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अधिकारी पहुंचे लेकिन राहत नहीं: बाढ़ क्षेत्र से निकाले गए लोगों की दास्तां, आसमान में रात गुजारने को मजबूर

Fri, 14 Jul 2023 08:05 PM IST
Digvijay Singh अमर उजाला ब्यूरो, दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, दिल्ली Published by: Digvijay Singh Updated Fri, 14 Jul 2023 08:05 PM IST
सार

जगतपुर व वजीराबाद गांव के पास पुश्तों में आई बाढ़ से करीब 350 लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। यहां न तो प्रशासन की ओर से राहत शिविर बनाए गए हैं और न ही किसी तरह की खाने-पीने की कोई व्यवस्था है। 

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Food and drink crisis in front people evacuated flood area in Delhi
दिल्ली में बाढ़ का पानी - फोटो : एएनआई-फाइल फोटो

विस्तार

राजधानी दिल्ली में बाढ़ आने के तीन दिन बाद अधिकारी आए और राहत पहुंचाने की बात कहकर चले गए। तब से अभी तक राहत मिलने की उम्मीद में दिन-रात काट रहे हैं। यह कहना है जगतपुर गांव के पास पुश्ते में रहने वाली रामवती का। वह कहती हैं कि बाढ़ में घर का सारा सामान डूब गया है। यहां तक कि बर्तन भी नहीं बचे हैं। वह रोते हुए कहती हैं कि अब यह नौबत आ गई है कि लोगों से खाना मांगकर काम चलाना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि वह तो भूखे पेट पानी पीकर काम चला रही हैं, लेकिन बच्चे भूख से रो रहे हैं। प्रशासन केवल दावे कर रहा है, लेकिन जमीन पर राहत नहीं मिल रही है।

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जगतपुर व वजीराबाद गांव के पास पुश्तों में आई बाढ़ से करीब 350 लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। यहां न तो प्रशासन की ओर से राहत शिविर बनाए गए हैं और न ही किसी तरह की खाने-पीने की कोई व्यवस्था है। बाढ़ प्रभावित लोग खुद ही तिरपाल लगाकर व कई लोग खुले आसमान में रात काटने को मजबूर हैं। सबसे अधिक परेशानी छोटे बच्चों को हो रही है। कुछ लोगों ने गांवों के पास सड़क किनारे तिरपाल से सर ढकने की जगह बनाई है। जहां चारों ओर गंदगी फैली हुई है। इससे बदबू व मच्छर पनप रहे हैं। रात को स्थिति और खराब हो जाती है, क्योंकि यहां लाइट की व्यवस्था नहीं है। यहां सांप आने का डर बना रहता है।


 
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वजीराबाद गांव के पास तिरपाल लगाकर रह रही सुनीता बताती हैं कि उनके साथ छोटे-छोटे तीन बच्चे हैं। खेतों में काम करते थे तो पैसा मिलता था, पर अब वह काम भी बंद हो गया है। ऐसे में समझ नहीं आ रहा है कि कहां जाएं। वह कहती हैं कि कुछ कॉलोनी के लोगों ने खाना दिया है, लेकिन वह सबके लिए पर्याप्त नहीं है। सरकार को यहां मदद पहुंचानी चाहिए। वहीं, वजीराबाद गांव के पास महाकाल घाट के गणेश दास बताते हैं कि पहले सरकार बाढ़ आने से पहले ही राहत शिविर तैयार कर देती थी, लेकिन इस बार यहां कुछ भी मदद नहीं पहुंचाई जा रही है।

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महिलाओं को हो रही अधिक परेशानी

इन गांवों के पास अस्थाई रूप से तिरपाल लगाकर रह रही महिलाओं को सबसे अधिक परेशानी हो रही है। यहां कोई शौचालय की व्यवस्था नहीं है, जिससे महिलाओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। वजीराबाद गांव के पास राम घाट में रहने वाली सीमा बताती हैं कि लोगों ने वजीराबाद गांव के बरात घर में शरण ली है। वहां न तो पंखा है और न ही लाइट। कभी भी कोई बड़ी घटना घट सकती है। वहीं, तीन माह पहले बुलंदशहर से वजीराबाद पुश्ते में रहने आई रीना कहती हैं कि उनके सारे सपने बाढ़ में बह गए। कोई ऐसा सामान नहीं है, जो बचा हो। वह बताती हैं कि उन्हें बरात घर में भी जगह नहीं मिल पाई है, जिससे खुले आसमान में रात गुजारनी पड़ रही है। वह कहती हैं कि अभी तो बारिश नहीं हो रही है, अगर बारिश आई तो परेशानी और बढ़ जाएगी।

सोने के लिए बिस्तर नहीं, कीड़े कर रहे परेशान

बाढ़ राहत शिविरों में लोगों के सिर पर टेंट की छाया है, लेकिन सड़क पर बिना बिस्तर के रात बितानी पड़ रही है। यमुना किनारे रात भर मच्छरों के काटने से लोगों को नींद नहीं आती। शिविरों के अंदर एलईडी लाइट लगाई गई है, शाम होते ही इनके कारण इतने कीड़े आ जाते हैं कि इनमें बैठना मुश्किल रहता है। मयूर विहार फेज-1 मेट्रो स्टेशन के पास बने राहत शिविर में लोगों ने बताया कि रात को सोते समय शरीर के नीचे कीड़े दबने से कई लोगों के बदन पर फफोले पड़ रहे हैं।


 

20 अतिरिक्त मोबाइल शौचालय लगाए गए

लोगों की सुविधा के लिए 20 अतिरिक्त मोबाइल शौचालय शुक्रवार को लगाए गए हैं। प्रशासन की तरफ से जानकारी दी गई कि डूसिब से लगातार संपर्क किया जा रहा था, जैसे ही पर्याप्त संख्या में शौचालय मिले, तुरंत इन्हें लगा दिया गया। शिविर में लोगों से सफाई व्यवस्था बनाए रखने की अपील की गई है और शौचालय का उपयोग करने के लिए कहा गया है।

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