{"_id":"58ade1a04f1c1b701cb237c6","slug":"promotion-to-the-lure-of-blood-was-shed-now-in-bars","type":"story","status":"publish","title_hn":"प्रमोशन के लालच में बहाया था खून, अब सलाखों में","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
प्रमोशन के लालच में बहाया था खून, अब सलाखों में
ब्यूरो, अमर उजाला /गाजियाबाद
Updated Thu, 23 Feb 2017 12:38 AM IST
विज्ञापन
अपराध
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
चाहत तो आउट ऑफ टर्न की थी, मगर मिला आजीवन कारावास। भोजपुर में हुए इस फर्जी एनकाउंटर में शामिल रहे सभी पुलिसकर्मियों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। सामाजिक प्रतिष्ठा तो दांव पर लगी ही, साथ ही साथ अब उम्रकैद की सजा भी काटनी पडे़गी।
केस की सुनवाई के दौरान ही जहां एक आरोपी पुलिसकर्मी रणवीर सिंह की मृत्यु हो गई, वहीं चार को अब कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा मिली है। इसी एनकाउंटर में बाद में शामिल हुई अंडरट्रेनी लेडी आईपीएस ज्योति बेलूर को तो अपनी नौकरी के साथ ही देश भी छोड़ने को मजबूर होना पड़ा।
8 नवंबर 1996 को हुए इस चर्चित एनकाउंटर का सच सीबीआई ने चार्जशीट के रूप में कोर्ट में पेश किया तो हर कोई हैरान रह गया। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में खुलासा किया कि रक्षक बने भक्षकों ने सिर्फ आउट ऑफ टर्न और इनाम हासिल करने के लालच में चार ऐसे युवकों को बदमाश बताकर गोलियां से भून दिया, जोकि फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूरों के रूप में काम करते थे।
विज्ञापन
खास बात यह भी है कि इस एनकाउंटर के बाद सिर्फ और सिर्फ तत्कालीन एसओ भोजपुर रहे दरोगा लाल सिंह का ही प्रमोशन हुआ और वह डिप्टी एसपी पद से रिटायर हुए। बचाव पक्ष के अधिवक्ता सुभाषचंद सक्सेना का कहना है कि यह प्रमोशन भी रूटीन प्रक्रिया के तहत हुए थे। इसमें एक भी प्रमोशन आउट ऑफ टर्न नहीं था। इसके अलावा जोगेंद्र सिंह दरोगा और सुभाष व सूर्यभान कांस्टेबल ही रह गए।
इतना ही नहीं अंडरट्रेनी के रूप में तैनात लेडी आईपीएस ज्योति बेलूर को न केवल अपनी सर्विस छोड़नी पड़ी, बल्कि गिरफ्तारी और सजा के डर से उन्होंने इंडिया ही छोड़ दिया। सीबीआई की माने तो वर्तमान में ज्योति बेलूर इंग्लैंड में वहीं की नागरिकता लेकर रह रही हैं और टीचिंग कर रही हैं।
एनकाउंटर मामले में चली थीं तीन फाइलें
भोजपुर एनकाउंटर के इस मामले में सीबीआई कोर्ट में तीन अलग-अलग फाइलें चली थी। एक फाइल में तत्कालीन एसओ भोजपुर लाल सिंह के अलावा कांस्टेबल सूर्यभान व सुभाष का केस विचाराधीन था।
दरोगा जोगेंद्र सिंह की गिरफ्तारी सीबीआई ने बाद में की थी, इसी के चलते कोर्ट ने उसकी फाइल को अलग कर दिया था। इन्हीं दो फाइलों में कोर्ट ने आज आरोपियों को सजा सुनाई है।
तीसरी फाइल पूर्व आईपीएस ज्योति बेलूर के खिलाफ चली थी। ज्योति बेलूर को सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया था। बाद में बैलेस्टिक जांच से यह पता चला था कि मुठभेड़ में ज्योति बेलूर की सरकारी रिवाल्वर से भी गोलियां चली थीं।
इसके बाद 14 सितंबर 2007 को कोर्ट ने लेडी आईपीएस को तलब किया था। आरोपी आईपीएस के खिलाफ कोर्ट कई बार गैर जमानती वारंट जारी कर चुकी है। इसके बावजूद वह कोर्ट में पेश नहीं हो रहीं।
अब एक बार फिर से कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ज्योति बेलूर को इंग्लैंड से बुलाने की तैयारी कर रही है। इस मामले में सुनवाई के लिए कोर्ट ने दस मार्च की तारीख नियत कर रखी है।
