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गाजियाबाद नजारत घोटाला: 15 साल में लगीं 472 तारीख, 280 में हो सकी 49 की गवाही
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गाजियाबाद। 15 साल पहले गाजियाबाद कोर्ट के नजारत विभाग में हुए 6.58 करोड़ रुपये के घोटाले की सीबीआई कोर्ट में 15 साल की सुनवाई में 49वीं गवाही चल रही है। सीबीआई ने मामले में 280 गवाह बनाए हैं। अभी तक 472 दिन सुनवाई हो चुकी है। घोटाले में छह न्यायाधीश और कई कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं, जबकि आठ आरोपियों की विचारण के दौरान मौत हो चुकी है।
हाईकोर्ट के आदेश पर प्रत्येक सोमवार को सुनवाई हो रही है, इसके बावजूद गवाही पूरी नहीं हो पाई है। 15 साल में कई न्यायाधीशों का तबादला भी हो चुका है। घोटाले की जांच के बाद सीबीआई ने तत्कालीन छह न्यायाधीश समेत 70 लोगों को आरोपी बनाते हुए वर्ष 2010 में आरोप पत्र पेश किया था।
सीबीआई जज ने दर्ज कराया था मुकदमा
नजारत घोटाले का खुलासा फरवरी 2008 को विशेष सीबीआई कोर्ट की तत्कालीन जज रमा जैन ने किया था। उन्होंने स्वयं वादी बनकर नाजिर आशुतोष अस्थाना सहित 63 आरोपियों के खिलाफ कविनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, बाद में जांच के दौरान आरोपियों की संख्या बढ़ गई थी। आशुतोष की डासना जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।
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यह था मामला
सीबीआई के चार्जशीट के अनुसार वर्ष 2001 से 2008 के बीच जनपद न्यायालय में कार्यरत तत्कालीन केन्द्रीय नाजिर/बिल क्लर्क आशुतोष अस्थाना ने लोक सेवक के रूप में अपनी हैसियत का आपराधिक दुरुपयोग किया। उसने तत्कालीन जनपद न्यायाधीश आरपी मिश्रा, आरपी यादव, आरएन मिश्रा, एके सिंह, आरएस चौबे, प्रभारी जनपद न्यायाधीश अरुण कुमार, तृतीय श्रेणी के 13 कर्मचारियों, चतुर्थ श्रेणी के 33 कर्मचारियों और 13 प्राइवेट व्यक्तियों समेत कुल 65 के साथ षडयंत्र कर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के नाम पर फर्जी प्रार्थना पत्र, बिल बाउचर, ऑर्डर बनाकर जीपीएफ फंड से 65857892 रुपये निकाल लिया था।
फर्नीचर, क्राकरी और घरेलू सामान पर खर्च हुआ था धन
सीबीआई को जांच में पता चला था कि तत्कालीन जनपद न्यायाधीश आरपी मिश्रा, आरपी यादव, आरएन मिश्रा, एके सिंह, आरएस चौबे और अरुण कुमार ने महंगे उपहार दैनिक उपयोग की वस्तुएं खाद्य पदार्थ, टीवी, वाशिंग मशीन, फ्रिज, मोबाइल्स, क्राकरी आदि घरेलू उपकरण, टैक्सी, ट्रांसपोर्ट वीडियोग्राफी / फोटोग्राफी, फर्नीचर, आदि मुफ्त में मंगवाया था।
ट्रांसफर के बावजूद जीपीएफ का कार्य कर रहा था आशुतोष
मुख्य अभियुक्त (मृतक) आशुतोष अस्थाना जनपद न्यायालय गाजियाबाद में तृतीय श्रेणी कर्मचारी के रूप में नियुक्त हुआ था और 15 मई 96 से चतुर्थी कर्मचारियों के जीपीएफ भुगतान का लगातार कार्य कर रहा था। प्रोन्नति/प्रतिनियुक्ति के बाद भी यह कार्य उससे वापस नहीं लिया गया। तत्कालीन जनपद न्यायाधीश आरपी यादव ने नौ मार्च 2004 को आशुतोष अस्थाना को केन्द्रीय नाजिर के पद पर प्रतिनियुक्त किया। बिल क्लर्क का कार्य तृतीय श्रेणी कर्मचारी टिक्कू को सौंप दिया गया, इसके बावजूद चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के जीपीएफ भुगतान का काम आशुतोष अस्थाना के पास ही रखा गया। जनपद न्यायाधीश आरएन मिश्रा ने भी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के जीपीए का कार्य आशुतोष अस्थाना के पास ही रहने दिया। उन्होंने अन्य कर्मचारियों के कार्य में परिवर्तन किया, लेकिन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के जीपीएफ का कार्य आशुतोष अस्थाना के पास 2008 तक बना रहा। वर्ष 2001 से 2008 के दौरान भी किसी जनपद न्यायाधीश ने यह कार्य उससे हटाया नहीं था।
