{"_id":"587ba5064f1c1b3703efe27d","slug":"guns-of-world-war-i-became-the-center-of-attraction","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"प्रथम विश्व युद्ध में दुश्मनों पर कहर बरपाने वाली दुर्लभ बंदूकें नहीं देखी होंगी आपने","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
प्रथम विश्व युद्ध में दुश्मनों पर कहर बरपाने वाली दुर्लभ बंदूकें नहीं देखी होंगी आपने
अमित सिंह/अमर उजाला, नोएडा
Updated Tue, 17 Jan 2017 04:18 PM IST
विज्ञापन
प्रथम विश्व युद्ध की बंदूकें
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
प्रथम विश्वयुद्ध में दुश्मनों पर कहर बरपाने वाली बंदूकें आज के दौर में दुर्लभ हैं। नोएडा में दो पूर्व सैन्य अधिकारियों ने इन बंदूकों को आज भी काफी सहेज कर रखा है। इसमें से एक वर्ष 1881 की बनी एनफील्ड रायफल है और दूसरी वर्ष 1918 की बनी ल्यूगर पिस्टल है।
विज्ञापन
दोनों लाइसेंस हथियार जब थाना सेक्टर-39 में जमा होने पहुंची तो पुलिस और वहां मौजूद लोगों के बीच आकर्षण का केन्द्र बन गईं। वर्ष 1881 की एनफील्ड रायफल सेक्टर-41 निवासी मनोहर लाल वाधवा (82 वर्ष) के पास पुश्तों से है।
विज्ञापन
प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सेना ने एनफील्ड रायफलों का इस्तेमाल किया था। मनोहर लाल ने अंतिम बार वर्ष 1975 में इससे एक फायर किया था। वायु सेना से मास्टर वारंट ऑफिसर के पद से सेवानिवृत्त मनोहर लाल बताते हैं कि ये बंदूक .35 बोर की है।
विज्ञापन
एंटीक घोषित कराने की दी अर्जी
old gun
- फोटो : अमर उजाला
इसके कारतूस वर्षों पहले बंद हो चुके हैं। उनके पास बंदूक के 10-12 पुश्तैनी कारतूस हैं, जो चलने की स्थिति में नहीं हैं। इसकी बैरल में अंग्रेजों के जमाने की .303 बंदूक की तरह अंदर से खांचे बने हैं। इससे इसकी मारक क्षमता काफी ज्यादा होती थी। उनके पास ये बंदूक कितनी पुश्तों से है, ये उन्हें याद नहीं।
हालांकि वह बताते हैं कि जब उनका परिवार बटवारे से पहले पेशावर में रहता था, तबसे उनके परिवार के पास ये बंदूक मौजूद है। कारतूस न मिलने की वजह से बंदूक अब नहीं चलती, फिर भी उनका इससे काफी भावनात्मक लगाव है।
मनोहर लाल के अनुसार अब सही सलामत स्थिति में एनफील्ड रायफल मिलना बेहद मुश्किल है। इस वजह से इसकी एंटीक वैल्यू बहुत ज्यादा है। उन्होंने आर्म्स एक्ट की धारा 35 के तहत इस बंदूक को एंटीक घोषित कराने के लिए सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय में अर्जी दे दी है। इसके बाद भी वह बंदूक बेचेंगे नहीं, बल्कि उसे घर में सजाकर रखेंगे।
हालांकि वह बताते हैं कि जब उनका परिवार बटवारे से पहले पेशावर में रहता था, तबसे उनके परिवार के पास ये बंदूक मौजूद है। कारतूस न मिलने की वजह से बंदूक अब नहीं चलती, फिर भी उनका इससे काफी भावनात्मक लगाव है।
मनोहर लाल के अनुसार अब सही सलामत स्थिति में एनफील्ड रायफल मिलना बेहद मुश्किल है। इस वजह से इसकी एंटीक वैल्यू बहुत ज्यादा है। उन्होंने आर्म्स एक्ट की धारा 35 के तहत इस बंदूक को एंटीक घोषित कराने के लिए सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय में अर्जी दे दी है। इसके बाद भी वह बंदूक बेचेंगे नहीं, बल्कि उसे घर में सजाकर रखेंगे।
अब भी चलती है ल्यूगर पिस्टल
old gun
- फोटो : अमर उजाला
वर्ष 1918 में आर्डिनेंस फैक्ट्री जबलपुर में बनी .9 एमएम की ल्यूगर पिस्टल भी अब दुर्लभ हो चुकी है। ये पिस्टल सेक्टर-41 निवासी पूर्व कर्नल केके सब्बरवाल (77 वर्ष) के पास है।
कर्नल सब्बरवाल ने बताया कि 54 वर्षों से ये पिस्टल उनके पास है। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने इसे खरीद लिया था। इसमें नौ राउंड की मैगजीन है। सेना में नौकरी केदौरान इस पिस्टल ने कई बार उनकी जान बचाई।
वह हमेशा इसे अपने पास रखते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध में प्रयोग की गई ये पिस्टल आज भी चलती है।
कर्नल सब्बरवाल ने बताया कि 54 वर्षों से ये पिस्टल उनके पास है। सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद उन्होंने इसे खरीद लिया था। इसमें नौ राउंड की मैगजीन है। सेना में नौकरी केदौरान इस पिस्टल ने कई बार उनकी जान बचाई।
वह हमेशा इसे अपने पास रखते हैं। प्रथम विश्वयुद्ध में प्रयोग की गई ये पिस्टल आज भी चलती है।