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70 वर्षों से बदस्तूर जारी है अहीर रेजिमेंट की मांग
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गुरुग्राम (कुमार प्रवीण )। परमवीर चक्र विजेता ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव के साहस और पराक्रम के साथ सैकड़ों वीर अहीर सैनिकों के शौर्य को याद करते हुए भारतीय सेना में अहीर रेजिमेंट की मांग एक फिर जोर पकड़ रही है। पिछले 70 वर्षों से यह मांग बदस्तूर जारी है। 40 साल पहले यह मांग अहीरवाल की वीर भूमि से उठी। रेवाड़ी के डॉ. ईश्वर सिंह ने सेना में अहीरों की शहादत और पराक्रम-शौर्य, अहीर कौम की हिस्सेदारी, देश की आजादी में इनके बलिदान और योगदान का अध्ययन ही नहीं किया बल्कि पूरा शोध कर रेजिमेंट को अहीर कौम का हक माना और इसकी मांग की। यहां से देश भर में अहीर रेजिमेंट को लेकर छोटे-छोटे आंदोलन आरंभ हुए।
पूरे देश में हरियाणा और राजस्थान के एक विशेष हिस्से (यादव बाहुल्य) को अहीरवाल कहा जाता है। अहीरवाल के खेड़की दौला से 2018 में अहीर रेजिमेंट की चिंगारी पुन: सुलगी जो अब आंदोलन बन रही है। मार्च 2018 में इसी मांग को लेकर तीन दिन भूख हड़ताल हुई, जिसे आश्वासनों के आधार पर तुड़वा दिया गया। संवाद
अब तक की बड़ी कुर्बानियां...
संयुक्त अहीर रेजिमेंट समन्वयन ट्रस्ट बनाकर वर्षों से अहीर रेजिमेंट के लिए संघर्ष किया जा रहा है। इस ट्रस्ट के मुख्य संरक्षण आजाद हिंद फौज के जिले में एकमात्र जीवित सदस्य बाबू परमानंद यादव हैं। ट्रस्ट के संस्थापक सदस्य मनोज यादव कांकरौला, शिकोहपुर के पूर्व सरपंच राव श्योचंद के मुताबिक 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नरनौल के नसीबपुर में 5000 से अधिक अहीर वीरों ने अपनी शहादत दी थी। 1962 में चीन के साथ युद्ध में रेजांगला पर 114 वीर अहीरों ने अपनी कुर्बानी देकर 3000 से अधिक चीनी सैनिकों को देश की सीमा से खदेड़ा। 1965, 1967 (नाथुला), 1971 की लड़ाइयों में भी अहरी कौम की कुर्बानियों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आजादी के संग्राम से राव गोपाल देव, राव बालकिशन, राजा राव तुलाराम की कुर्बानियों से आरंभ हुआ देश की अस्मिता बचाने का दौर आज तक जारी है। मनोज और श्योचंद ने बताया कि यादव कौम को मिले पदक और सम्मान पराक्रम की गवाही देते हैं।
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अहीरवाल (रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, नारनौल, गुरुग्राम, चरखी दादरी, भिवानी, झज्जर (दोनों का कुछ हिस्सा) और राजस्थान के अलवर व जयपुर जिले के बहरोड़-कोट पुतली तक को सैनिकों की खान कहा जाता है। वर्ष 1952 में नेता जी की आजाद हिंद फौज में कमांडर रहे फाजिलपुर बादली निवासी बाबू परमानंद के नेतृत्व में पहली बार अहीर रेजिमेंट की मांग की गई थी।
रेजांगला युद्ध के बाद स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने ऐ मेरे वतन के लोगों.. गीत गया था। इस गीत को सुनकर आज भी दिल में एक टीस उठती है कि इसके बोल.. कोई सिख, कोई जट, मराठा, कोई गोरखा, कोई मद्रासी के बाद अहीर समुदाय का जिक्र नहीं होता है। यादव समाज के लिए इस गीत में कोई शब्द नहीं है।
मास्टर विजय, डाबोदा (फर्रुखनगर)
यादव समाज की कुर्बानियां भुलाई जा रही है। अहीरवाल को सैनिकों की खान कहा जाता है। रेजांगला को अहीर धाम नाम दिया गया। राय सिंह यादव को टाइगर ऑफ नाथूला का तमगा दिया। कारगिल युद्ध में ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव को सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र मिला, लेकिन रेजिमेंट अभी तक नहीं मिली।
-सतीश नवादा, जिला पार्षद
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पूरे देश में हरियाणा और राजस्थान के एक विशेष हिस्से (यादव बाहुल्य) को अहीरवाल कहा जाता है। अहीरवाल के खेड़की दौला से 2018 में अहीर रेजिमेंट की चिंगारी पुन: सुलगी जो अब आंदोलन बन रही है। मार्च 2018 में इसी मांग को लेकर तीन दिन भूख हड़ताल हुई, जिसे आश्वासनों के आधार पर तुड़वा दिया गया। संवाद
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अब तक की बड़ी कुर्बानियां...
