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जज्बे को सलाम! दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए अस्पताल को बनाया घर
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कोविड सेंटर के बाहर कोरोना योद्धा।
जज्बे को सलाम! दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए अस्पताल को बनाया घर
गाजियाबाद। कोरोना का ऐसा दौर जब हर कोई मरीजों से भाग रहा था। संक्रमण के डर से सड़कों पर सन्नाटा था और घरों में कैद लोग भी अपने से मिलने तक से कतरा रहे थे। ऐसे समय पर इलाज का जिम्मा संभाल रहे चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ ने असाधारण योगदान दिया। घर-परिवार छोड़ मरीजों के इलाज की बागडोर संभाले वाले चिकित्सक कोरोना संक्रमित हुए लेकिन अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटे। मुश्किल भरे इस दौर में कोई आठ महीने तक अपनी नवजात बेटी से नहीं मिली तो किसी ने अपने घर छोड़कर अस्पताल में ही रुकने का फैसला लिया।
बीते वर्ष संक्रमण और उससे जान जाने के मामले तेजी से बढ़े तो कोविड लेवल-1 अस्पताल और उसमें भर्ती मरीजों का इलाज करने के लिए टीम की जरूरत पड़ी। मुरादनगर सीएचसी को लेवल- अस्पताल बनाया गया तो 31 लोगों से पहले चरण में उस टीम का हिस्सा बनने की सहमति दी जो सीधे मरीजों की देखरेख करने वाली थी। इन्हीं लोगों की बदौलत बाकी चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ को हौसला मिला। इन्हीं का हौसला था कि कोविड-2 और 3 स्तर के अस्पताल को भी चिकित्सक व अन्य स्टॉफ की सहमति मिलने में देरी नहीं हुई।
आठ माह तक नहीं मिले नवजात बेटी से, कंट्रोल रूम में मनाया जन्मदिन
एमएमजी अस्पताल में संचालित आईडीएसपी सेंटर के कोरोना कंट्रोल रूम में मरीजों का डाटा अपडेट करने की जिम्मेदारी एपिडमोलॉजिस्ट डॉ. शिवि अग्रवाल ने संभाल रखी थी। डॉ. शिवि बताते हैं कि आठ माह तक घर नहीं गया। इस दौरान नवजात बेटी से भी नहीं मिल पाया लेकिन जब सहयोगियों ने जन्मदिन कंट्रोल रूम मनाया तो बेहद खुशी मिली। ड्यूटी के वक्त संक्रमण की चपेट में भी आया लेकिन एक बात जहन में थी कि सच्चे मायने में लोगों की सेवा करने का यह वक्त है। इसलिए ठीक होते ही काम पर लौट आया। डॉ. शिवि को प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा एवं केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट कर कोरोना योद्धा के रूप में बधाई दी थी।
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जीवन का सबसे बेहतर अनुभव रहा
मुरादनगर सीएचसी के तत्कालीन प्रभारी डॉ. जीपी मथूरिया बताते हैं कि डाक्टर बनने के बाद जीवन का पहला अनुभव था कि जब समझ में कोरोना मरीजों के इलाज में डाक्टरों का समर्पण भाव क्या होता है। संक्रमण ने एहसास कराया कि डाक्टरों का संबंध मरीज के साथ क्या होता है, जिस समय संक्रमण से पूरा देश भयभीत था, उस दौरान अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मरीजों के चेहरे की खुशी देखकर चिकित्सक बनने पर पूरी टीम को गर्व होता था। हमारी पूरी टीम घर से बाहर रही। डॉक्टर व पैरामेडिक स्टाफ जब एक बार पीपीई किट पहन लेता था तो माथे से पसीना भी नहीं पोंछ सकते थे।
मेरी सास ने कहा ऊपर वाला ऐसा मौका हर किसी को नहीं देता
भोजपुर सीएचसी के टीबी विभाग में कार्यरत लैब टेक्नीशियन शबिस्ता अंजुम की ड्यूटी कोविड-1 अस्पताल मुरादनगर में लगी थी। वह पॉजिटिव मरीजों के सैंपल जांच के लिए भेजती थीं। शबिस्ता बताती हैं कि शुरुआत में डर लगता था, लेकिन घर से बाहर रहकर मरीजों की सेवा करने के लिए सास नसीन बानो और ससुर इकरामुद्दीन प्रोत्साहित करते थे। इससे संक्रमण का भय समाप्त हो गया था। सास कहती थीं ऊपर वाला बीमारों की सेवा करने का मौका हर किसी इंसान को नहीं देता है, यह मौका मिला है तो इसमें खुद को साबित करके दिखाओ। संक्रमण के दौरान मैंने साबित भी किया।
संक्रमित बुजुर्ग मरीज को कर दिया था कमरे में बंद
संक्रमण बढ़ने के साथ ही मरीजों को अस्पताल पहुंचाने, भर्ती कराने और डिस्चार्ज होने के बाद घर तक छोड़ने की जिम्मेदारी संजय यादव को दी गई थी। उन्हें एंबुलेंस का प्रभारी बनाया गया था। संजय बताते हैं कि कई बार स्थिति ऐसी होती थी कि मरीजों की संख्या बढ़ने के बाद उन्हें भर्ती कराने और घर से लाने में पूरी रात नहीं सो पाते थे। मुरादनगर में एक बुजुर्ग को संक्रमण फैलने के डर से उनके बेटे ने मकान के तीसरे फ्लोर पर बने एक कमरे में बंद किया था। जानकारी मिलने पर रात ढाई बजे मुरादनगर से लाकर संतोष अस्पताल में भर्ती कराया था। उनके स्वस्थ होने के बाद बड़ा सुकून मिला था।
