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Ghaziabad News: हालात ने छीना मां का आंचल, यशोदा बनीं नर्स और आया
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- रेलवे ट्रैक पर जन्म हुआ, चार दिन बाद मां छोड़कर चली गई, 55 दिनों से जिला अस्पताल की नर्सरी में पल रही मासूम
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राजू मलिक
गाजियाबाद। दुनिया में आते ही जिस बच्ची को मां की गोद मिलनी चाहिए थी, उसके हिस्से में हालात ने अकेलापन लिख दिया। रेलवे ट्रैक के किनारे जन्मी मासूम ने चार दिन मां का आंचल देखा और फिर वह भी छूट गया। पिता की पहचान उसे मिली ही नहीं। इसके बाद 55 दिनों से जिला अस्पताल की नर्सरी ही उसकी दुनिया है। यहां नर्स और आया उसे गोद में उठाती हैं, दूध पिलाती हैं, दुलारती हैं और उसकी हर जरूरत का ख्याल रखती हैं। मां का साया भले ही छिन गया, लेकिन इन हाथों में उसे कुछ देर के लिए वही ममता मिल जाती है, जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है।
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रेलवे ट्रैक के किनारे शुरू हुई जिंदगी
16 अगस्त 2026 को पुराने रेलवे स्टेशन के पास मानसिक रूप से बीमार 32 वर्षीय महिला ने बच्ची को जन्म दिया। वह स्टेशन के आसपास यात्रियों से भिक्षा मांगकर पेट भरती थी। जीवन की मुश्किलों के बीच वह कथित तौर पर शोषण का शिकार हुई और गर्भवती हो गई। प्रसव के बाद कई घंटे तक मां और नवजात गंदगी के बीच पड़े रहे। आसपास के लोगों की नजर पड़ी तो दोनों को जिला महिला अस्पताल पहुंचाया गया।अस्पताल में मां की मौजूदगी बच्ची के लिए महज चार दिन की रही। इसके बाद मां उसे अस्पताल में छोड़कर चली गई और फिर नहीं लौटी। उस दिन से नन्ही देविका (काल्पनिक नाम) की जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ। मां की गोद की जगह अस्पताल की नर्सरी ने ले ली।
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नर्स को देखते ही खिलखिला उठती है
देविका अब नर्सरी के चेहरों को पहचानने लगी है। दूध पिलाने वाली नर्स को देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है। कोई उसे गोद में उठाता है तो वह हाथ-पैर चलाकर खिलखिलाने लगती है। कभी किसी की अंगुली पकड़ लेती है तो कभी गोद में सिर रखकर कुछ देर शांत पड़ी रहती है। उसे अभी यह मालूम नहीं कि मां क्या होती है और पिता कौन। वह तो बस उस स्पर्श को पहचानती है, जिसमें उसे अपनापन मिलता है। नर्स और आया के लिए भी वह अब सिर्फ नर्सरी में भर्ती एक बच्ची नहीं रह गई है। उसकी मुस्कान उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई है।
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अस्पताल ने संभाला, अब भेजा जाएगा अनाथ आश्रम
देविका स्वस्थ है और अस्पताल के स्टाफ की देखरेख में है। हालांकि, अस्पताल चाहे जितनी ममता दे, वह किसी बच्चे का घर नहीं हो सकता। सीएमएस प्रताप सिंह ने बताया कि बच्ची के पुनर्वास और उचित देखरेख के लिए अस्पताल की ओर से जिला प्रोबेशन अधिकारी को दो बार पत्र लिखा जा चुका है। वहीं, सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष जीपी भद्रदास ने बताया कि सीएमएस का पत्र मिलने के बाद समिति ने बच्ची को अनाथ आश्रम भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
(संवाद)
राजू मलिक
गाजियाबाद। दुनिया में आते ही जिस बच्ची को मां की गोद मिलनी चाहिए थी, उसके हिस्से में हालात ने अकेलापन लिख दिया। रेलवे ट्रैक के किनारे जन्मी मासूम ने चार दिन मां का आंचल देखा और फिर वह भी छूट गया। पिता की पहचान उसे मिली ही नहीं। इसके बाद 55 दिनों से जिला अस्पताल की नर्सरी ही उसकी दुनिया है। यहां नर्स और आया उसे गोद में उठाती हैं, दूध पिलाती हैं, दुलारती हैं और उसकी हर जरूरत का ख्याल रखती हैं। मां का साया भले ही छिन गया, लेकिन इन हाथों में उसे कुछ देर के लिए वही ममता मिल जाती है, जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है।
रेलवे ट्रैक के किनारे शुरू हुई जिंदगी
16 अगस्त 2026 को पुराने रेलवे स्टेशन के पास मानसिक रूप से बीमार 32 वर्षीय महिला ने बच्ची को जन्म दिया। वह स्टेशन के आसपास यात्रियों से भिक्षा मांगकर पेट भरती थी। जीवन की मुश्किलों के बीच वह कथित तौर पर शोषण का शिकार हुई और गर्भवती हो गई। प्रसव के बाद कई घंटे तक मां और नवजात गंदगी के बीच पड़े रहे। आसपास के लोगों की नजर पड़ी तो दोनों को जिला महिला अस्पताल पहुंचाया गया।अस्पताल में मां की मौजूदगी बच्ची के लिए महज चार दिन की रही। इसके बाद मां उसे अस्पताल में छोड़कर चली गई और फिर नहीं लौटी। उस दिन से नन्ही देविका (काल्पनिक नाम) की जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ। मां की गोद की जगह अस्पताल की नर्सरी ने ले ली।
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नर्स को देखते ही खिलखिला उठती है
देविका अब नर्सरी के चेहरों को पहचानने लगी है। दूध पिलाने वाली नर्स को देखते ही उसके चेहरे पर मुस्कान तैर जाती है। कोई उसे गोद में उठाता है तो वह हाथ-पैर चलाकर खिलखिलाने लगती है। कभी किसी की अंगुली पकड़ लेती है तो कभी गोद में सिर रखकर कुछ देर शांत पड़ी रहती है। उसे अभी यह मालूम नहीं कि मां क्या होती है और पिता कौन। वह तो बस उस स्पर्श को पहचानती है, जिसमें उसे अपनापन मिलता है। नर्स और आया के लिए भी वह अब सिर्फ नर्सरी में भर्ती एक बच्ची नहीं रह गई है। उसकी मुस्कान उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गई है।
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अस्पताल ने संभाला, अब भेजा जाएगा अनाथ आश्रम
देविका स्वस्थ है और अस्पताल के स्टाफ की देखरेख में है। हालांकि, अस्पताल चाहे जितनी ममता दे, वह किसी बच्चे का घर नहीं हो सकता। सीएमएस प्रताप सिंह ने बताया कि बच्ची के पुनर्वास और उचित देखरेख के लिए अस्पताल की ओर से जिला प्रोबेशन अधिकारी को दो बार पत्र लिखा जा चुका है। वहीं, सीडब्ल्यूसी अध्यक्ष जीपी भद्रदास ने बताया कि सीएमएस का पत्र मिलने के बाद समिति ने बच्ची को अनाथ आश्रम भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
(संवाद)