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दिल्ली में आधा फीसदी पुरुष भी नहीं कराते नसबंदी, परिवार नियोजन में नगण्य है भागीदारी

Sat, 22 Feb 2020 05:46 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली
अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 22 Feb 2020 05:46 AM IST
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Half a percent of men in Delhi do not undergo sterilization
सांकेतिक तस्वीर

मध्यप्रदेश में परिवार नियोजन कार्यक्रम में कर्मचारियों के लिए 5 से 10 पुरुषों की नसबंदी कराना अनिवार्य किया गया, हालांकि सियासी हंगामा होने के बाद राज्य सरकार को आदेश वापस लेना पड़ा। हालांकि इससे नसबंदी का असल मुद्दा वहीं रह गया। दिल्ली में नसबंदी लंबे समय से ज्वलंत मुद्दा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी के नियंत्रण पर अब ठोस फैसले लेने का है। फिर चाहे अनिवार्यता या अन्य कोई? इसे महज राजनैतिक परिदृश्य से देखना उचित नहीं। 

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सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली की आबादी का कुछ ही फीसदी हिस्सा सरकारी अस्पतालों में सालाना नसबंदी कराने पहुंच रहा है लेकिन इससे भी ज्यादा गंभीर यह है कि दिल्ली में 0.5 फीसदी पुरुष भी नसबंदी नहीं कराते। यहां पुरुषों की नसबंदी का आंकड़ा 0.20 फीसदी है। करीब 35 से 40 महिलाओं पर महज एक पुरुष ही नसबंदी कराने अस्पताल जा रहा है। दिल्ली के परिवार कल्याण नियोजन विभाग का ही मानना है कि परिवार नियोजन में पुरुषों की सहभागिता न के बराबर है। ये हाल तब है जब हर साल करोड़ों रुपये परिवार नियोजन जागरूकता कार्यक्रम व अभियान इत्यादि पर खर्च किए जा रहे हैं। 
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आंकड़ों के अनुसार साल 2008 में 25890 महिलाएं, 5655 पुरुषों ने नसबंदी कराई थी जबकि वर्ष 2018 में करीब 700 पुरुष और 18 हजार से ज्यादा महिलाओं ने नसबंदी कराई। यह हाल तब है जब दिल्ली सरकार नसबंदी के लिए पुरुषों को 1100 रुपये देती है । वहीं सामान्य वर्ग की महिलाओं को सिर्फ 250 रुपये तो अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की महिलाओं को 600 रुपये दिए जाते हैं। 
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स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि जनसंख्या नियंत्रण में पुरुषों की सहभागिता बढ़ाने के लिए सरकार की ओर से प्रयास किए जा रहे हैं। जल्द ही पुरुषों को मिलने वाली प्रोत्साहन राशि में भी बदलाव किया जाएगा। हालांकि इसके लिए स्वास्थ्य कर्मचारियों पर अनिवार्यता को लेकर असहमति जताई है। इनका कहना है कि नसबंदी को लेकर किसी को किसी भी प्रकार के बंधन में बांधना गलत होगा। 
 

दुनिया के बाकी हिस्सों से लेना चाहिए सबक 

सफदरजंग अस्पताल के डॉ. मनीष का कहना है कि जनसंख्या का तेजी से बढ़ना भारत को सामाजिक, आर्थिक दोनों ही क्षेत्रों में पछाड़ रहा है। नसबंदी पर जागरूकता की बेहद कमी है। वहीं सरकारी स्वास्थ्य तंत्र भी इसे लेकर बहुत चुस्त नहीं है। खासतौर पर पुरुषों की नसबंदी को लेकर फैली सामाजिक भ्रांतियों का दुष्प्रभाव पूरे देश में है। इसके पीछे के कारणों पर भी विचार जरूरी है। लोकनायक अस्पताल के डॉ. विनोद का कहना है कि धार्मिक व राजनैतिक विचारों से ऊपर उठकर सरकार को विदेशों की भांति ठोस निर्णय लेने चाहिए। उन्होंने कहा कि हमें दुनिया के बाकी हिस्सों से भी सबक लेना चाहिए। 

2018 में केवल दो पुरुषों ने कराई नसबंदी
नपुंसकता के डर के कारण पुरुष नसबंदी के लिए आगे नहीं आते जबकि ये महज भ्रांति से बढ़कर कुछ नहीं है। बृहस्पतिवार को नई दिल्ली स्थित आरएमएल अस्पताल में आयोजित कार्यक्रम में डॉक्टरों के अनुसार पुरुषों में नसबंदी को लेकर जागरूकता मंद गति बढ़ रही है। भ्रांतियों पर भरोसा करने के कारण पुरुष नसबंदी से भागते हैं।

आरएमएल अस्पताल ही में साल 2018 में 2 पुरुषों ने नसबंदी कराई जबकि 2019 में यह आंकड़ा बढ़कर 8 हुआ। फिलहाल इस साल में दो पुरुष अब तक नसबंदी करा चुके हैं। परिवार नियोजन विभाग की डॉ. अनीता वर्मा ने कहा कि यह हमारे सामने बड़ी चुनौती है कि पुरुष नसबंदी के लिए आगे आएं। इसके लिए हमने पुरुष काउंसलर भी रखे हैं। पिछले सालों में पुरुष नसबंदी की संख्या अस्पताल में बढ़ी है। नसबंदी के बाद न तो पुरुषों में कोई कमजोरी आती है और न ही उन्हें नपुंसकता का शिकार होना पड़ता है।

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