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नारों ने बदला चुनावी नजारा

Ghaziabad Bureau गाजियाबाद ब्यूरो
Updated Tue, 25 Jan 2022 01:00 AM IST
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नारों ने बदला चुनावी नजारा
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गाजियाबाद। चुनाव में प्रत्याशी और पार्टी तो लड़ती ही हैं, साथ ही नारों की भी लड़ाई होती है। राजनीति में राजनीतिक दलों के कई ऐसे जुमले, नारे ऐसे रहे, जिन्होंने चुनाव का नजारा ही बदल दिया। इन नारों ने मतदाताओं के दिलों दिमाग पर असर किया तो राजनीतिक दल चुनावी समर जीत गए। एक बार फिर भाजपा, बसपा, सपा और रालोद नए नारों के साथ चुनाव मैदान में हैं।
राजनीति के जानकार बताते हैं कि हर विधानसभा चुनाव में यूपी में राजनीतिक दल नए नारे के साथ उतरे, कई प्रयोग इनमें बेहद सफल रहे और नारे देने वाला राजनीतिक दल सत्ता तक पहुंच गया। हालांकि कई नारे सफल नहीं रहे। राम मंदिर आंदोलन की वजह से 1991 में भाजपा को यूपी में पूर्ण बहुमत मिला। ‘राम लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे’ और ‘बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का’ नारा दिया तो भाजपा को मजबूती मिली। इसके बाद सपा-बसपा साथ आई और ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्री राम’ का नारा दिया। 1995 में हुए गेस्ट हाउस कांड के बाद बसपा और सपा एक-दूसरे के विरोधी हो गए और बसपा ने सपाइयों को गुंडा कहना शुरू कर दिया था।

2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, बटन दबेगा हाथी पर’ नारा देकर समाजवादी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया। बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और पांच साल राज किया। इसी चुनाव में सपा मुखिया मुलायम सिंह ने ‘यूपी में दम है, क्योंकि जुर्म यहां कम है’ का नारा दिया था, लेकिन मतदाताओं ने इसे नकार दिया। कांशीराम के समय में ब्राह्मण, ठाकुर, वैश्यों के खिलाफ विवादित नारा दे चुकी बसपा ने 2007 में ब्राह्मणों को साधने के लिए नारा दिया ‘पंडित शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु, महेश है’। 2012 के चुनाव में सपा ने फिर नारा दिया ‘जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है’। बसपा ने ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ का नारा दिया, लेकिन जनता को इस बार यह पसंद नहीं आया।
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अबकी बार, तीन सौ पार
2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भी नारे बनेे। भाजपा ने ‘अबकी बार, तीन सौ पार’ का नारा दिया तो सपा ने ‘अखिलेश का जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है’ और पहली बार डिंपल यादव को प्रचार में उतार कर ‘जीत की चाभी, डिंपल भाभी’ का नारा दिया। सपा और कांग्रेस के गठबंधन ने ‘यूपी को यह साथ पसंद है’ का नारा देकर युवाओं को साधने का प्रयास किया, लेकिन सफल नहीं रहा।
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22 में बाइसिकल और यूपी फिर मांगे भाजपा सरकार
2022 के विधानसभा चुनाव में भी सभी पार्टियों ने रोचक नारे देकर मतदाताओं के दिलों-दिमाग पर छाप छोड़ने का प्रयास किया है। भाजपा ने ‘यूपी फिर मांगे भाजपा सरकार’ का नारा दिया है। वहीं समाजवादी पार्टी ने ‘22 में बाइसिकल’ ‘नई हवा है, नई सपा है’ और ‘यूपी का ये जनादेश, आ रहे हैं अखिलेश’ का नारा दिया है। कांग्रेेस ने ‘लड़की हूं लड़ सकती हूं’ का नारा देकर महिला मतदाताओं पर डोरे डाले हैं। वहीं बसपा ने ‘हर पोलिंग बूथ को जिताना है, बसपा को सत्ता में लाना है’ का नारा दिया है।
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बयान
राजनीति में लंबे भाषण से ज्यादा काम एक अच्छा नारा कर देता है। पुराने समय में भी बच्चे गलियों-मोहल्लों में नारे लगाते थे तो चुनाव का माहौल बन जाता था। युवाओं में जोश आ जाता था और चुनाव में जान पड़ जाती थी। सिर्फ प्रत्याशी ही नहीं, नारे भी चुनाव लड़ते हैं। इन नारों में पार्टी का एक संदेश होता है। - मासूम गाजियाबाद, शायर
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पहले नारों की जगह पूरे गीत लिखे जाते थे। महिलाएं इन गीत को गाते हुए जाती थीं, इससे पता चल जाता था कि किसकी वोट डालने जा रही हैं। अब इनका रूप नारों ने ले लिया। यह नारे मतदाताओं के दिल और दिमाग पर गहरी छाप छोड़ते हैं ओर इसका फायदा चुनाव में मिलता है। अच्छे संदेश वाले नारे चुनाव की जान होते हैं और इन्हें बहुत सोच-समझकर बनाया जाता है। - रमा सिंह, कवियित्री
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बड़े समूहों को जोड़ने के लिए नारा जरूरी होता है। राजनीति से अलग सेना में भी एक नारे पर जवान देश के लिए मर मिटने को तैयार हो जाते हैं, उनमें जोश भर जाता है। इसी तरह राजनीति में नारा मतदाताओं में भावनाओं को बढ़ावा देते हैं। किसी बड़े समूह को जोड़ने के लिए यह बड़ा प्रभावी होता है। लंबे समय तक लोगों के दिल-दिमाग पर इसकी छाप रहती है। - डा. संजीव त्यागी, साइकोलॉजिस्ट

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