सजा सुनते ही बेटे से बोला सुभाष, परिवार का ख्याल रखना
बुधवार दोपहर जब चारों आरोपियों लाल सिंह, जोगेंद्र सिंह, सूर्यभान और सुभाष को सीबीआई कोर्ट में पेश किया गया तो उनके चेहरे पर उड़ती हवाइयां साफ नजर आ रही थीं। सभी को इस बात का भी गम था कि उनका एक भी साथी उनसे मिलने नहीं आया था।
सिर्फ परिवार के लोग ही कोर्ट में थे। कांस्टेबल सुभाष की हालत कोर्ट में आने के बाद से सबसे ज्यादा खराब थी। उसकी आंखों से छलकते आंसू भी साफ नजर आ रहे थे। केस का फैसला सुनने पहुंचे अपने बेटे से सुभाष ने सिर्फ इतना ही कहा कि ‘अब घर की जिम्मेदारी तुम पर है, परिवार का ख्याल रखना।’
अभियोजन और डिफेंस के अधिवक्ताओं ने दिए अपने-अपने तर्क
आरोपी पुलिसकर्मियों की सजा पर बहस करते हुए अभियोजन और बचाव पक्ष ने अपने-अपने तर्क कोर्ट के समक्ष पेश किए। अपनी करीब सात मिनट की बहस में अभियोजन की ओर से सीबीआई लोक अभियोजक राजन दहिया ने इसे हीनियस क्राइम बताते हुए कहा कि फर्जी एनकाउंटर का यह मामला विरल केसों में विरलतम की श्रेणी में आता है।
चार निर्दोष युवकों की इस निर्मम हत्या का सिर्फ एक ही मकसद था कि किसी तरह से प्रमोशन मिल जाए। ऐसे में पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा दी जाए। बचाव पक्ष के अधिवक्ता सुभाषचंद सक्सेना ने अपनी करीब दस मिनट की बहस में कोर्ट को बताया कि पुलिस को नहीं पता था कि उपरोक्त चारों युवक बदमाश हैं या नहीं।
जवाबी कार्रवाई और अपनी अभिरक्षा में पुलिस ने गोलियां चलाई थीं। इसके अलावा चारों पुलिसकर्मियों को कोई आउट ऑफ टर्न प्रमोशन नहीं मिला है। आरोपी कांस्टेबल सुभाष तो एनकाउंटर के समय अंडरट्रेनी था और अंडरट्रेनी को आउट ऑफ टर्न दिए जाने का कोई प्रावधान ही नहीं है। डिफेंस ने आरोपियों के बच्चों, परिवार की स्थिति और बीमारी को आधार बताते हुए कम से कम सजा दिए जाने की मांग कोर्ट से की।
‘फैसले से संतुष्ट...मगर फांसी की सजा न मिलने का है मलाल’
भोजपुर एनकाउंटर मामले में दोषी पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने केबाद मृतकों के परिजन फैसले से संतुष्ट हैं। उनके चेहरे पर खुशी झलक रही थी।
हालांकि उनका कहना है कि उन्हें यह मलाल रहेगा कि आरोपी पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा नहीं हुई। उन्होंने इस दिन के लिए 20 साल तक लंबी लड़ाई लड़ी, अब जाकर उनके दिल की कसक निकली है।
मृतक अशोक की बुजुर्ग मां शीला और उसकी बहनों का कहना था कि उन्हें सुकून मिला है। उन्होंने घर-जमीन बेचकर यह लड़ाई लड़ी है। फैसले से उनका अदालत पर भरोसा और भी मजबूत हुआ है।
वहीं, दूसरे मृतक जलालुद्दीन की मां शरीफन और छोटे भाई आफताब का कहना था कि देरी से ही सही, लेकिन उन्हें इंसाफ मिला है। हालांकि वे चाहते थे कि दोषी पुलिसकर्मियों फांसी की सजा होती। इनके अलावा तीसरे मृतक जसवीर के भाई बीर सिंह और भतीजे अमित का कहना था कि उन्हें उम्मीद थी कि दोषी पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा होगी।
चौथे मृतक प्रवेश के पिता महेंद्र सिंह की आंखों से आंसू बह निकले। उनका कहना था यह खुशी केआंसू हैं। बेटा तो वापस नहीं आएगा, लेकिन उसे इंसाफ दिला पाए, इसका सुकून रहेगा। उन्होंने मीडिया का भी शुक्रिया अदा किया, जिसने पूरे मामले को प्रमुखता से उठाया।
दूसरी तरफ, कोर्ट के बाहर आरोपी पुलिसकर्मियों के परिजन भी आए हुए थे। सजा सुनाए जाने के बाद उनके चेहरे लटक गए और कई महिलाओं के आंसू भी निकल गए।
