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Ghaziabad News: कचहरी में इंसान और बेजुबान के बीच दोस्ती की अनोखी मिसाल
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गाजियाबाद। कचहरी में हर दिन कानून की किताबों के पन्ने खुलते हैं, मुकदमों पर बहस होती है और इंसाफ की उम्मीद में लोग पहुंचते हैं। इसी परिसर में इंसान और एक बेजुबान के बीच ऐसा रिश्ता भी कायम है, जो बिना किसी भाषा के सात साल से चल रहा है। अधिवक्ता महेश यादव और बंदर के बीच की यह दोस्ती अब कचहरी आने वाले लोगों के लिए भी खास नजारा बन गई है। बंदर रोजाना उनके चैंबर के आसपास पहुंचता है और महेश यादव भी अपने इस बेजुबान दोस्त के लिए रोटी रखना नहीं भूलते।
करीब 30 वर्षों से वकालत कर रहे महेश यादव पूर्व में सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता रह चुके हैं। वर्तमान में वह परिवार परामर्श मध्यस्थता केंद्र में दंपतियों के बीच चल रहे मनमुटाव को दूर कराने में भी भूमिका निभाते हैं। व्यस्त दिनचर्या के बीच भी वह चैंबर पर आने वाले अपने इस बेजुबान मेहमान के लिए वक्त निकाल लेते हैं।
बंदर के चैंबर में पहुंचते ही महेश यादव को उसके आने का अंदाजा हो जाता है। कभी वह मेज पर बैठकर रोटी का इंतजार करता है तो कभी उनकी जेब तक पहुंचकर खुद रोटी निकालने की कोशिश करता है। महेश यादव उसे डांटने के बजाय प्यार से रोटी देते हैं। रोटी मिलते ही बंदर उसे लेकर चला जाता है और कुछ देर बाद फिर चैंबर के आसपास दिखाई देने लगता है।
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दोनों के बीच लगाव इतना बढ़ गया है कि जिस दिन महेश यादव कचहरी नहीं पहुंचते, बंदर उनके चैंबर के आसपास मंडराता रहता है। अगले दिन अधिवक्ता के पहुंचते ही वह फिर उनके पास आकर बैठ जाता है। महेश यादव भी उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हैं और उसे रोटी खिलाते हैं।
कचहरी में आने-जाने वाले अधिवक्ताओं और वादकारियों के लिए अब यह नजारा अनजाना नहीं है। मुकदमों की बहस और तनाव के बीच इंसान और अबोध पशु के बीच स्नेह का यह रिश्ता लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला देता है। महेश यादव कहते हैं कि पशु बोल नहीं सकते, लेकिन उनके व्यवहार से उनकी भावनाओं को समझा जा सकता है। उनके और बंदर के बीच वर्षों से बना यह रिश्ता पशुओं के प्रति संवेदना और इंसानियत की मिसाल है।
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करीब 30 वर्षों से वकालत कर रहे महेश यादव पूर्व में सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता रह चुके हैं। वर्तमान में वह परिवार परामर्श मध्यस्थता केंद्र में दंपतियों के बीच चल रहे मनमुटाव को दूर कराने में भी भूमिका निभाते हैं। व्यस्त दिनचर्या के बीच भी वह चैंबर पर आने वाले अपने इस बेजुबान मेहमान के लिए वक्त निकाल लेते हैं।
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बंदर के चैंबर में पहुंचते ही महेश यादव को उसके आने का अंदाजा हो जाता है। कभी वह मेज पर बैठकर रोटी का इंतजार करता है तो कभी उनकी जेब तक पहुंचकर खुद रोटी निकालने की कोशिश करता है। महेश यादव उसे डांटने के बजाय प्यार से रोटी देते हैं। रोटी मिलते ही बंदर उसे लेकर चला जाता है और कुछ देर बाद फिर चैंबर के आसपास दिखाई देने लगता है।
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दोनों के बीच लगाव इतना बढ़ गया है कि जिस दिन महेश यादव कचहरी नहीं पहुंचते, बंदर उनके चैंबर के आसपास मंडराता रहता है। अगले दिन अधिवक्ता के पहुंचते ही वह फिर उनके पास आकर बैठ जाता है। महेश यादव भी उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हैं और उसे रोटी खिलाते हैं।
कचहरी में आने-जाने वाले अधिवक्ताओं और वादकारियों के लिए अब यह नजारा अनजाना नहीं है। मुकदमों की बहस और तनाव के बीच इंसान और अबोध पशु के बीच स्नेह का यह रिश्ता लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला देता है। महेश यादव कहते हैं कि पशु बोल नहीं सकते, लेकिन उनके व्यवहार से उनकी भावनाओं को समझा जा सकता है। उनके और बंदर के बीच वर्षों से बना यह रिश्ता पशुओं के प्रति संवेदना और इंसानियत की मिसाल है।