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Ghaziabad News: फर्जी लेखपाल रिपोर्ट पर जीडीए ने पास किया नक्शा, जमीन का सत्यापन तक नहीं हुआ
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गाजियाबाद। पसौंडा में नगर निगम के नाम दर्ज झील की जमीन पर बहुमंजिला इमारत बनने के मामले में अब गाजियाबाद विकास प्राधिकरण (जीडीए) भी सवालों के कठघरे में है। इस इमारत का नक्शा फर्जी लेखपाल रिपोर्ट के आधार पर जीडीए से पास होने का मामला सामने आया है। जांच में खुलासा हुआ है कि जिस लेखपाल की रिपोर्ट के आधार पर नक्शा स्वीकृत किया गया, वह उस समय सेवानिवृत्त हो चुके थे।
हैरानी की बात है कि जीडीए ने न तो जमीन का भौतिक सत्यापन कराया और न ही प्रस्तुत किए गए खसरा-खतौनी व अन्य दस्तावेजों की विधिवत जांच की। मामला तब सामने आया, जब नगर निगम ने हस्तक्षेप किया। भूमाफिया तब तक बहुमंजिला इमारत खड़ी कर चुके थे और कई फ्लैटों की बुकिंग भी हो चुकी थी।
जानकारी के अनुसार, किसी भी भवन का नक्शा स्वीकृत करने से पहले जीडीए राजस्व विभाग और संबंधित स्थानीय निकाय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि नगर निगम की ओर से एनओसी जारी करते समय भूमि की स्थिति की जांच क्यों नहीं की गई। महापौर सुनीता दयाल की शिकायत पर सदर तहसील ने जांच कराई, जिसमें संबंधित भूमि नगर निगम की पाई गई। इसके बावजूद निर्माण कार्य नहीं रुका और अंततः महापौर को स्वयं हस्तक्षेप कर निर्माण रुकवाना पड़ा।
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महापौर सुनीता दयाल ने बताया कि जिस लेखपाल ओमपाल सिंह के नाम की रिपोर्ट जीडीए में प्रस्तुत की गई थी, उसे स्वयं ओमपाल सिंह ने फर्जी बताया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में दोनों स्तरों पर गंभीर लापरवाही हुई है। करोड़ों रुपये की नगर निगम भूमि पर कब्जे के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। साथ ही अवैध इमारत को ध्वस्त कराने की कार्रवाई भी की जाएगी।
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निष्पक्ष जांच हुई तो घिर सकते हैं कई अफसर-कर्मचारी
सूत्रों के मुताबिक, भवन का नक्शा पास कराने के लिए कम से कम छह विभागों की एनओसी आवश्यक होती है। इसमें तहसील के अलावा संबंधित भूमि के स्वामित्व वाले विभाग की अनुमति भी शामिल रहती है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि नगर निगम की ओर से एनओसी किस अधिकारी ने जारी की। जीडीए में भी अलग तहसीलदार और लेखपाल तैनात हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच होने पर कई सरकारी अधिकारी और कर्मचारी कार्रवाई की जद में आ सकते हैं। यही वजह है कि महापौर को छोड़ अन्य जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में खुलकर बोलने से बच रहे हैं।
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हैरानी की बात है कि जीडीए ने न तो जमीन का भौतिक सत्यापन कराया और न ही प्रस्तुत किए गए खसरा-खतौनी व अन्य दस्तावेजों की विधिवत जांच की। मामला तब सामने आया, जब नगर निगम ने हस्तक्षेप किया। भूमाफिया तब तक बहुमंजिला इमारत खड़ी कर चुके थे और कई फ्लैटों की बुकिंग भी हो चुकी थी।
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जानकारी के अनुसार, किसी भी भवन का नक्शा स्वीकृत करने से पहले जीडीए राजस्व विभाग और संबंधित स्थानीय निकाय से अनापत्ति प्रमाणपत्र (एनओसी) लेता है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि नगर निगम की ओर से एनओसी जारी करते समय भूमि की स्थिति की जांच क्यों नहीं की गई। महापौर सुनीता दयाल की शिकायत पर सदर तहसील ने जांच कराई, जिसमें संबंधित भूमि नगर निगम की पाई गई। इसके बावजूद निर्माण कार्य नहीं रुका और अंततः महापौर को स्वयं हस्तक्षेप कर निर्माण रुकवाना पड़ा।
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महापौर सुनीता दयाल ने बताया कि जिस लेखपाल ओमपाल सिंह के नाम की रिपोर्ट जीडीए में प्रस्तुत की गई थी, उसे स्वयं ओमपाल सिंह ने फर्जी बताया है। उन्होंने कहा कि इस मामले में दोनों स्तरों पर गंभीर लापरवाही हुई है। करोड़ों रुपये की नगर निगम भूमि पर कब्जे के लिए फर्जी दस्तावेज तैयार करने वालों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। साथ ही अवैध इमारत को ध्वस्त कराने की कार्रवाई भी की जाएगी।
निष्पक्ष जांच हुई तो घिर सकते हैं कई अफसर-कर्मचारी
सूत्रों के मुताबिक, भवन का नक्शा पास कराने के लिए कम से कम छह विभागों की एनओसी आवश्यक होती है। इसमें तहसील के अलावा संबंधित भूमि के स्वामित्व वाले विभाग की अनुमति भी शामिल रहती है। ऐसे में यह जांच का विषय है कि नगर निगम की ओर से एनओसी किस अधिकारी ने जारी की। जीडीए में भी अलग तहसीलदार और लेखपाल तैनात हैं। ऐसे में निष्पक्ष जांच होने पर कई सरकारी अधिकारी और कर्मचारी कार्रवाई की जद में आ सकते हैं। यही वजह है कि महापौर को छोड़ अन्य जिम्मेदार अधिकारी इस मामले में खुलकर बोलने से बच रहे हैं।