डासना जेल में बैरक नंबर सात में रखे गए दोषी पुलिसकर्मी
दोषी पुलिसकर्मियों को कड़ी सुरक्षा के बीच बुधवार शाम डासना जेल भेज दिया गया। जेल में उन्हें बैरक नंबर सात (मुलाहिजा बैरक) में रखा गया है। जेल अधीक्षक एसपी यादव ने बताया कि जल्द ही इनकेबैरक बदले जाएंगे। आरोपियों पुलिसकर्मियों ने खाने में दाल और रोटियां खाई हैं।
विज्ञापन
केस की सुनवाई के दौरान ही जहां एक आरोपी पुलिसकर्मी रणवीर सिंह की मृत्यु हो गई, वहीं चार को अब कोर्ट से आजीवन कारावास की सजा मिली है। इसी एनकाउंटर में बाद में शामिल हुई अंडरट्रेनी लेडी आईपीएस ज्योति बेलूर को तो अपनी नौकरी के साथ ही देश भी छोड़ने को मजबूर होना पड़ा।
विज्ञापन
8 नवंबर 1996 को हुए इस चर्चित एनकाउंटर का सच सीबीआई ने चार्जशीट के रूप में कोर्ट में पेश किया तो हर कोई हैरान रह गया। सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में खुलासा किया कि रक्षक बने भक्षकों ने सिर्फ आउट ऑफ टर्न और इनाम हासिल करने के लालच में चार ऐसे युवकों को बदमाश बताकर गोलियां से भून दिया, जोकि फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूरों के रूप में काम करते थे।
विज्ञापन
खास बात यह भी है कि इस एनकाउंटर के बाद सिर्फ और सिर्फ तत्कालीन एसओ भोजपुर रहे दरोगा लाल सिंह का ही प्रमोशन हुआ और वह डिप्टी एसपी पद से रिटायर हुए। बचाव पक्ष के अधिवक्ता सुभाषचंद सक्सेना का कहना है कि यह प्रमोशन भी रूटीन प्रक्रिया के तहत हुए थे। इसमें एक भी प्रमोशन आउट ऑफ टर्न नहीं था। इसके अलावा जोगेंद्र सिंह दरोगा और सुभाष व सूर्यभान कांस्टेबल ही रह गए।
इतना ही नहीं अंडरट्रेनी के रूप में तैनात लेडी आईपीएस ज्योति बेलूर को न केवल अपनी सर्विस छोड़नी पड़ी, बल्कि गिरफ्तारी और सजा के डर से उन्होंने इंडिया ही छोड़ दिया। सीबीआई की माने तो वर्तमान में ज्योति बेलूर इंग्लैंड में वहीं की नागरिकता लेकर रह रही हैं और टीचिंग कर रही हैं।
एनकाउंटर मामले में चली थीं तीन फाइलें
भोजपुर एनकाउंटर के इस मामले में सीबीआई कोर्ट में तीन अलग-अलग फाइलें चली थी। एक फाइल में तत्कालीन एसओ भोजपुर लाल सिंह के अलावा कांस्टेबल सूर्यभान व सुभाष का केस विचाराधीन था।
दरोगा जोगेंद्र सिंह की गिरफ्तारी सीबीआई ने बाद में की थी, इसी के चलते कोर्ट ने उसकी फाइल को अलग कर दिया था। इन्हीं दो फाइलों में कोर्ट ने आज आरोपियों को सजा सुनाई है।
तीसरी फाइल पूर्व आईपीएस ज्योति बेलूर के खिलाफ चली थी। ज्योति बेलूर को सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में आरोपी नहीं बनाया था। बाद में बैलेस्टिक जांच से यह पता चला था कि मुठभेड़ में ज्योति बेलूर की सरकारी रिवाल्वर से भी गोलियां चली थीं।
इसके बाद 14 सितंबर 2007 को कोर्ट ने लेडी आईपीएस को तलब किया था। आरोपी आईपीएस के खिलाफ कोर्ट कई बार गैर जमानती वारंट जारी कर चुकी है। इसके बावजूद वह कोर्ट में पेश नहीं हो रहीं।
अब एक बार फिर से कोर्ट के आदेश पर सीबीआई ज्योति बेलूर को इंग्लैंड से बुलाने की तैयारी कर रही है। इस मामले में सुनवाई के लिए कोर्ट ने दस मार्च की तारीख नियत कर रखी है।
सजा सुनते ही बेटे से बोला सुभाष, परिवार का ख्याल रखना
बुधवार दोपहर जब चारों आरोपियों लाल सिंह, जोगेंद्र सिंह, सूर्यभान और सुभाष को सीबीआई कोर्ट में पेश किया गया तो उनके चेहरे पर उड़ती हवाइयां साफ नजर आ रही थीं। सभी को इस बात का भी गम था कि उनका एक भी साथी उनसे मिलने नहीं आया था।
