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हाईकोर्ट ने माना : पॉक्सो में महिलाओं पर भी लग सकता है पेनेट्रेटिव यौन हमले का आरोप, साफ किया अधिनियम का अर्थ
Mon, 12 Aug 2024 05:57 AM IST
दुष्यंत शर्मा
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 12 Aug 2024 05:57 AM IST
सार
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने अपने हालिया आदेश में कहा कि पॉक्सो प्रावधानों के संयुक्त अध्ययन पर अधिनियम की धारा 3 में आने वाले शब्द 'वह' को यह कहकर प्रतिबंधात्मक अर्थ नहीं दिया जा सकता कि यह केवल पुरुष को संदर्भित करता है।
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Delhi High Court
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
हाईकोर्ट ने माना कि यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम (पॉक्सो) के तहत पेनेट्रेटिव यौन हमले व गंभीर पेनेट्रेटिव यौन हमले का अपराध पुरुषों और महिलाओं दोनों के खिलाफ लगाया जा सकता है। न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी ने अपने हालिया आदेश में कहा कि पॉक्सो प्रावधानों के संयुक्त अध्ययन पर अधिनियम की धारा 3 में आने वाले शब्द 'वह' को यह कहकर प्रतिबंधात्मक अर्थ नहीं दिया जा सकता कि यह केवल पुरुष को संदर्भित करता है।
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अदालत ने जोर देकर कहा कि इसे इसका इच्छित अर्थ दिया जाना चाहिए और इसके दायरे में लिंग के बावजूद कोई भी अपराधी शामिल है। अदालत ने कहा यह स्पष्ट है कि पॉक्सो अधिनियम में कहीं भी सर्वनाम 'वह' को परिभाषित नहीं किया गया है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि संसद ने बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के लिए पॉक्सो अधिनियम बनाया है चाहे किसी बच्चे पर अपराध पुरुष द्वारा किया गया हो या महिला द्वारा।
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न्यायालय को कानून के किसी भी प्रावधान की व्याख्या नहीं करनी चाहिए जो विधायी इरादे और उद्देश्य से अलग हो। प्रावधान के दायरे में किसी भी वस्तु का प्रवेश शामिल है, न कि केवल शरीर के अंग का, इसलिए यह कहना अतार्किक होगा कि अपराध केवल लिंग के प्रवेश तक ही सीमित है।
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धारा 3 में व्यक्ति को केवल पुरुष पढ़ना गलत
अदालत ने कहा कि एक तरफ धारा 375 (दुष्कर्म) और दूसरी तरफ पॉक्सो की धारा 3 और 5 में परिभाषित अपराध की तुलना से पता चलता है कि इस तरह परिभाषित अपराध अलग-अलग हैं। धारा 375 में आने वाले पुरुष शब्द का दायरा और अर्थ वर्तमान कार्यवाही में इस अदालत के विचाराधीन नहीं है, लेकिन कोई कारण नहीं है कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 में आने वाले व्यक्ति शब्द को केवल पुरुष के संदर्भ में पढ़ा जाए। तदनुसार यह माना जाता है कि पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 और 5 में उल्लिखित कृत्य अपराधी के लिंग की परवाह किए बिना अपराध हैं, बशर्ते कि ये कृत्य किसी बच्चे के साथ किए गए हों।
महिला ने ट्रॉयल कोर्ट के आदेश को दी थी चुनौती
न्यायमूर्ति भंभानी ने सुंदरी गौतम नामक एक महिला की ओर से दायर याचिका पर विचार करते हुए ये निष्कर्ष दिए। महिला ने उसके खिलाफ पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 गंभीर यौन उत्पीड़न के लिए दंड के तहत आरोप तय करने के ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी थी। यह तर्क दिया गया कि गंभीर यौन उत्पीड़न के अपराध को पॉक्सो अधिनियम की धारा 3 में परिभाषित किया गया है, और इसलिए धारा 5 में आने वाले गंभीर यौन उत्पीड़न के अपराध को कभी भी किसी महिला के खिलाफ नहीं बनाया जा सकता है, क्योंकि परिभाषाओं को पढ़ने से पता चलता है कि इसमें केवल वह सर्वनाम का उपयोग किया गया है। अदालत ने तर्क को खारिज कर दिया और आरोपी-महिला के खिलाफ धारा के तहत आरोप को बरकरार रखा।