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Ghaziabad News: दवाइयों की कमी मानसिक रोगियों को दे रहा अवसाद
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सीएचसी लोनी का निरीक्षण करते डिप्टी सीएमओ डॉ रविंद्र कुमार। संवाद
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गाजियाबाद। जिला अस्पताल एमएमजी में मानसिक रोगियों को इस समय भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल में मानसिक रोग से जुड़ी दवाइयां उपलब्ध नहीं है। इससे मजबूर होकर मरीजों को ये दवाइयां बाजार से महंगे दामों पर खरीदनी पड़ रही हैं। इससे मरीजों का आर्थिक बोझ और मानसिक तनाव बढ़ रहा है।
अस्पताल के मानसिक प्रकोष्ठ विभाग में हर सप्ताह लगभग पांच सौ से छह सौ मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं लेकिन अस्पताल में फ्लुओक्सेटीन, डायजेपाम और क्लोरप्रोमाजीन जैसी जरूरी मानसिक रोग की दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं। ये दवाइयां सिजोफ्रेनिया, अवसाद, एंग्जायटी और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसे रोगों में दी जाती हैं। बाजार में एक सप्ताह की दवाई का खर्च लगभग पांच सौ से सात सौ रुपये आता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए वहन कर पाना मुश्किल है।
मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि डॉक्टर कहते हैं कि मानसिक रोगों की दवाइयां सामान्य तौर पर लंबे समय तक लेनी पड़ती हैं। यदि इलाज बीच में रुक जाए तो स्थिति और बिगड़ सकती है। एक मरीज के परिजन राहुल का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद सरकारी स्तर पर दवाइयों की ऐसी कमी गंभीर चिंता का विषय है। जल्द से जल्द अस्पताल में दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए ताकि इलाज सुचारु रूप से जारी रह सके।
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यह दवाइयां नहीं है अस्पताल में उपलब्ध
सिजोफ्रेनिया और साइकोसिस : रेसपेरिडॉन, हैलोपेरिडोल, क्लोरप्रोमाजीन
अवसाद : फ्लुओक्सेटीन, सर्ट्रालीन, एमिट्रिप्टीलीन
एंग्जायटी : अल्प्रोजलाम, लोरेजेपाम
बाइपोलर डिसऑर्डर : लिथियम कार्बोनेट
नशा-मुक्ति : डायजेपाम
ढाई से तीन हजार की खरीदनी पड़ रही हैं दवाइयां
मोहनलाल नाम के मरीज के बेटे सौरभ ने बताया कि उनके पिता को सिजोफ्रेनिया है। वह पिछले दो वर्षों से एमएमजी अस्पताल से इलाज करवा रहे हैं। पहले अस्पताल से मुफ्त में दवाइयां मिल जाया करती थीं, लेकिन अब पिछले दो महीने से अस्पताल में कोई दवा नहीं मिल रही। हर सप्ताह बाजार से करीब छह सौ रुपये की दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। सौरभ ने बताया कि वह खुद एक प्राइवेट कंपनी में मामूली वेतन पर काम करते हैं। हर महीने ढाई से तीन हजार रुपये की दवाई खरीदना मुश्किल हो गया है।
कर्ज लेकर खरीदनी पड़ रही हैं दवाइयां
मरीज रेखा देवी की बेटी काजल बताती हैं कि उनकी मां को अवसाद और एंग्जायटी की समस्या है। डॉक्टरों ने उन्हें नियमित रूप से दवा लेने की सलाह दी है। पहले तो अस्पताल से दवा मिल जाती थी, लेकिन अब हर बार कह दिया जाता है कि दवाई स्टॉक में नहीं है। काजल का कहना है कि उनका परिवार मजदूरी करता है और घर का खर्च चलाना ही मुश्किल है। अब दवाइयों के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है।
