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Ghaziabad News: बिना फीस हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी हरीश की लड़ाई

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Fri, 13 Mar 2026 12:44 AM IST
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Harish fought from High Court to Supreme Court without any fees
गाजियाबाद। अधिवक्ता मनीष जैन ने बिना किसी फीस के हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक हरीश राणा का केस लड़ा। वह कहते हैं कि यह मेरी जीत नहीं, बल्कि उन माता-पिता की जीत है, जो अपने जिगर के टुकड़े के लिए 13 वर्षों तक संघर्ष करते रहे।
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मनीष बताते हैं कि जब हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने आठ नवंबर 2024 को इस मामले में संवेदनशील आदेश दिए। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार को हरीश के लिए चिकित्सा सहायता और समुचित देखभाल सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था। इससे केस को एक नई मानवीय दिशा मिली थी।
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ब्रह्माकुमारी लवली दीदी के माध्यम से हुई मुलाकात

मनीष ने बताया कि मोहन नगर में ब्रह्माकुमारी लवली दीदी के माध्यम से उनकी मुलाकात अशोक राणा से हुई। दीदी ने अनुरोध किया कि अदालत के जरिये मदद करें। पहले दिल्ली हाईकोर्ट, फिर 2024 में सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाखिल की गई। मनीष कहते हैं कि यह केस सिर्फ कानूनी बहस नहीं था, बल्कि एक पिता और मां की टूटी उम्मीदों की कहानी था। वेंटिलेटर पर अपने बेटे को हर दिन देखना किसी भी इंसान के लिए असहनीय है। सुप्रीम कोर्ट ने कानून के साथ करुणा को भी महत्व दिया। मनीष कहते हैं कि अगर इस फैसले से एक पिता को मानसिक शांति और एक बेटे को पीड़ा से मुक्ति मिली तो यही मेरी सबसे बड़ी जीत है।
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2018 के कॉमन कॉज सिद्धांत पर आधारित फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट के अधिवक्ता कुमार धनंजय कहते हैं कि यह फैसला वर्ष 2018 के कॉमन कॉज सिद्धांत पर आधारित है। भारत में यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें कोर्ट ने सीधे तौर पर इच्छामृत्यु की मंजूरी दी। अदालत ने एम्स को निर्देश दिए कि हरीश के जीवन रक्षक उपकरण गरिमा के साथ हटाए जाएं और यह सुनिश्चित किया जाए कि उन्हें किसी प्रकार की पीड़ा न हो। यह निर्णय भविष्य में उन परिवारों के लिए रास्ता खोलेगा, जो असाध्य बीमारी और निरंतर पीड़ा से जूझ रहे हैं। कोर्ट ने साफ संदेश दिया है कि जीवन की गरिमा, केवल जीवन को खींचते रहने में नहीं, बल्कि सम्मानजनक विदाई में भी होती है।

रोगी के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता

अधिवक्ता डॉ. राजकुमार चौहान कहते हैं कि 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट की ओर से दी गई निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति भारतीय संवैधानिक कानून में महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ मरने के अधिकार को स्पष्ट करता है। हालांकि, यह फैसला मानवीय संवेदना और संवैधानिक मूल्यों को दर्शाता है, लेकिन यह भारत में जीवन के अंतिम चरण से जुड़े कानूनों की कमियों को भी उजागर करता है। इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अदालत ने रोगी के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता दी।


कानून बनाने की जरूरत

अधिवक्ता देवाशीष कहते हैं कि चिंताजनक पहलू यह है कि इस विषय पर संसद ने अब तक कोई व्यापक कानून नहीं बनाया। नैतिक, सामाजिक व चिकित्सा से जुड़े जटिल प्रश्नों पर संसद में चर्चा और कानून निर्माण होना चाहिए। यह फैसला मानवीय संवेदना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है तो संसद के लिए एक स्पष्ट संकेत भी है कि इच्छामृत्यु और जीवन के अंतिम चरण से जुड़े विषय पर व्यापक और स्पष्ट कानून बनाया जाना चाहिए।
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