की लंबी कतारें नजर आईं। बस सेवा बाधित होने का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ा जो रोज काम, पढ़ाई या इलाज के लिए बसों पर निर्भर हैं। सीलमपुर बस स्टैंड पर मिले सौरव ने बताया कि उन्होंने पूरे महीने का बस पास इस उम्मीद में बनवाया था कि रोजाना आने-जाने का खर्च सीमित रहेगा। हड़ताल शुरू होने के बाद पास का इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है और हर दिन अलग से किराया देना पड़ रहा है। मौजपुर के सुनील कुमार ने बताया कि पहले एक बस से सीधे गंतव्य तक पहुंच जाते थे। अब कई बार साधन बदलने पड़ रहे हैं। इससे सफर का समय भी बढ़ा है और जेब पर बोझ भी।
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एम्स के बाहर कैंसर मरीज की बेटी बीना ने कहा कि अस्पताल पहुंचने के लिए बस का इंतजार करना मुश्किल हो गया है। घरेलू सहायिका किरण देवी के मुताबिक, बस नहीं मिलने पर एक तरफ के सफर में ही 80 रुपये ऑटो का किराया देना पड़ा। डीयू की छात्रा सौम्या ने बताया कि बस के विकल्प के तौर पर मेट्रो लेने पर भीड़ काफी बढ़ गई है। बुजुर्ग रामलाल गुप्ता के लिए मेट्रो स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो रहा है।
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यमुनापार में सामने आई कनेक्टिविटी की पुरानी परेशानी
हड़ताल ने यमुनापार के गांवों और अंदरूनी बस्तियों में सार्वजनिक परिवहन की पुरानी समस्या को भी सामने ला दिया। घड़ौली, कोंडली, चिल्ला सरोदा बांगर, दल्लूपुरा, समसपुर जागीर और पटपड़गंज गांव के कई हिस्सों में लोगों को पहले ही ई-रिक्शा या ऑटो से मुख्य सड़क अथवा मेट्रो स्टेशन तक पहुंचना पड़ता है। संकरी गलियां, अतिक्रमण और बेतरतीब पार्किंग के कारण कई अंदरूनी इलाकों में बड़ी बसों की पहुंच सीमित है। पुश्ता और यमुना से सटे क्षेत्रों में पैदल रास्तों और फुटपाथ की कमी समस्या को और बढ़ाती है। बस सेवा ठप होने पर छोटी दूरी का यही अतिरिक्त सफर लोगों की जेब पर बड़ा बोझ बन गया है। बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और रोज काम पर जाने वालों को इसका ज्यादा सामना करना पड़ रहा है।
मांग : 45 हजार हाथ में हर महीने दे सरकार
हड़ताल कर रहे कर्मचारी न्यूनतम दिहाड़ी 862 रुपये से बढ़ाकर 2,000 रुपये प्रतिदिन या करीब 45 हजार रुपये मासिक इन-हैंड वेतन की मांग कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि कर्मचारियों की मांग के अनुरूप वेतन वृद्धि करना संभव नहीं है। सरकार के सामने यह चुनौती भी है कि एक वर्ग के अनुबंध कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने पर दूसरे विभागों के अनुबंध कर्मचारी भी इसी तरह की मांग उठा सकते हैं।
आरोप : निजी ऑपरेटरों का दबदबा बढ़ा
-डीटीसी कर्मचारी एकता यूनियन के अध्यक्ष ललित चौधरी का आरोप है कि निजी ऑपरेटरों के बढ़ते दबदबे के कारण चालकों और परिचालकों की स्थिति खराब हुई है। उनके मुताबिक 862 रुपये की न्यूनतम दिहाड़ी में चालक बस चलाने की जिम्मेदारी निभा रहे हैं और दुर्घटना या बस को नुकसान होने की स्थिति में आर्थिक दंड भी भुगतना पड़ता है। यूनियन का कहना है कि वेतन समेत प्रमुख मांगों पर लिखित और ठोस निर्णय होने तक हड़ताल वापस नहीं ली जाएगी। वहीं डीटीसी अधिकारियों के अनुसार हड़ताल खत्म कराने के लिए कर्मचारियों से लगातार बातचीत की जा रही है।
असर : रोजाना 40-41 लाख यात्री हो रहे हलकान
आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में रोज करीब 40-41 लाख यात्री बसों से सफर करते हैं। सेवा बाधित होने से काम, स्कूल, कॉलेज और अस्पताल जाने वाले यात्रियों की मुश्किलें बढ़ी हैं। टिकट और पास से रोज करीब पांच करोड़ रुपये का राजस्व संग्रह होता है। चार दिन की हड़ताल में अब तक करीब 15 करोड़ रुपये के राजस्व नुकसान का अनुमान है।