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जेल से तो छूटे पर अपनों से बिछड़ गए: 12-15 साल बाद रिहा होकर घर आए तो बदल गई दुनिया, बिखरे सपने संजोएंगे

Sat, 17 Jul 2021 10:59 AM IST
पूजा त्रिपाठी विकास वत्स, अमर उजाला, बुलंदशहर
विकास वत्स, अमर उजाला, बुलंदशहर Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Sat, 17 Jul 2021 10:59 AM IST
सार

नादानी, नासमझी या लड़कपन में नाबालिग अवस्था के दौरान आवेश में आकर अपराध तो कर दिया। लेकिन, उसकी सजा वर्षों तक कारागार की चारदीवारी में जीवन के अनमोल पलों को बिताते हुए काट दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने आगरा सेंट्रल जेल में बंद ऐसे 13 किशोर अपचारियों का संज्ञान लिया और उन्हें रिहाई का फरमान सुनाया।

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Supreme court orders release of 13 teenagers in jail for more than 12 years story of these teenagers
खुर्जा का सोनू - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नादानी, नासमझी या लड़कपन में नाबालिग अवस्था के दौरान आवेश में आकर अपराध तो कर दिया। लेकिन, उसकी सजा वर्षों तक कारागार की चारदीवारी में जीवन के अनमोल पलों को बिताते हुए काट दी। अब सुप्रीम कोर्ट ने आगरा सेंट्रल जेल में बंद ऐसे 13 किशोर अपचारियों का संज्ञान लिया और उन्हें रिहाई का फरमान सुनाया। जिनमें जनपद के भी छह अपचारी शामिल हैं।

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जब जेल से छूटकर यह लोग अपने घर पहुंचे तो 12-15 साल बाद उनके कुछ अपने छूट चुके थे, तो कुछ नए रिश्तेदार भी परिवार में शामिल हो चुके थे। जेल में जो सपने टूट गए थे, अब फिर से नई शुरुआत कर यह लोग जीवन को पटरी पर लाने का प्रयास करने की बात कह रहे हैं।
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बबलू और शाहिद के मां-बाप का हुआ इंतकाल, काफी हो गया कर्ज
सेंट्रल जेल आगरा से सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर छूटे देहात कोतवाली क्षेत्र के गांव नीमखेड़ा निवासी बबलू और शाहिद ने बताया कि वह वर्ष 1999 में पड़ोसी गांव ग्यासपुर निवासी व्यक्ति भाना की हत्या के मामले में जेल गए थे। वारदात के समय बबलू की उम्र करीब 15 वर्ष और उसके छोटे भाई शाहिद की उम्र करीब 14 वर्ष थी। पूर्व में वह करीब 14 माह जेल में रहे और फिर जमानत पर रिहा हो गए थे।
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 लेकिन, दस दिसंबर 2009 को न्यायालय ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उन्हें जेल भेज दिया था।

तब से वह कारागार की सलाखों के पीछे ही अपनी सजा भुगत रहे थे। इस बीच जनवरी 2012 में उनकी मां रफीकन का इंतकाल हुआ और फिर पिता शमीम अहमद का वर्ष 2017 में इंतकाल हो गया। लेकिन, वह जेल से बाहर नहीं आ सके। इस बीच परिवार में कुछ नए मेहमान भी आए। छोटे भाई सोनू की शादी हुई। तो वहीं, शाहिद के जेल जाने के करीब दो माह बाद उसकी पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया था। जेल की सलाखों से छूटने के बाद शाहिद अपने पुत्र की अच्छी परवरिश के लिए फिर से मेहनत कर कुछ काम करने का विचार बना रहा है। 

टीकम का बिक गया घर, झोपड़ी में रहता है परिवार

जेल से छूटकर दो दिन पूर्व देहात कोतवाली क्षेत्र के गांव अड़ौली निवासी टीकम सिंह उर्फ टिंकू पुत्र विजयपाल अपने घर पहुंचा। लेकिन, उसका घर तो अब बिक चुका था। उसके मां-पिता और दो छोटे भाई एक झोपड़ी में जीवन यापन कर रहे हैं। पिता विजयपाल ने बताया कि वर्ष 2005 में गांव निवासी जगदीश की हत्या हुई थी। जिस मामले में खुद विजयपाल, उनका बड़ा पुत्र रोहताश और छोटा पुत्र टीकम जेल गए थे।

टीकम की उम्र उस समय 15 साल की थी। कुछ समय बाद विजयपाल जमानत पर छूट गए। लेकिन, उनके पुत्रों की जमानत नहीं मिल सकी थी। वर्ष 2008 में सभी को आजीवन कारावास हुआ था। जिसके बाद उनके लोगों ने धोखाधड़ी कर उनका मकान भी बेच दिया। अब वह एक झोपड़ी में रह रहे हैं। टीकम शुक्रवार को अपनी रिश्तेदारी में गया हुआ था।

पिता की हुई मौत, सात बहनों की भी हो गई शादी
खुर्जा नगर कोतवाली क्षेत्र के गांव किला मेवई निवासी सोनू उर्फ गजेंद्र पुत्र जज सिंह जेल से छूटकर बुधवार देर रात अपने गांव पहुंचा था। उसने बताया कि वर्ष 2005 में आवेश में आकर उसने एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी थी। उस समय उसकी उम्र करीब 17 वर्ष थी। वर्ष 2007-08 में उसे प्रकरण में न्यायालय ने आजीवन कारावास सुनाया था। तब से वह जेल में था। परिवार में उसके माता-पिता, सात बहने और एक भाई था, जो कि मानसिक रूप से दिव्यांग है। सोनू ही परिवार का एक मात्र सहारा था।

करीब चार वर्ष पूर्व उसके पिता की इसी टेंशन में मौत हो गई थी। लेकिन, वह पिता के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हो सका। साथ ही इस बीच उसकी सातों बहनों की भी शादी हो चुकी है। करीब तीन वर्ष पूर्व उसके भतीजे का निधन हो गया था। वर्तमान में उसकी जमीन जायदाद सब बिक चुका है। सोनू ने बताया कि उसे अफसोस है कि आवेश में आकर उसने जो किया उससे उसका परिवार ही उजड़ गया। खुशियां छीन गईं। 

पिता की हो गई मौत, अब बुलंदशहर में रहता है परिवार

जहांगीराबाद थाना क्षेत्र के गांव बांसुरी निवासी तेजू पुत्र भंवर सिंह वर्ष 1998 में गांव निवासी नवाज सिंह की हत्या के मामले में जेल गया था। उस समय उसकी उम्र करीब 16 वर्ष थी। कुछ समय बाद वह जमानत पर जेल से छूटा तो परिजनों ने उसका विवाह करा दिया था। लेकिन, वर्ष 2006 में उसके पिता की मृत्यु हो गई। इसके बाद वर्ष 2009 में उक्त प्रकरण में उसे आजीवन कारावास सुनाया गया था। कुछ रिश्तेदारों ने उसकी पत्नी की आर्थिक मदद की।

किसी भी अपराधी को घटना के समय किशोर अपचारी पाए जाने पर मुकदमे के विचारण के दौरान अंतिम निर्णय होने तक किशोर अपचारी घोषित होने पर तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान है।- संतोष कुमार राघव, अधिवक्ता

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