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Gurugram News: फर्जी सर्टिफिकेट जारी करने में दो पुलिसकर्मियों समेत 16 बरी
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20 साल बाद बरी, विजिलेंस की जांच पर अदालत ने सवाल उठाते हुए दिए कार्रवाई के निर्देश
संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। 20 साल पुराने फर्जी पुलिस रोजनामचा और डुप्लिकेट रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट बनाकर सरकार को वित्तीय नुकसान पहुंचाने के मामले में अदालत ने दो पुलिसकर्मियों समेत 16 आरोपियों को बरी किया है। साथ ही तत्कालीन स्टेट विजिलेंस ब्यूरो की जांच पर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि 20 साल तक इस मामले में दिशाहीन कार्रवाई की गई। अदालत ने नूंह के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय में नियुक्त सहायक इंद्रजीत को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा कि झूठी गवाही देने पर दंडित क्यों न किया जाए। इस मामले में अदालत 20 दिसंबर को सुनवाई करेगी। यह आदेश अतिरिक्त सत्र एवं न्यायाधीश डॉ. गगन गीत कौर की अदालत ने दिया है। 2005 में सिटी थाने में मामला दर्ज किया गया था।
अदालत ने स्टेट विजिलेंस ब्यूरो के तत्कालीन एसपी राजबीर देशवाल व योगेंद्र और इंस्पेक्टर धर्म चंद सिंह नेहरा पर दिशाहीन जांच करने पर मुख्य सचिव, महानिदेशक विजिलेंस, निदेशक अभियोजन और जिला उपायुक्त को जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
तत्कालीन नरेंद्र सिंह डीएसपी (यातायात) को सूचना मिली थी कि दिल्ली-जयपुर हाईवे पर निजी बसें बिना रोड टैक्स दिए चल रही हैं। इससे सरकार को वित्तीय नुकसान हो रहा है। इस पर उन्होंने 29 मई 2005 को जिला और सहायक परिवहन अधिकारी के साथ मिलकर 33 निजी बसों का चालान किया है। यह नियमों का उल्लंघन कर रही थीं। इसमें से 18 बस मालिकों पर आरटीओ को टैक्स नहीं देने पर उनके खिलाफ चालान किया गया।
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डीएसपी (यातायात) को जांच के दौरान पता चला कि जिला परिवहन कार्यालय के अधिकारियों की मिलीभगत से एजेंटों के माध्यम से रिश्वत लेकर डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (डीआरसी) जारी किए जा रहे हैं। नियम के अनुसार जिला परिवहन अधिकारी के पास ही डीआरसी जारी कर सकता है लेकिन अन्य निचली स्तर के अधिकारी इस पर हस्ताक्षर करके जारी कर रहे हैं। इस काम के लिए कार्यालय में नियुक्त सहायक प्रताप सिंह, कश्मीरी लाल, प्रकाश पन्नु, हरीश और दया किशन रिश्वत लेकर डीआरसी जारी कर देते हैं।
जांच में पता चला कि सिटी थाने में नियुक्त हेड कांस्टेबल कर्मबीर और डीएलएफ थाने में नियुक्त हेड कांस्टेबल गगनबीर फर्जी रोजनामचा बना रहे हैं। इस मामले की जांच तत्कालीन नरेंद्र सिंह डीएसपी (यातायात),स्टेट विजिलेंस ब्यूरो में डीएसपी धन सिंह, इंस्पेक्टर धर्म चंद, एसपी राजबीर देशवाल, योगेंद्र सिंह नेहरा द्वारा की गई थी। जांच में 4088 डीआरसी जब्त की गई थी।
