मोदी के बनारस में किया कुछ ऐसा कि बन गए केजरीवाल के खास
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17 साल तक एक पिछड़े इलाके में लोगों की मदद करने वाला बेहद सा साधारण सा दिखने वाला शख्स एक दिन कुछ ऐसा कर गुजरेगा कि पूरे देश की मीडिया में छा जाएगा ये किसी ने नहीं सोचा था।
जितेंद्र सिंह तोमर को बेहद करीब से जानने वालों का कहना है कि 17 साल पहले जब उन्होंने अपने सामाजिक जीवन की शुरुआत की तो बहुत ही उत्साहित और कर्मठ व्यक्तित्व वाले व्यक्ति थे।
उनके उत्साह को देख कर इलाके के कांग्रेस विधायक उनसे काफी प्रभावित हए। जल्द ही दोनों के बीच करीबी बढ़ने लगी और दोनों एक दूसरे के इतने करीब आ गए कि लोग उन्हें पूर्व कांग्रेस विधायक वत्स का दाहिना हाथ कहने लगे।
वत्स बताते हैं कि 1998 में जब वह तोमर से मिले तो वह शकरपुर इलाके में सामाजिक सेवा में लगे हुए थे। गरीबों के जीवन को बदलने के लिए तोमर का उत्साह देख कर वत्स ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया। लगभग दस साल तोमर ने वत्स के साथ काम किया।
लेकिन 2008 में दोनों के रास्ते अलग हो गए। वत्स की मानें तो समय के साथ तोमर की महत्वाकांक्षाएं बढ़ने लगीं और जल्द ही उन्हें लगने लगा कि अपने मेंटर वत्स की तरह वह खुद भी विधायक बन सकते हैं।
क्यों हासिल करना चाहते थे लॉ की डिग्री
यही वक्त था जब तोमर को लगा कि अगर उनके पास लॉ की डिग्री हो तो वह उनके काम आ सकती है। इसी दौरान उन्होंने लॉ की डिग्री हासिल भी कर ली जिसकी वजह से आज वह पुलिस के शिकंजे में हैं।
वत्स का कहना है कि दस साल मेरे साथ काम करने और उसके बाद भी तोमर ने कभी भी उन्हें उनकी डिग्री के बारे में नहीं बताया। असल में वत्स के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब उनके दोस्त और अब केजरीवाल के आलोचक राजेश गर्ग ने उन्हें सलाह दिया कि वह एक नए राजनीतिक दल आम आदमी पार्टी में शामिल हो जाएं।
गर्ग ने उन्हें सलाह दी कि वह 2013 इलेक्शन से पहले पार्टी में शामिल हो जाएं और त्रिनगर से अपने लिए टिकट की मांग करें। तोमर को यह बात जम गई और उन्होंने पार्टी में शामिल होने का निर्णय लिया।
मजबूरी में मिला था विधानसभा का टिकट
इतना ही नहीं पार्टी ने उन्हें त्रिनगर से विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए टिकट भी दे दिया क्योंकि उनके पास बीजेपी के नंद किशोर से लड़ने के लिए उनसे बेहतर कोई नाम नहीं था। हालांकि चुनाव में वह नंद किशोर से हार भले गए लेकिन उनकी हार का मार्जिन बेहद कम था। तोमर केवल 3000 वोटों से हारे थे।
इस हार के बाद भी वह पार्टी में अपनी पहचान बनाने में सफल रहे। लेकिन उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दौर आना अभी बाकी था। लोकसभा चुनाव सामने थे और अरविंद केजरीवाल ने भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ बनारस से चुनाव लड़ने का फैसला किया।
केजरीवाल ने बनारस की जिम्मेदारी तोमर को दी और उनकी नेटवर्किंग की प्रतिभा ने केजरीवाल को बेहद प्रभावित किया। और यहीं से वह आम आदमी पार्टी के सबसे दिग्गज नेता अरविंद केजरीवाल के चहेते बन गए।
कई दिग्गजों को पछाड़ कर पाया मंत्री पद
फरवरी 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में वह फिर भाजपा के नंद किशोर गर्ग के खिलाफ त्रिनगर के चुनाव लड़े और इस बार उन्हें पराहित करने में सफल हुए। पहली बार में विधायक बनने के साथ ही वह कैबिनेट मंत्री भी बन गए।
चुनाव के बाद मंत्रिमंडली के गठन के समय कानून मंत्री के पद को लेकर सोमनाथ भारती से लेकर प्रशांत भूषण जैसे दिग्गज के नाम का प्रस्ताव किया गया। लेकिन केजरीवाल ने अंततः जितेंद्र सिंह तोमर को यह पद सौंपा।
इसके साथ ही 48 वर्षीय तोमर दिल्ली के सबसे कम उम्र के कानून मंत्री बन गए। हालांकि इस दौरान जब भी तोमर की डिग्री से संबंधित सामने आया केजरीवाल ने तोमर का समर्थन किया और कहते रहे कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया है।
हालांकि अपनी लॉ की डिग्री के चलते ही मंगलवार को तोमर को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा जिसे केजरीवाल ने तुरंत स्वीकार कर लिया।