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गाजियाबाद। कोरोना का ऐसा दौर जब हर कोई मरीजों से भाग रहा था। संक्रमण के डर से सड़कों पर सन्नाटा था और घरों में कैद लोग भी अपने से मिलने तक से कतरा रहे थे। ऐसे समय पर इलाज का जिम्मा संभाल रहे चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ ने असाधारण योगदान दिया। घर-परिवार छोड़ मरीजों के इलाज की बागडोर संभाले वाले चिकित्सक कोरोना संक्रमित हुए लेकिन अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटे। मुश्किल भरे इस दौर में कोई आठ महीने तक अपनी नवजात बेटी से नहीं मिली तो किसी ने अपने घर छोड़कर अस्पताल में ही रुकने का फैसला लिया।
बीते वर्ष संक्रमण और उससे जान जाने के मामले तेजी से बढ़े तो कोविड लेवल-1 अस्पताल और उसमें भर्ती मरीजों का इलाज करने के लिए टीम की जरूरत पड़ी। मुरादनगर सीएचसी को लेवल- अस्पताल बनाया गया तो 31 लोगों से पहले चरण में उस टीम का हिस्सा बनने की सहमति दी जो सीधे मरीजों की देखरेख करने वाली थी। इन्हीं लोगों की बदौलत बाकी चिकित्सकों व पैरामेडिकल स्टाफ को हौसला मिला। इन्हीं का हौसला था कि कोविड-2 और 3 स्तर के अस्पताल को भी चिकित्सक व अन्य स्टॉफ की सहमति मिलने में देरी नहीं हुई।
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आठ माह तक नहीं मिले नवजात बेटी से, कंट्रोल रूम में मनाया जन्मदिन
एमएमजी अस्पताल में संचालित आईडीएसपी सेंटर के कोरोना कंट्रोल रूम में मरीजों का डाटा अपडेट करने की जिम्मेदारी एपिडमोलॉजिस्ट डॉ. शिवि अग्रवाल ने संभाल रखी थी। डॉ. शिवि बताते हैं कि आठ माह तक घर नहीं गया। इस दौरान नवजात बेटी से भी नहीं मिल पाया लेकिन जब सहयोगियों ने जन्मदिन कंट्रोल रूम मनाया तो बेहद खुशी मिली। ड्यूटी के वक्त संक्रमण की चपेट में भी आया लेकिन एक बात जहन में थी कि सच्चे मायने में लोगों की सेवा करने का यह वक्त है। इसलिए ठीक होते ही काम पर लौट आया। डॉ. शिवि को प्रदेश के उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा एवं केशव प्रसाद मौर्य ने ट्वीट कर कोरोना योद्धा के रूप में बधाई दी थी।
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जीवन का सबसे बेहतर अनुभव रहा
मुरादनगर सीएचसी के तत्कालीन प्रभारी डॉ. जीपी मथूरिया बताते हैं कि डाक्टर बनने के बाद जीवन का पहला अनुभव था कि जब समझ में कोरोना मरीजों के इलाज में डाक्टरों का समर्पण भाव क्या होता है। संक्रमण ने एहसास कराया कि डाक्टरों का संबंध मरीज के साथ क्या होता है, जिस समय संक्रमण से पूरा देश भयभीत था, उस दौरान अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद मरीजों के चेहरे की खुशी देखकर चिकित्सक बनने पर पूरी टीम को गर्व होता था। हमारी पूरी टीम घर से बाहर रही। डॉक्टर व पैरामेडिक स्टाफ जब एक बार पीपीई किट पहन लेता था तो माथे से पसीना भी नहीं पोंछ सकते थे।
मेरी सास ने कहा ऊपर वाला ऐसा मौका हर किसी को नहीं देता
भोजपुर सीएचसी के टीबी विभाग में कार्यरत लैब टेक्नीशियन शबिस्ता अंजुम की ड्यूटी कोविड-1 अस्पताल मुरादनगर में लगी थी। वह पॉजिटिव मरीजों के सैंपल जांच के लिए भेजती थीं। शबिस्ता बताती हैं कि शुरुआत में डर लगता था, लेकिन घर से बाहर रहकर मरीजों की सेवा करने के लिए सास नसीन बानो और ससुर इकरामुद्दीन प्रोत्साहित करते थे। इससे संक्रमण का भय समाप्त हो गया था। सास कहती थीं ऊपर वाला बीमारों की सेवा करने का मौका हर किसी इंसान को नहीं देता है, यह मौका मिला है तो इसमें खुद को साबित करके दिखाओ। संक्रमण के दौरान मैंने साबित भी किया।
संक्रमित बुजुर्ग मरीज को कर दिया था कमरे में बंद
संक्रमण बढ़ने के साथ ही मरीजों को अस्पताल पहुंचाने, भर्ती कराने और डिस्चार्ज होने के बाद घर तक छोड़ने की जिम्मेदारी संजय यादव को दी गई थी। उन्हें एंबुलेंस का प्रभारी बनाया गया था। संजय बताते हैं कि कई बार स्थिति ऐसी होती थी कि मरीजों की संख्या बढ़ने के बाद उन्हें भर्ती कराने और घर से लाने में पूरी रात नहीं सो पाते थे। मुरादनगर में एक बुजुर्ग को संक्रमण फैलने के डर से उनके बेटे ने मकान के तीसरे फ्लोर पर बने एक कमरे में बंद किया था। जानकारी मिलने पर रात ढाई बजे मुरादनगर से लाकर संतोष अस्पताल में भर्ती कराया था। उनके स्वस्थ होने के बाद बड़ा सुकून मिला था।