संयुक्त अहीर रेजिमेंट समन्वयन ट्रस्ट बनाकर वर्षों से अहीर रेजिमेंट के लिए संघर्ष किया जा रहा है। इस ट्रस्ट के मुख्य संरक्षण आजाद हिंद फौज के जिले में एकमात्र जीवित सदस्य बाबू परमानंद यादव हैं। ट्रस्ट के संस्थापक सदस्य मनोज यादव कांकरौला, शिकोहपुर के पूर्व सरपंच राव श्योचंद के मुताबिक 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नरनौल के नसीबपुर में 5000 से अधिक अहीर वीरों ने अपनी शहादत दी थी। 1962 में चीन के साथ युद्ध में रेजांगला पर 114 वीर अहीरों ने अपनी कुर्बानी देकर 3000 से अधिक चीनी सैनिकों को देश की सीमा से खदेड़ा। 1965, 1967 (नाथुला), 1971 की लड़ाइयों में भी अहरी कौम की कुर्बानियों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। आजादी के संग्राम से राव गोपाल देव, राव बालकिशन, राजा राव तुलाराम की कुर्बानियों से आरंभ हुआ देश की अस्मिता बचाने का दौर आज तक जारी है। मनोज और श्योचंद ने बताया कि यादव कौम को मिले पदक और सम्मान पराक्रम की गवाही देते हैं।
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अहीरवाल (रेवाड़ी, महेंद्रगढ़, नारनौल, गुरुग्राम, चरखी दादरी, भिवानी, झज्जर (दोनों का कुछ हिस्सा) और राजस्थान के अलवर व जयपुर जिले के बहरोड़-कोट पुतली तक को सैनिकों की खान कहा जाता है। वर्ष 1952 में नेता जी की आजाद हिंद फौज में कमांडर रहे फाजिलपुर बादली निवासी बाबू परमानंद के नेतृत्व में पहली बार अहीर रेजिमेंट की मांग की गई थी।
रेजांगला युद्ध के बाद स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने ऐ मेरे वतन के लोगों.. गीत गया था। इस गीत को सुनकर आज भी दिल में एक टीस उठती है कि इसके बोल.. कोई सिख, कोई जट, मराठा, कोई गोरखा, कोई मद्रासी के बाद अहीर समुदाय का जिक्र नहीं होता है। यादव समाज के लिए इस गीत में कोई शब्द नहीं है।
मास्टर विजय, डाबोदा (फर्रुखनगर)
यादव समाज की कुर्बानियां भुलाई जा रही है। अहीरवाल को सैनिकों की खान कहा जाता है। रेजांगला को अहीर धाम नाम दिया गया। राय सिंह यादव को टाइगर ऑफ नाथूला का तमगा दिया। कारगिल युद्ध में ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव को सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र मिला, लेकिन रेजिमेंट अभी तक नहीं मिली।
-सतीश नवादा, जिला पार्षद