सिर्फ परिवार के लोग ही कोर्ट में थे। कांस्टेबल सुभाष की हालत कोर्ट में आने के बाद से सबसे ज्यादा खराब थी। उसकी आंखों से छलकते आंसू भी साफ नजर आ रहे थे। केस का फैसला सुनने पहुंचे अपने बेटे से सुभाष ने सिर्फ इतना ही कहा कि ‘अब घर की जिम्मेदारी तुम पर है, परिवार का ख्याल रखना।’
अभियोजन और डिफेंस के अधिवक्ताओं ने दिए अपने-अपने तर्क
आरोपी पुलिसकर्मियों की सजा पर बहस करते हुए अभियोजन और बचाव पक्ष ने अपने-अपने तर्क कोर्ट के समक्ष पेश किए। अपनी करीब सात मिनट की बहस में अभियोजन की ओर से सीबीआई लोक अभियोजक राजन दहिया ने इसे हीनियस क्राइम बताते हुए कहा कि फर्जी एनकाउंटर का यह मामला विरल केसों में विरलतम की श्रेणी में आता है।
चार निर्दोष युवकों की इस निर्मम हत्या का सिर्फ एक ही मकसद था कि किसी तरह से प्रमोशन मिल जाए। ऐसे में पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा दी जाए। बचाव पक्ष के अधिवक्ता सुभाषचंद सक्सेना ने अपनी करीब दस मिनट की बहस में कोर्ट को बताया कि पुलिस को नहीं पता था कि उपरोक्त चारों युवक बदमाश हैं या नहीं।
जवाबी कार्रवाई और अपनी अभिरक्षा में पुलिस ने गोलियां चलाई थीं। इसके अलावा चारों पुलिसकर्मियों को कोई आउट ऑफ टर्न प्रमोशन नहीं मिला है। आरोपी कांस्टेबल सुभाष तो एनकाउंटर के समय अंडरट्रेनी था और अंडरट्रेनी को आउट ऑफ टर्न दिए जाने का कोई प्रावधान ही नहीं है। डिफेंस ने आरोपियों के बच्चों, परिवार की स्थिति और बीमारी को आधार बताते हुए कम से कम सजा दिए जाने की मांग कोर्ट से की।
‘फैसले से संतुष्ट...मगर फांसी की सजा न मिलने का है मलाल’
भोजपुर एनकाउंटर मामले में दोषी पुलिसकर्मियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने केबाद मृतकों के परिजन फैसले से संतुष्ट हैं। उनके चेहरे पर खुशी झलक रही थी।
हालांकि उनका कहना है कि उन्हें यह मलाल रहेगा कि आरोपी पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा नहीं हुई। उन्होंने इस दिन के लिए 20 साल तक लंबी लड़ाई लड़ी, अब जाकर उनके दिल की कसक निकली है।
मृतक अशोक की बुजुर्ग मां शीला और उसकी बहनों का कहना था कि उन्हें सुकून मिला है। उन्होंने घर-जमीन बेचकर यह लड़ाई लड़ी है। फैसले से उनका अदालत पर भरोसा और भी मजबूत हुआ है।
वहीं, दूसरे मृतक जलालुद्दीन की मां शरीफन और छोटे भाई आफताब का कहना था कि देरी से ही सही, लेकिन उन्हें इंसाफ मिला है। हालांकि वे चाहते थे कि दोषी पुलिसकर्मियों फांसी की सजा होती। इनके अलावा तीसरे मृतक जसवीर के भाई बीर सिंह और भतीजे अमित का कहना था कि उन्हें उम्मीद थी कि दोषी पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा होगी।
चौथे मृतक प्रवेश के पिता महेंद्र सिंह की आंखों से आंसू बह निकले। उनका कहना था यह खुशी केआंसू हैं। बेटा तो वापस नहीं आएगा, लेकिन उसे इंसाफ दिला पाए, इसका सुकून रहेगा। उन्होंने मीडिया का भी शुक्रिया अदा किया, जिसने पूरे मामले को प्रमुखता से उठाया।
दूसरी तरफ, कोर्ट के बाहर आरोपी पुलिसकर्मियों के परिजन भी आए हुए थे। सजा सुनाए जाने के बाद उनके चेहरे लटक गए और कई महिलाओं के आंसू भी निकल गए।
डासना जेल में बैरक नंबर सात में रखे गए दोषी पुलिसकर्मी
दोषी पुलिसकर्मियों को कड़ी सुरक्षा के बीच बुधवार शाम डासना जेल भेज दिया गया। जेल में उन्हें बैरक नंबर सात (मुलाहिजा बैरक) में रखा गया है। जेल अधीक्षक एसपी यादव ने बताया कि जल्द ही इनकेबैरक बदले जाएंगे। आरोपियों पुलिसकर्मियों ने खाने में दाल और रोटियां खाई हैं।