Delhi: एक विद्यालय ऐसा भी जहां हर बच्चा है 'राम', 27 वर्षों से बच्चे निभा रहे राम, सीता और लक्ष्मण के किरदार
स्कूल के निदेशक योगेश बताते हैं कि मौजूदा दौर में जहां बच्चे हॉलीवुड के सुपरहीरोज को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। वहीं, दूसरी तरफ यह बच्चे रामलीला के पात्रों को असल जिंदगी में जी रहे है। ये छात्र रामायण के किरदारों को इस तरह निभाते हैं, कि वह कुछ समय के लिए खुद को ही भूल जाते हैं।
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जहां एक ओर युवाओं में धार्मिक मान्यताएं धीरे-धीरे मिथक बनकर सिमट रही हैं, वहीं पूर्वी दिल्ली का एक निजी स्कूल इन परंपराओं को नई पीढ़ी में जिंदा रखने की मिसाल बन गया है। यहां सुबह बच्चों की कक्षाओं में गणित और विज्ञान गूंजता है तो शाम ढलते ही वही बच्चे राम, सीता और लक्ष्मण बनकर मंच पर उतर आते हैं। 27 वर्षों से जारी इस अनोखी परंपरा में इस बार 415 बच्चे अलग-अलग किरदार निभाते नजर आएंगे। खास बात यह है कि रोजाना 1008 परिवार रामायण का पाठ कर इन लीलाओं को और भी भव्य बना देते हैं।
स्कूल के निदेशक योगेश बताते हैं कि मौजूदा दौर में जहां बच्चे हॉलीवुड के सुपरहीरोज को अपना प्रेरणास्रोत मानते हैं। वहीं, दूसरी तरफ यह बच्चे रामलीला के पात्रों को असल जिंदगी में जी रहे है। ये छात्र रामायण के किरदारों को इस तरह निभाते हैं, कि वह कुछ समय के लिए खुद को ही भूल जाते हैं। वहीं, इस रामलीला का मंचन देखने और इनके संवादों को सुनने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से विद्यालय में पहुंचते हैं। इन नन्हें किरदारों को देखकर लगता है कि श्रीराम, लक्ष्मण अपने बचपन के स्वरूप में ही रामलीला में उपस्थित हुए हैं।
उन्होंने बताया कि इन नन्हें कलाकारों की रामलीला बहुत मन मोहने वाली है। यह बच्चे रामलीला के दौरान स्कूल में ही रहते हैं। यहां तक की शाकाहारी भोजन का सेवन करते हैं। खास बात यह है कि इनकी दिनचर्या सुबह से ही शुरू हो जाती है। वहीं, यह बच्चे मंचन के दौरान मोबाइल फोन से दूरी बनाकर रखते हैं।
नर्सरी के बच्चे बताते है लीला का महत्व...
प्री-नर्सरी से लेकर नौवीं कक्षा के बच्चे अलग किरदार में नजर आते हैं। रामलीला की शुरूआत शाम 6 बजे से होती है। मंच पर अलग-अलग लीलाओं का मंचन किया जाता है। मंचन के दौरान जो भी दृश्य दिखाए जाते हैं, उसके बाद पहली और दूसरी क्लास पढ़ने वाले बच्चे संदेश देते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि मंच पर भगवान राम सबरी के झूठे बेर खाते हैं तो बच्चा बताता है कि भगवान राम छुआछूत, जात-पात को नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने सबरी के झूठे बेर खाए। हम सबको भी अपने जीवन में इसे अपनाना चाहिए। साथ ही रामलीला प्रांगण में हर सुबह छह बजे से 8.30 बजे तक 1008 परिवार एक साथ बैठकर रामचरित मानस का पाठ करते हैं।
415 बच्चे कर रहे मंचन
यहां एक दो बच्चे नहीं, बल्कि 415 बच्चे रामलीला में हिस्सा ले रहे हैं। खास बात यह है कि नन्हें कलाकार कुछ समय के लिए अपने रोल में इस तरह से डूब जाते हैं कि सब देखते रह जाते हैं। इनकी संवाद करने की अदा पर शानदार पकड़ है। दर्शकों को लगता ही नहीं कि ये कलाकार हैं।