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Ghaziabad News: आठ माह से कर रहे थे नकली दवा की आपूर्ति, चार गिरफ्तार
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गाजियाबाद। उत्तराखंड के कोटद्वार से मंगाकर हिंडन विहार के दो मेडिकल स्टोर पर आठ महीने से नकली दवाएं बेची जा रही हैं। इसका खुलासा रविवार की सुबह गाजियाबाद रेलवे स्टेशन के पास से नकली दवा के चार सप्लायर की गिरफ्तारी से हुआ। चारों से आठ लाख रुपये कीमत की नकली एंटी बायोटिक और दर्द निवारक दवाएं बरामद की गई हैं। उन्होंने पूछताछ में पुलिस को बताया कि नकली दवाएं उत्तराखंड के कोटद्वार में बनाई जाती हैं। वे वहां से लाकर यहां मेडिकल स्टोर पर देते हैं।
एक सटीक सूचना पर घंटाघर कोतवाली पुलिस और स्पेशल वेपन्स एंड टेक्निक (स्वाट) टीम ने श्रीपाल निवासी हिंगवाड़ा, बीबीनगर, बुलंदशहर, मुकेश निवासी गिरजा मोड़, थाना नवादा, आरा बिहार, साबेज निवासी द्वारिकापुरी, दिल्ली व पुनीत मित्तल निवासी पटेलनगर,गाजियाबाद को रेलवे स्टेशन के यात्री शेड से गिरफ्तार किया। उनके दो साथी शंकर और सरफराज फरार हैं।
गिरफ्तार लोगों के पास से ऑगमेंटिन 625 ड्यूओ और अल्ट्रासेट नाम की 30 पेटी नकली दवा बरामद की गई है। पुलिस उपायुक्त नगर निपुण अग्रवाल ने बताया कि यह दवाएं उत्तराखंड के कोटद्वार से शंकर नाम के सप्लायर ने श्रीपाल की मांग पर कोटद्वार डिपो की बस में रखकर गाजियाबाद भिजवाई थीं। गिरफ्तार आरोपियों ने बताया कि उन्हें ये दवाएं हिंडन विहार के दो मेडिकल स्टोर और अलीगढ़ के मेडिकल स्टोरों पर पहुंचानी थी।
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चारों लोग दवाओं के बिल नहीं दिखा पाए। इस पर औषधि निरीक्षक वैभव बब्बर व आशुतोष मिश्रा को मौके पर बुलाकर जांच कराई गई तो दवाओं के नकली होने की पुष्टि हो गई। पुलिस हिंडन विहार के उन दो मेडिकल स्टोर संचालकों की भूमिका की भी जांच कर रही है जिनके पास यह दवाएं पहुंचाई जानी थीं। अलीगढ़ पुलिस को भी इसके बारे में जानकारी दे दी गई है।
पश्चिमी यूपी में फैला है जाल
गिरफ्तार आरोपियों ने पुलिस को बताया कि वह रोडवेज बस से ही दवा लेकर आते हैं। रोडवेज बसों में चेकिंग बहुत ही कम होती है। पुलिस आती भी है तो लोगों की तलाशी लेती है, समान की जांच नहीं करती है। उत्तराखंड से नकली दवाएं सिर्फ गाजियाबाद ही नहीं, मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर समेत पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बेची जाती हैं।
हाथ नहीं आए बड़े खिलाड़ी
पुलिस ने बताया कि नकली दवा के इस खेल में शंकर और सरफराज बड़े खिलाड़ी हैं। उनको ही मालूम है कि कोटद्वार में दवाएं किस फैक्टरी में मिलते हैं। ये दोनों ही पकड़े गए चारों लोगों को दवा की पेटी देते थे। उनके (शंकर और सरफराज के) पकड़े जाने पर ही पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकेगा।
ऐसे चल रहा खेल
एसीपी निमिष पाटिल ने बताया कि शंकर से श्रीपाल सीधा जुड़ा हुआ था। दोनों ने एक फार्मा कंपनी में पूर्व में साथ काम किया है।
सरफराज मेडिकल स्टोर से डिमांड लेकर श्रीपाल को बताता था। पुनीत कोटद्वार से आने वाली दवाओं को यहां उतारता था और साबेज व मुकेश डिलीवरी कराने का काम करते थे। इसके बाद कुल होने वाली बचत को आपस में बांट लेते थे।
श्रीपाल पूर्व में गजरौला की श्रीटेक पैकेजिंग कंपनी में भी मशीन पर ऑपरेटर रह चुका है। वहां पुनीत मित्तल का आना जाना था, वह भी पैकिंग मशीन का जानकार है। साबेज के पिता साहिबाबाद मंडी में आढ़ती हैं।
ऑगमेंटिन 625 ड्यूओ की 100 गोली का एक पैकेट 400 रुपये और अल्ट्रासेटका एक पैकेट 600 रुपये में कोटद्वार से गाजियाबाद मय किराये के भेजा जा रहा था।
ऑगमेंटिन सभी का कमीशन जोड़कर मेडिकल स्टोर पर 490 रुपये व अलर्टासेट मेडिकल स्टोर तक 830 रुपये में पहुंच रही थी।
ऑगमेंटिन की बाजार में कीमत 1500 व अलर्टासेट की कीमत 2400 से ज्यादा है। इस तरह नकली दवा के सौदागर मोटी कमाई कर रहे हैं।
