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Ghaziabad News: लोकसभा चुनाव में जाति नहीं, लहर देखते हैं गाजियाबाद के लोग

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Thu, 21 Mar 2024 01:21 AM IST
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People of Ghaziabad see wave, not caste in Lok Sabha elections
राजीव शर्मा
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गाजियाबाद। राजनीतिक दल भले ही जातीय समीकरण के आधार पर उम्मीदवार तय करते रहे हो लेकिन गाजियाबाद के लोगों ने जाति कभी नहीं देखी। गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र के मतदाता हमेशा लहर के साथ रहे। इसी का असर है कि इस सीट पर वैश्य, ठाकुर, ब्राह्मण, त्यागी, एससी और मुस्लिम बिरादरी के प्रत्याशियों ने जीत हासिल कर संसद में पहुंचने में सफलता पाई है।
2009 में हुए परिसीमन से पहले हापुड़-गाजियाबाद की संयुक्त लोकसभा सीट रही है। 1957 में हुए लोकसभा चुनाव में इस सीट पर कृष्ण चंद्र शर्मा ने जीत हासिल की थी। हालांकि यह सीट ब्राह्मण बहुल नही थी लेकिन उस वक्त कांग्रेस की लहर पूरे देश में थी। इसके बाद कमला चौधरी ने भी कांग्रेस की लहर में जीत हासिल की। मुखर वक्ता और समाज सुधार के लिए बड़े आंदोलनों की अगुआ रहीं कमला चौधरी को भी गाजियाबादियों ने बिना जातीय समीकरण में उलझे जीत दिलाकर संसद तक पहुंचाया।
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अलीगढ़ के रहने वाले एससी समाज के उत्थान के लिए काम करने वाले बुद्ध प्रिय मौर्य को भी कांग्रेस की लहर में जीत मिली। बिरादरी की बजाय मतदाता कांग्रेस की लहर के साथ रहे। 1977 और 1980 के चुनाव में लगातार मुस्लिम प्रत्याशी हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा से जीतकर दिल्ली पहुंचे। 1975 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया तो राजनीति की हवा कांग्रेस के खिलाफ बह चली और जनता पार्टी मजबूत हुई। इसके बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट पर जनता पार्टी के प्रत्याशी कुंवर महमूद अली खान और 1980 में जनता पार्टी सेक्युलर के प्रत्याशी अनवार अहमद ने जीत हासिल की।
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अक्तूबर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद इसी साल दिसंबर में हुए लोकसभा चुनाव में सहानुभूति मिलने पर फिर से देश भर में कांग्रेस की लहर चली तो पार्टी के प्रत्याशी केदारनाथ सिंह ने जीत हासिल की। इसके बाद 1989 में चुनाव में जनता दल की लहर थी। कांग्रेस के खिलाफ बोफोर्स तोप घोटाला बड़ा मुद्दा बन गया था। इसी का असर था कि चुनावी हवा एक बार फिर कांग्रेस के खिलाफ चल पड़ी थी और जनता दल के टिकट पर त्यागी बिरादरी के किशन चंद त्यागी (केसी त्यागी) ने जीत हासिल की।
1989 के लोकसभा चुनाव से ही भाजपा ने राम मंदिर का रुख कर लिया था। पहली बार भाजपा ने इसे अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल किया था। 1990 में लालकृष्ण आडवाणी ने देश भर में रथ यात्रा शुरू कर दी थी। इससे माहौल भाजपा के पक्ष में बनने लगा था। राम मंदिर की लहर चली तो 1991 में हुए चुनाव में हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट पर पहली बार भाजपा का खाता खुल गया। इस चुनाव में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े ठाकुर बिरादरी के रमेश चंद तोमर ने जीत हासिल की। 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद भाजपा की यह लहर और मजबूत हो गई और रमेश चंद तोमर 1999 तक लगातार चार बार हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट के सांसद बनकर संसद में पहंचे। 1999 के चुनाव में भाजपा ने विदेशी सोनिया बनाम स्वदेशी वाजपेयी के नारे पर पड़ा था और इसमें सफल भी रही।
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2004 में फिर पलटी बाजी
वर्ष 2004 में भाजपा का शाइनिंग इंडिया और फील गुड का नारा दिया लेकिन यह असफल रहा। चुनाव नतीजे आने पर कांग्रेस एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और इसका असर हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा सीट पर भी दिखाई दिया। कांग्रेस से विधायक रह चुके सुरेंद्र प्रकाश गोयल ने भाजपा के पांचवीं बार प्रत्याशी बने रमेश चंद तोमर के सामने चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। यानी इस बार भी देश भर में उठी कांग्रेस की लहर के साथ गाजियाबाद-हापुड़ के मतदाता भी साथ चल पड़े थे।

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2009 से भाजपा का अभेद किला बनी गाजियाबाद सीट
वर्ष 2009 में नए परिसीमन के बाद गाजियाबाद लोकसभा सीट हापुड़ से अलग हो गई। परिसीमन के बाद पहली बार 2009 में हुए चुनाव में भाजपा ने पार्टी का बड़ा चेहरा राजनाथ सिंह को गाजियाबाद से चुनाव मैदान में उतार दिया। हालांकि वर्ष 2009 में केंद्र में सरकार कांग्रेस की चुनी गई लेकिन भाजपा का राम मंदिर का असर गाजियाबाद में रहा और राजनाथ सिंह ने जीत हासिल की। इसके बाद अगले चुनाव में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का चेहरा बनाकर चुनाव मैदान में उतरी भाजपा को देश भर में बड़ा समर्थन मिला। हिंदुत्व और गुजरात मॉडल के मुद्दे पर चुनाव मैदान में उतरे नरेंद्र मोदी की लहर में गाजियाबाद से पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह भी बड़े अंतर से जीतकर संसद में पहुंचे। मोदी लहर में वह लगातार दो बार जीत चुके हैं। अब गाजियाबाद सीट भाजपा के लिए अभेद किला बन चुकी है।
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