पुलिस की तरफ से इस मामले में सुनील अरोड़ा, महेंद्र आहूजा, भवनीश कुमार,राकेश कुमार, जगदीश प्रसाद, गोपाल,यशपाल, कृष्ण कुमार, ओम प्रकाश खुराना, मुकेश कुमार, कश्मीरी लाल, प्रताप सिंह, हरीश चंद, कर्मबीर और गगनबीर, दया किशन, सुरेश और प्रकाश पन्नू के खिलाफ अदालत में चालान दिया । इस मामले की सुनवाई के दौरान दया किशन की मौत हो गई थी। सुरेश कुमार को अदालत ने भगोड़ा घोषित कर दिया था।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि जांच एजेंसी पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि निर्दोष व्यक्तियों पर झूठे आरोप न लगाए जाएं। जांच विवेकपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है। विजिलेंस के दो एसपी रैंक के अधिकारियों ने जांच की। किसी ने भी जांच के दौरान बरामदगी सत्यता की जांच करने की जहमत नहीं उठाई। चालान 2008 में तैयार किया गया लेकिन 2014 में अदालत में पेश किया गया। वर्तमान मामले में जांच न केवल जांच अधिकारी सेवानिवृत्त राजबीर देशवाल, धर्म चंद और सेवानिवृत्त योगेंद्र सिंह नेहरा के व्यक्तिगत स्तर पर पक्षपातपूर्ण, गैर-पेशेवर, लापरवाह और लापरवाह रवैये को दर्शाती है, बल्कि जांच एजेंसी राज्य सतर्कता की व्यावसायिक दक्षता पर भी सवाल उठाती है।
जिला परिवहन कार्यालय में नियुक्त चपरासी इंद्रजीत ने जांच अधिकारियों को बयान दिया था कि कार्यालय में नियुक्त कर्मचारियों ने रिश्वत लेकर फर्जी हलफनामे, रोचनामचा बनाकर डीआरसी जारी कर रहे हैं। अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान बयान बदलते हुए कहा कि उन्होंने किसी को रिश्वत लेते हुए नहीं देखा था और पुलिस रोचनामचा ही फर्जी था। मौजूदा समय में इंद्रजीत नूंह के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय में सहायक नियुक्त हैं।
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संवाद न्यूज एजेंसी
गुरुग्राम। 20 साल पुराने फर्जी पुलिस रोजनामचा और डुप्लिकेट रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट बनाकर सरकार को वित्तीय नुकसान पहुंचाने के मामले में अदालत ने दो पुलिसकर्मियों समेत 16 आरोपियों को बरी किया है। साथ ही तत्कालीन स्टेट विजिलेंस ब्यूरो की जांच पर सवाल खड़े किए हैं। अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि 20 साल तक इस मामले में दिशाहीन कार्रवाई की गई। अदालत ने नूंह के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय में नियुक्त सहायक इंद्रजीत को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए कहा कि झूठी गवाही देने पर दंडित क्यों न किया जाए। इस मामले में अदालत 20 दिसंबर को सुनवाई करेगी। यह आदेश अतिरिक्त सत्र एवं न्यायाधीश डॉ. गगन गीत कौर की अदालत ने दिया है। 2005 में सिटी थाने में मामला दर्ज किया गया था।
अदालत ने स्टेट विजिलेंस ब्यूरो के तत्कालीन एसपी राजबीर देशवाल व योगेंद्र और इंस्पेक्टर धर्म चंद सिंह नेहरा पर दिशाहीन जांच करने पर मुख्य सचिव, महानिदेशक विजिलेंस, निदेशक अभियोजन और जिला उपायुक्त को जरूरी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