नमूनों की होगी जांच
औषधि निरीक्षक वैभव बब्बर ने बताया कि रैपर देखने से ही दवाएं नकली लग रही हैं। आरोपियों से फर्जी मुहर और प्रिंट करने वाली मशीन मिलने से साफ हैं कि दवाओं पर कीमत अपने हिसाब से यहां प्रिंट की जा रही है। फिर भी दवाओं का सैंपल लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया है।
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एक सटीक सूचना पर घंटाघर कोतवाली पुलिस और स्पेशल वेपन्स एंड टेक्निक (स्वाट) टीम ने श्रीपाल निवासी हिंगवाड़ा, बीबीनगर, बुलंदशहर, मुकेश निवासी गिरजा मोड़, थाना नवादा, आरा बिहार, साबेज निवासी द्वारिकापुरी, दिल्ली व पुनीत मित्तल निवासी पटेलनगर,गाजियाबाद को रेलवे स्टेशन के यात्री शेड से गिरफ्तार किया। उनके दो साथी शंकर और सरफराज फरार हैं।
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गिरफ्तार लोगों के पास से ऑगमेंटिन 625 ड्यूओ और अल्ट्रासेट नाम की 30 पेटी नकली दवा बरामद की गई है। पुलिस उपायुक्त नगर निपुण अग्रवाल ने बताया कि यह दवाएं उत्तराखंड के कोटद्वार से शंकर नाम के सप्लायर ने श्रीपाल की मांग पर कोटद्वार डिपो की बस में रखकर गाजियाबाद भिजवाई थीं। गिरफ्तार आरोपियों ने बताया कि उन्हें ये दवाएं हिंडन विहार के दो मेडिकल स्टोर और अलीगढ़ के मेडिकल स्टोरों पर पहुंचानी थी।
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चारों लोग दवाओं के बिल नहीं दिखा पाए। इस पर औषधि निरीक्षक वैभव बब्बर व आशुतोष मिश्रा को मौके पर बुलाकर जांच कराई गई तो दवाओं के नकली होने की पुष्टि हो गई। पुलिस हिंडन विहार के उन दो मेडिकल स्टोर संचालकों की भूमिका की भी जांच कर रही है जिनके पास यह दवाएं पहुंचाई जानी थीं। अलीगढ़ पुलिस को भी इसके बारे में जानकारी दे दी गई है।
पश्चिमी यूपी में फैला है जाल
गिरफ्तार आरोपियों ने पुलिस को बताया कि वह रोडवेज बस से ही दवा लेकर आते हैं। रोडवेज बसों में चेकिंग बहुत ही कम होती है। पुलिस आती भी है तो लोगों की तलाशी लेती है, समान की जांच नहीं करती है। उत्तराखंड से नकली दवाएं सिर्फ गाजियाबाद ही नहीं, मेरठ, अलीगढ़, बुलंदशहर समेत पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बेची जाती हैं।
हाथ नहीं आए बड़े खिलाड़ी
पुलिस ने बताया कि नकली दवा के इस खेल में शंकर और सरफराज बड़े खिलाड़ी हैं। उनको ही मालूम है कि कोटद्वार में दवाएं किस फैक्टरी में मिलते हैं। ये दोनों ही पकड़े गए चारों लोगों को दवा की पेटी देते थे। उनके (शंकर और सरफराज के) पकड़े जाने पर ही पूरे नेटवर्क का खुलासा हो सकेगा।
ऐसे चल रहा खेल
एसीपी निमिष पाटिल ने बताया कि शंकर से श्रीपाल सीधा जुड़ा हुआ था। दोनों ने एक फार्मा कंपनी में पूर्व में साथ काम किया है।
सरफराज मेडिकल स्टोर से डिमांड लेकर श्रीपाल को बताता था। पुनीत कोटद्वार से आने वाली दवाओं को यहां उतारता था और साबेज व मुकेश डिलीवरी कराने का काम करते थे। इसके बाद कुल होने वाली बचत को आपस में बांट लेते थे।
श्रीपाल पूर्व में गजरौला की श्रीटेक पैकेजिंग कंपनी में भी मशीन पर ऑपरेटर रह चुका है। वहां पुनीत मित्तल का आना जाना था, वह भी पैकिंग मशीन का जानकार है। साबेज के पिता साहिबाबाद मंडी में आढ़ती हैं।
ऑगमेंटिन 625 ड्यूओ की 100 गोली का एक पैकेट 400 रुपये और अल्ट्रासेटका एक पैकेट 600 रुपये में कोटद्वार से गाजियाबाद मय किराये के भेजा जा रहा था।
ऑगमेंटिन सभी का कमीशन जोड़कर मेडिकल स्टोर पर 490 रुपये व अलर्टासेट मेडिकल स्टोर तक 830 रुपये में पहुंच रही थी।
ऑगमेंटिन की बाजार में कीमत 1500 व अलर्टासेट की कीमत 2400 से ज्यादा है। इस तरह नकली दवा के सौदागर मोटी कमाई कर रहे हैं।
नमूनों की होगी जांच
औषधि निरीक्षक वैभव बब्बर ने बताया कि रैपर देखने से ही दवाएं नकली लग रही हैं। आरोपियों से फर्जी मुहर और प्रिंट करने वाली मशीन मिलने से साफ हैं कि दवाओं पर कीमत अपने हिसाब से यहां प्रिंट की जा रही है। फिर भी दवाओं का सैंपल लेकर जांच के लिए प्रयोगशाला भेजा गया है।