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हाईकोर्ट के आदेश पर प्रत्येक सोमवार को सुनवाई हो रही है, इसके बावजूद गवाही पूरी नहीं हो पाई है। 15 साल में कई न्यायाधीशों का तबादला भी हो चुका है। घोटाले की जांच के बाद सीबीआई ने तत्कालीन छह न्यायाधीश समेत 70 लोगों को आरोपी बनाते हुए वर्ष 2010 में आरोप पत्र पेश किया था।
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सीबीआई जज ने दर्ज कराया था मुकदमा
नजारत घोटाले का खुलासा फरवरी 2008 को विशेष सीबीआई कोर्ट की तत्कालीन जज रमा जैन ने किया था। उन्होंने स्वयं वादी बनकर नाजिर आशुतोष अस्थाना सहित 63 आरोपियों के खिलाफ कविनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, बाद में जांच के दौरान आरोपियों की संख्या बढ़ गई थी। आशुतोष की डासना जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो चुकी है।
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यह था मामला
सीबीआई के चार्जशीट के अनुसार वर्ष 2001 से 2008 के बीच जनपद न्यायालय में कार्यरत तत्कालीन केन्द्रीय नाजिर/बिल क्लर्क आशुतोष अस्थाना ने लोक सेवक के रूप में अपनी हैसियत का आपराधिक दुरुपयोग किया। उसने तत्कालीन जनपद न्यायाधीश आरपी मिश्रा, आरपी यादव, आरएन मिश्रा, एके सिंह, आरएस चौबे, प्रभारी जनपद न्यायाधीश अरुण कुमार, तृतीय श्रेणी के 13 कर्मचारियों, चतुर्थ श्रेणी के 33 कर्मचारियों और 13 प्राइवेट व्यक्तियों समेत कुल 65 के साथ षडयंत्र कर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के नाम पर फर्जी प्रार्थना पत्र, बिल बाउचर, ऑर्डर बनाकर जीपीएफ फंड से 65857892 रुपये निकाल लिया था।
फर्नीचर, क्राकरी और घरेलू सामान पर खर्च हुआ था धन
सीबीआई को जांच में पता चला था कि तत्कालीन जनपद न्यायाधीश आरपी मिश्रा, आरपी यादव, आरएन मिश्रा, एके सिंह, आरएस चौबे और अरुण कुमार ने महंगे उपहार दैनिक उपयोग की वस्तुएं खाद्य पदार्थ, टीवी, वाशिंग मशीन, फ्रिज, मोबाइल्स, क्राकरी आदि घरेलू उपकरण, टैक्सी, ट्रांसपोर्ट वीडियोग्राफी / फोटोग्राफी, फर्नीचर, आदि मुफ्त में मंगवाया था।
ट्रांसफर के बावजूद जीपीएफ का कार्य कर रहा था आशुतोष
मुख्य अभियुक्त (मृतक) आशुतोष अस्थाना जनपद न्यायालय गाजियाबाद में तृतीय श्रेणी कर्मचारी के रूप में नियुक्त हुआ था और 15 मई 96 से चतुर्थी कर्मचारियों के जीपीएफ भुगतान का लगातार कार्य कर रहा था। प्रोन्नति/प्रतिनियुक्ति के बाद भी यह कार्य उससे वापस नहीं लिया गया। तत्कालीन जनपद न्यायाधीश आरपी यादव ने नौ मार्च 2004 को आशुतोष अस्थाना को केन्द्रीय नाजिर के पद पर प्रतिनियुक्त किया। बिल क्लर्क का कार्य तृतीय श्रेणी कर्मचारी टिक्कू को सौंप दिया गया, इसके बावजूद चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के जीपीएफ भुगतान का काम आशुतोष अस्थाना के पास ही रखा गया। जनपद न्यायाधीश आरएन मिश्रा ने भी चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के जीपीए का कार्य आशुतोष अस्थाना के पास ही रहने दिया। उन्होंने अन्य कर्मचारियों के कार्य में परिवर्तन किया, लेकिन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के जीपीएफ का कार्य आशुतोष अस्थाना के पास 2008 तक बना रहा। वर्ष 2001 से 2008 के दौरान भी किसी जनपद न्यायाधीश ने यह कार्य उससे हटाया नहीं था।