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होटल और रेस्त्रां मालिकों का आरोप, प्रमाण पत्र देने के लिए वसूली जा रही मनमानी फीस

Fri, 26 Aug 2016 09:42 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली
ब्यूरो/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 26 Aug 2016 09:42 AM IST
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hotel in delhi accused dpcc for taking more fees than normal
- फोटो : amarujala
दिल्ली में होटल और रेस्त्रां मालिकों ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी (डीपीसीसी) के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में याचिका दाखिल की है।
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एसोसिएशन का आरोप है कि डीपीसीसी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नियमों और कानूनों का उल्लंघन कर होटल और रेस्त्रां मालिकों से संचालन का अनुमति प्रमाण पत्र लेने के एवज में मनमाने तौर पर कई गुना फीस वसूल रहा है। 

वहीं हाल ही में सीपीसीबी ने प्रदूषण मानकों का ध्यान रख उद्योगों का वर्गीकरण किया था। जबकि डीपीसीसी इसे भी नहीं मान रहा। एनजीटी ने इस मामले में पर्यावरण मंत्रालय, सीपीसीबी, दिल्ली के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
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जस्टिस स्वतंत्र कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। एसोसिएशन की ओर से अधिवक्ता आईके कपिला ने एनजीटी में यह याचिका दाखिल की है।

अधिवक्ता ने अपनी दलील में कहा है कि 15 मार्च 1991 में जारी की गई अधिसूचना और जल कानून 1974 और वायु कानून 1981 के मुताबिक सीपीसीबी ने दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को अपनी ताकतें हस्तांतरित की थीं।
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हालांकि डीपीसीसी में समय-समय पर बदलाव भी करते रहने के संबंध में एक अधिसूचना भी जारी की थी। इन कानूनों में साफ है कि किसी भी उद्योग को स्थापना के तीन महीनों के भीतर संचालन की अनुमति के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्रमाण पत्र हासिल करना होगा।

इसके लिए 2002 में फीस भी निर्धारित की गई थी। जबकि डीपीसीसी इन नियमों की अनदेखी कर होटल और रेस्त्रां से 250 गुना ज्यादा तक फीस वसूल कर रहा है।

एसोसिएशन ने यह भी आरोप लगाया है कि सीपीसीबी ने मार्च 2016 में एक अधिसूचना जारी कर सभी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को कहा था कि उद्योगों की चार श्रेणियां होंगी। इनमें लाल, नारंगी और हरा के साथ सफेद श्रेणी को भी जोड़ा गया था।

सफेद श्रेणी में आने वाले उद्योगों को प्रदूषण रहित माना गया है। इन्हें संचालन के अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। जबकि डीपीसीसी सभी गेस्ट हाउस से भी संचालन की अनुमति लेने के लिए दबाव बना रहा है।

दिल्ली मास्टर प्लान के मुताबिक गेस्ट हाउस बहुत ही कम समय के लिए अस्थायी तौर पर रुकने की जगह होती है। ऐसे में गेस्ट हाउस को एयर और वाटर एक्ट के तहत कंसेट लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

एसोसिएशन के मुताबिक डीपीसीसी ने 16 अगस्त तक ऑनलाइन माध्यम से सभी होटल, रेस्त्रां और गेस्ट हाउस को कंसेट के लिए फॉर्म भरने और फीस जमा करने को कहा है। जबकि यह कानूनी तौर पर उचित नहीं है।


एसोसिएशन ने एनजीटी से मांग की है कि वे डीपीसीसी को निर्देश जारी कर उनके जरिए तय किए गए कंसेट फीस को निरस्त और गैर कानूनी घोषित करें।

डीपीसीसी ने 9 दिसंबर 2009 को यह फीस तय किया था। इसके अलावा एसोसिएशन ने एनजीटी से डीपीसीसी के जरिए किए गए सीपीसीबी के नियमों का उल्लंघन करने को लेकर भी आदेश देने की मांग की है।
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