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तत्कालीन नरेंद्र सिंह डीएसपी (यातायात) को सूचना मिली थी कि दिल्ली-जयपुर हाईवे पर निजी बसें बिना रोड टैक्स दिए चल रही हैं। इससे सरकार को वित्तीय नुकसान हो रहा है। इस पर उन्होंने 29 मई 2005 को जिला और सहायक परिवहन अधिकारी के साथ मिलकर 33 निजी बसों का चालान किया है। यह नियमों का उल्लंघन कर रही थीं। इसमें से 18 बस मालिकों पर आरटीओ को टैक्स नहीं देने पर उनके खिलाफ चालान किया गया।
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डीएसपी (यातायात) को जांच के दौरान पता चला कि जिला परिवहन कार्यालय के अधिकारियों की मिलीभगत से एजेंटों के माध्यम से रिश्वत लेकर डुप्लीकेट रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (डीआरसी) जारी किए जा रहे हैं। नियम के अनुसार जिला परिवहन अधिकारी के पास ही डीआरसी जारी कर सकता है लेकिन अन्य निचली स्तर के अधिकारी इस पर हस्ताक्षर करके जारी कर रहे हैं। इस काम के लिए कार्यालय में नियुक्त सहायक प्रताप सिंह, कश्मीरी लाल, प्रकाश पन्नु, हरीश और दया किशन रिश्वत लेकर डीआरसी जारी कर देते हैं।
जांच में पता चला कि सिटी थाने में नियुक्त हेड कांस्टेबल कर्मबीर और डीएलएफ थाने में नियुक्त हेड कांस्टेबल गगनबीर फर्जी रोजनामचा बना रहे हैं। इस मामले की जांच तत्कालीन नरेंद्र सिंह डीएसपी (यातायात),स्टेट विजिलेंस ब्यूरो में डीएसपी धन सिंह, इंस्पेक्टर धर्म चंद, एसपी राजबीर देशवाल, योगेंद्र सिंह नेहरा द्वारा की गई थी। जांच में 4088 डीआरसी जब्त की गई थी।
पुलिस की तरफ से इस मामले में सुनील अरोड़ा, महेंद्र आहूजा, भवनीश कुमार,राकेश कुमार, जगदीश प्रसाद, गोपाल,यशपाल, कृष्ण कुमार, ओम प्रकाश खुराना, मुकेश कुमार, कश्मीरी लाल, प्रताप सिंह, हरीश चंद, कर्मबीर और गगनबीर, दया किशन, सुरेश और प्रकाश पन्नू के खिलाफ अदालत में चालान दिया । इस मामले की सुनवाई के दौरान दया किशन की मौत हो गई थी। सुरेश कुमार को अदालत ने भगोड़ा घोषित कर दिया था।
अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि जांच एजेंसी पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी है कि निर्दोष व्यक्तियों पर झूठे आरोप न लगाए जाएं। जांच विवेकपूर्ण, निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान मामले में ऐसा बिल्कुल नहीं है। विजिलेंस के दो एसपी रैंक के अधिकारियों ने जांच की। किसी ने भी जांच के दौरान बरामदगी सत्यता की जांच करने की जहमत नहीं उठाई। चालान 2008 में तैयार किया गया लेकिन 2014 में अदालत में पेश किया गया। वर्तमान मामले में जांच न केवल जांच अधिकारी सेवानिवृत्त राजबीर देशवाल, धर्म चंद और सेवानिवृत्त योगेंद्र सिंह नेहरा के व्यक्तिगत स्तर पर पक्षपातपूर्ण, गैर-पेशेवर, लापरवाह और लापरवाह रवैये को दर्शाती है, बल्कि जांच एजेंसी राज्य सतर्कता की व्यावसायिक दक्षता पर भी सवाल उठाती है।
जिला परिवहन कार्यालय में नियुक्त चपरासी इंद्रजीत ने जांच अधिकारियों को बयान दिया था कि कार्यालय में नियुक्त कर्मचारियों ने रिश्वत लेकर फर्जी हलफनामे, रोचनामचा बनाकर डीआरसी जारी कर रहे हैं। अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान बयान बदलते हुए कहा कि उन्होंने किसी को रिश्वत लेते हुए नहीं देखा था और पुलिस रोचनामचा ही फर्जी था। मौजूदा समय में इंद्रजीत नूंह के क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय में सहायक नियुक्त हैं।