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शासन-प्रशासन को किसी बड़े हादसे का है इंतजार
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शासन-प्रशासन को किसी बड़े हादसे का है इंतजार
गाजियाबाद। एमएमजी अस्पताल परिसर स्थित सभी वार्ड में मौत के साये में मरीजों का इलाज हो रहा है। 10 दिन के अंदर फिर से एमडीआर वार्ड की छत की ईंट और प्लास्टर फिर गिर गई। रात 12.30 बजे यह हादसा हुआ और वार्ड में भर्ती तीन मरीज बाल-बाल बच गए। 30 मई को भी उसी वार्ड के छत की प्लास्टर और ईंटें टूटकर गिर गईं थीं। परिसर की इमारतों का निर्माण 1956 में हुआ और इसके ध्वस्तीकरण की मांग कई बार उठाई गई है।
रविवार को फिर से एमडीआर वार्ड की छत का प्लास्टर और ईंटें गिर गईं। वार्ड में तीन मरीज थे। 30 मई को भी वार्ड केएक हिस्से की छत का प्लास्टर गिर गया था। बेड पर प्लास्टर और ईटें गिरी थीं। उस बेड के मरीज को करीब दो घंटे पहले ही ़िडस्चार्ज किया गया था। एक तरफ जहां टीबी के मरीज काफी कमजोर होते हैं, ऐसे में किसी दिन बड़ा हादसा हुआ तो मरीज भाग भी नहीं पाएंगे। गौरतलब है कि पिछले दो साल से यह वार्ड बनकर तैयार था। इस वार्ड को सौंदर्यीकरण में भी आठ से 10 लाख का खर्च किया गया था। पहले यह वार्ड स्टॉफ के ना होने से इसे संचालित नहीं किया जा सका था। इस मामले में क्षय रोग अधिकारी जेपी श्रीवास्तव का कहना है कि पुराने भवन को ही जीर्णोद्धार करके काम चलाया जा रहा था। 2018 में भी पीडब्ल्यूडी को पत्र लिखा गया था, जिसमें भवन को जर्जर घोषित करके नई बिल्डिंग बनाने की मांग की थी। लगातार प्रशासन को पत्र लिखा जा रहा है। करीब एक माह पहले एमएमजी के दवा काउंटर की छत का प्लास्टर गिरा था। उसके बाद मंगलवार को पुराने महिला अस्पताल स्थित संक्रामक रोग विभाग की पैथोलॉजी का प्लास्टर गिरा और अब डीआरटीबी सेंटर की छत का प्लास्टर दूसरी बार गिरा है।
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गाजियाबाद। एमएमजी अस्पताल परिसर स्थित सभी वार्ड में मौत के साये में मरीजों का इलाज हो रहा है। 10 दिन के अंदर फिर से एमडीआर वार्ड की छत की ईंट और प्लास्टर फिर गिर गई। रात 12.30 बजे यह हादसा हुआ और वार्ड में भर्ती तीन मरीज बाल-बाल बच गए। 30 मई को भी उसी वार्ड के छत की प्लास्टर और ईंटें टूटकर गिर गईं थीं। परिसर की इमारतों का निर्माण 1956 में हुआ और इसके ध्वस्तीकरण की मांग कई बार उठाई गई है।
रविवार को फिर से एमडीआर वार्ड की छत का प्लास्टर और ईंटें गिर गईं। वार्ड में तीन मरीज थे। 30 मई को भी वार्ड केएक हिस्से की छत का प्लास्टर गिर गया था। बेड पर प्लास्टर और ईटें गिरी थीं। उस बेड के मरीज को करीब दो घंटे पहले ही ़िडस्चार्ज किया गया था। एक तरफ जहां टीबी के मरीज काफी कमजोर होते हैं, ऐसे में किसी दिन बड़ा हादसा हुआ तो मरीज भाग भी नहीं पाएंगे। गौरतलब है कि पिछले दो साल से यह वार्ड बनकर तैयार था। इस वार्ड को सौंदर्यीकरण में भी आठ से 10 लाख का खर्च किया गया था। पहले यह वार्ड स्टॉफ के ना होने से इसे संचालित नहीं किया जा सका था। इस मामले में क्षय रोग अधिकारी जेपी श्रीवास्तव का कहना है कि पुराने भवन को ही जीर्णोद्धार करके काम चलाया जा रहा था। 2018 में भी पीडब्ल्यूडी को पत्र लिखा गया था, जिसमें भवन को जर्जर घोषित करके नई बिल्डिंग बनाने की मांग की थी। लगातार प्रशासन को पत्र लिखा जा रहा है। करीब एक माह पहले एमएमजी के दवा काउंटर की छत का प्लास्टर गिरा था। उसके बाद मंगलवार को पुराने महिला अस्पताल स्थित संक्रामक रोग विभाग की पैथोलॉजी का प्लास्टर गिरा और अब डीआरटीबी सेंटर की छत का प्लास्टर दूसरी बार गिरा है।
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