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Ghaziabad : सवालों में सीबीआई- 10 साल में कोर्ट से छूट गए 30 फीसदी अपराधी, निठारी कांड से फिर उठे प्रश्न

Sat, 21 Oct 2023 06:33 AM IST
दुष्यंत शर्मा आशुतोष यादव, गाजियाबाद
आशुतोष यादव, गाजियाबाद Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Sat, 21 Oct 2023 06:33 AM IST
सार

यह अकेला मामला नहीं है, बल्कि पिछले 10 वर्षों में सीबीआई की चार अलग-अलग अदालतों में 146 केसों का निस्तारण हुआ, इनमें से 30 फीसदी आरोपियों को संदेह का लाभ मिला और आरोपों से बरी हो गए। 

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Ghaziabad : 30 percent criminals were released from CBI court in 10 years
सीबीआई (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : ANI

विस्तार

सीबीआई कोर्ट से सजा-ए-मौत की सजा सुनाए जाने के बाद हाईकोर्ट ने साक्ष्यों के अभाव में हत्या के मामले में सुरेंद्र कोली और मोनिंदर सिंह पंढेर को बरी कर दिया। यह अकेला मामला नहीं है, बल्कि पिछले 10 वर्षों में सीबीआई की चार अलग-अलग अदालतों में 146 केसों का निस्तारण हुआ, इनमें से 30 फीसदी आरोपियों को संदेह का लाभ मिला और आरोपों से बरी हो गए। 

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पूर्व जिला शासकीय अधिवक्ता सुरेश यादव का कहना है कि अपराध से जुड़े किसी भी केस का आधार सीबीआई का साक्ष्य संग्रह है। अदालत सबूत के आधार पर निर्णय देती है। साक्ष्य नहीं होने पर कई गंभीर अपराधों में भी मुजरिम छूट जाते हैं। 
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मुकदमों की लंबी सुनवाई से मुकर जाते हैं गवाह
सीबीआई मामलों की पैरवी करने वाले अधिवक्ता राजकुमार चौहान का कहना है कि कई बार मुकदमा दर्ज होने पर मौके पर प्रत्यक्षदर्शी गवाह बन जाते हैं, लेकिन लंबे समय तक सुनवाई चलने और अदालत के चक्कर काटने से बचने के लिए गवाह पूर्व में दिए बयान से मुकर जाते हैं, इसका लाभ आरोपी को मिल जाता है।
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13 साल में 13 बार सुरेंद्र कोली को सुनाई गई सजा-ए-मौत 
निठारी कांड में जनवरी 2007 को सीबीआई ने अपने हाथ में लेते हुए जांच पूरी की थी। सुनवाई पूरी होने के बाद तत्कालीन सीबीआई जज रमा जैन ने पहली 13 फरवरी 2009 को सुरेंद्र कोली और मोनिंदर पंढेर को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई थी। 13 साल में 13 मामलों में सुरेंद्र कोली को सजा-ए-मौत की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जांच किए बिना एक गरीब नौकर को खलनायक की तरह पेश कर उसे फंसाने का आसान तरीका चुना है। साक्ष्यों का अभाव मानते हुए सुरेंद्र कोली को 12 मामलों में बरी कर दिया। वहीं मोनिंदर पंढेर को भी बेगुनाह साबित कर दिया।


जांच अक्षम अधिकारी से कराने पर आरोपी बरी
अलीगढ़ में एक शिक्षण संस्थान के मान्यता की जांच सीबीआई ने अक्षम अधिकारी से कराई। अदालत ने जांच और सीबीआई की पूरी कार्रवाई अवैध मानते आरोपियों को दोष मुक्त कर दिया था। 2010 में राजेंद्र सिंह मेमोरियल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्निकल एंड रिसर्च मथुरा रोड के प्रबंधक समिति से साठगांठ करके मान्यता देने में अनियमितता का आरोप लगा था। सीबीआई ने जांच के बाद बताया था कि विशेषज्ञ समिति एआईसीटीसी ने जांच के दौरान अनियमितता की। सीबीआई की जांच में पता चला कि जिस खसरा नंबर पर संस्थान का भवन दिखाया गया था, वह कृषि भूमि थी और तहसीलदार ने कोई प्रमाण पत्र भी जारी नहीं किया था। 

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