एमएमजी अस्पताल के सीएमएस डॉ. राकेश कुमार का कहना है कि कुछ दवाइयों का विकल्प मौजूद है, उनके बदले में विकल्प वाली दवाइयां दी जा रही हैं। जिन दवाइयों की कमी है, उनके लिए कार्पाेरेशन को डिमांड भेज दी गई है। जल्द ही वह भी उपलब्ध हो जाएंगी।
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अस्पताल के मानसिक प्रकोष्ठ विभाग में हर सप्ताह लगभग पांच सौ से छह सौ मरीज इलाज के लिए पहुंच रहे हैं लेकिन अस्पताल में फ्लुओक्सेटीन, डायजेपाम और क्लोरप्रोमाजीन जैसी जरूरी मानसिक रोग की दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं। ये दवाइयां सिजोफ्रेनिया, अवसाद, एंग्जायटी और बाइपोलर डिसऑर्डर जैसे रोगों में दी जाती हैं। बाजार में एक सप्ताह की दवाई का खर्च लगभग पांच सौ से सात सौ रुपये आता है, जो आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों के लिए वहन कर पाना मुश्किल है।
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मरीजों और उनके परिजनों का कहना है कि डॉक्टर कहते हैं कि मानसिक रोगों की दवाइयां सामान्य तौर पर लंबे समय तक लेनी पड़ती हैं। यदि इलाज बीच में रुक जाए तो स्थिति और बिगड़ सकती है। एक मरीज के परिजन राहुल का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को लेकर जागरूकता बढ़ने के बावजूद सरकारी स्तर पर दवाइयों की ऐसी कमी गंभीर चिंता का विषय है। जल्द से जल्द अस्पताल में दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चित की जाए ताकि इलाज सुचारु रूप से जारी रह सके।
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यह दवाइयां नहीं है अस्पताल में उपलब्ध
सिजोफ्रेनिया और साइकोसिस : रेसपेरिडॉन, हैलोपेरिडोल, क्लोरप्रोमाजीन
अवसाद : फ्लुओक्सेटीन, सर्ट्रालीन, एमिट्रिप्टीलीन
एंग्जायटी : अल्प्रोजलाम, लोरेजेपाम
बाइपोलर डिसऑर्डर : लिथियम कार्बोनेट
नशा-मुक्ति : डायजेपाम
ढाई से तीन हजार की खरीदनी पड़ रही हैं दवाइयां
मोहनलाल नाम के मरीज के बेटे सौरभ ने बताया कि उनके पिता को सिजोफ्रेनिया है। वह पिछले दो वर्षों से एमएमजी अस्पताल से इलाज करवा रहे हैं। पहले अस्पताल से मुफ्त में दवाइयां मिल जाया करती थीं, लेकिन अब पिछले दो महीने से अस्पताल में कोई दवा नहीं मिल रही। हर सप्ताह बाजार से करीब छह सौ रुपये की दवाइयां खरीदनी पड़ रही हैं। सौरभ ने बताया कि वह खुद एक प्राइवेट कंपनी में मामूली वेतन पर काम करते हैं। हर महीने ढाई से तीन हजार रुपये की दवाई खरीदना मुश्किल हो गया है।
कर्ज लेकर खरीदनी पड़ रही हैं दवाइयां
मरीज रेखा देवी की बेटी काजल बताती हैं कि उनकी मां को अवसाद और एंग्जायटी की समस्या है। डॉक्टरों ने उन्हें नियमित रूप से दवा लेने की सलाह दी है। पहले तो अस्पताल से दवा मिल जाती थी, लेकिन अब हर बार कह दिया जाता है कि दवाई स्टॉक में नहीं है। काजल का कहना है कि उनका परिवार मजदूरी करता है और घर का खर्च चलाना ही मुश्किल है। अब दवाइयों के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है।
एमएमजी अस्पताल के सीएमएस डॉ. राकेश कुमार का कहना है कि कुछ दवाइयों का विकल्प मौजूद है, उनके बदले में विकल्प वाली दवाइयां दी जा रही हैं। जिन दवाइयों की कमी है, उनके लिए कार्पाेरेशन को डिमांड भेज दी गई है। जल्द ही वह भी उपलब्ध हो जाएंगी।