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दिल्ली सरकार के चार वर्ष: प्रदूषण नियंत्रण बना सियासत का नया हथियार

Thu, 14 Feb 2019 06:24 AM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Priyesh Mishra Updated Thu, 14 Feb 2019 06:24 AM IST
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Four years of Delhi Government, pollution control become New weapon of politics
अरविंद केजरीवाल - फोटो : अमर उजाला
राष्ट्रीय राजधानी की आबोहवा ठीक करने के लिए दिल्ली सरकार ने कई घोषणाएं कीं और योजनाएं लागू भी हुईं। इनका स्वागत भी खूब हुआ, लेकिन ज्यादातर योजनाएं चार वर्ष बाद भी जमीन पर आकार नहीं ले सकी हैं। प्रदूषण पर रोकथाम में नाकामी के लिए दिल्ली सरकार को सुप्रीम कोर्ट से लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का कोपभाजन बनना पड़ा। इन चार वर्षों में प्रदूषण जैसा गंभीर विषय सिसायत का नया हथियार बन गया है।
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2016 के नवंबर माह में दीवाली के दौरान पहली बार दिल्ली में प्रदूषण आपात स्तर पर रिकॉर्ड हुआ। धुएं और धुंध वाले भयावह प्रदूषण के दौरान निर्माण गतिविधियों से लेकर भारी वाहनों के दिल्ली में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा, लेकिन सम-विषम लागू नहीं किया गया। इसे लेकर आलोचना हुई और दिल्ली सरकार ने इस प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए केंद्रीय मदद न मिलने का आरोप लगा दिया।
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ग्रीन बफर जोन निर्मित करने और ट्रैफिक प्रदूषण कम करने के लिए यातायात सुगमता बढ़ाने और नदियों में प्रदूषण रोकने की परियोजनाओं पर अब तक कोई ठोस काम नहीं हो पाया है। आपात वायु प्रदूषण के दौरान दिल्ली सरकार ने 1 जनवरी, 2016 को पहली बार सम-विषम लागू किया।
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पहली बार के 15 दिन में प्रदूषण के आंकड़ों में सुधार आया। दूसरी बार इसे 15 अप्रैल से लागू किया गया। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने अपनी रिपोर्ट में इन दोनों के प्रभाव का विश्लेषण कर कहा था कि यह कदम सिर्फ आपात प्रदूषण के समय उठाया जाना चाहिए। दूसरी बार लागू किए गए सम-विषम से प्रदूषण पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा।

नहीं हट पाए विलायती कीकर
दिल्ली के भूजल को सोखने आपात और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक विलायती कीकर को हटाने की घोषणा 2017-18 के बजट में की गई। इसके बाद भी विलायती कीकर हटाने का काम बेहद धीमा है। इस काम की शुरुआत बीते वर्ष सेंट्रल रिज में हुई। इसके लिए 12 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।

लंबे समय की मांग और एनजीटी की फटकार के बाद दिल्ली सरकार ने बीते वर्ष पहली बार खतरनाक चीनी मांझे पर प्रतिबंध लगाया। पहली बार स्वच्छ ईंधन अपनाने के लिए अधिसूचना जारी की। इसमें सभी औद्योगिक इकाइयों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को वायु प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन के इस्तेमाल से रोकने का प्रावधान किया गया।

वित्त वर्ष 2018-19 मेें एक दिन में 643 स्थानों पर पांच लाख पौधे लगाने का मेगा अभियान चलाया गया। सितंबर महीने में ही पर्यावरण मंत्री इमरान हुसैन ने कई स्थानों पर पौधों के मुरझाने या गिर जाने की शिकायत पर देखभाल के लिए आदेश जारी किया। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने अपनी रिपोर्ट में 2014 से 2017 के बीच दिल्ली में 28.12 लाख पौधरोपण के दावों पर सवालिया निशान लगाया।

विवाद भी नहीं रहे कम

2016 में आर्ट ऑफ लिविंग (एओएल) के वैश्विक सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए यमुना डूब क्षेत्र में दिल्ली सरकार के प्राधिकरणों की मंजूरी को लेकर कई सवाल उठे। एनजीटी ने दिल्ली सरकार को इसके लिए कड़ी फटकार लगाई और कुछ प्राधिकरणों पर जुर्माना भी लगाया। 2017 के नवंबर-दिसंबर में चरम प्रदूषण के दौरान आसमान से पानी छिड़काव के मामले में दिल्ली सरकार ने हेलीकॉप्टर के लिए केंद्र को चिट्ठी लिखी।

इस मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच आरोप-प्रत्यारोप चले। समय से सम-विषम लागू नहीं करने के लिए भी आरोप-प्रत्यारोप चले। 2018 में दक्षिणी दिल्ली की सात सरकारी कॉलोनियों के पुनर्विकास मामले में भी दिल्ली सरकार घेरे में आई। करीब 16 हजार पेड़ काटने के लिए दी गई वन मंजूरी पर सियासत खूब गरमाई। वन विभाग की मंजूरी और राज्यपाल की अनुशंसा के बीच नोक-झोंक होती रही। बाद में दिल्ली सरकार ने इन मंजूरियों को निरस्त करने का आदेश दिया।

स्टील पिकलिंग यूनिटों से होने वाले वायु और जल प्रदूषण की रोकथाम में विफल रहने पर एनजीटी ने बीते वर्ष पहली बार दिल्ली सरकार पर अब तक का सबसे बड़ा 50 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। दिल्ली सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। एनजीटी ने ध्वनि प्रदूषण रोकने में विफल रहने के लिए पांच लाख का जुर्माना लगाया।

गंभीर नहीं अधिकारी और प्राधिकरण
दिल्ली सरकार की घोषणाओं को पूरा करने के लिए अधिकारी और प्राधिकरण गंभीर नहीं हैं। मसलन, गैरसरकारी संस्था ऊर्जा की ओर से बीते वर्ष सूचना के अधिकार के तहत मिले जवाब में कहा गया था कि वायु प्रदूषण से निपटने के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रैप) को लागू करने में वे रुचि नहीं दिखा रहे हैं। कुल 18 ग्रैप मीटिंग में लोक निर्माण विभाग, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन और संबंधित बिजली वितरण कंपनियों ने सिर्फ एक बैठक में हिस्सेदारी की। कुल 12 एजेंसियों में से 7 की हाजिरी 9 बैठक से भी कम रही। हरित अदालत ने भी प्राधिकरणों की लापरवाही और कामकाज पर कई बार सवाल उठाए।
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