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हिरासत में युवक की मौत पर यूपी पुलिस के पांच पुलिसकर्मी दोषी करार

Tue, 19 Mar 2019 06:17 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Tue, 19 Mar 2019 06:17 AM IST
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five up policeman found guilty in case of cutodial death
यूपी पुलिस फाइल फोटो
अदालत ने पुलिस हिरासत में 26 वर्षीय युवक की मौत मामले में बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) पुलिस के पांच पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया है। साथ ही अदालत ने जांच से जुड़े साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की पुलिस की प्रवृति पर भी कड़ी टिप्पणी की है। मामला खुर्जा के गांव हजरतपुर का है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दिल्ली की तीस हजारी अदालत में मामले की सुनवाई हुई।
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अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संजीव कुमार मल्होत्रा ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पुलिस समझती है कि उसे सबूतों से छेड़छाड़ करने का अधिकार है और उसे जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा। अदालत ने कहा, हिरासत में युवक की मौत की एक वजह यह थी कि पुलिस को पूरा यकीन था कि हिरासत में मौत हो जाने और सच का पता चल जाने पर भी उसे जवाबदेह नहीं ठहराया जाएगा। 
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मामले में गंभीर रुख अपनाते हुए अदालत ने उत्तर प्रदेश पुलिस के सब इंस्पेक्टर हिंदवीर सिंह और महेश मिश्रा, कांस्टेबल प्रदीप, पुष्पेंद्र और हरिपाल सिंह को पीड़ित सोनू (26) के अपहरण, साक्ष्य के बाबत गुमराह करने के लिए जनरल डायरी में गलत प्रविष्टि करने, यातनाएं देने और यातनाओं से युवक की मौत होने के लिए दोषी ठहराया है। इन पुलिस कर्मियों पर हत्या के आरोप में भी मुकदमा चल चुका है। 
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स्टेशन अफसर और जीडी राइटर पर भी कार्रवाई
दोषी पुलिसकर्मियों ने वर्ष 2006 में सोनू को लूटपाट के एक केस में संदिग्ध समझकर पकड़ा था। मामले में अदालत ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी को निर्देश दिया कि वह इंस्पेक्टर दीपक चतुर्वेदी और कांस्टेबल मनोज कुमार के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए उचित कदम उठाएं। दीपक और मनोज घटना के दिन स्टेशन अफसर और जीडी राइटर के तौर पर तैनात थे। उन पर आरोप है कि उन्होंने आरोपियों से मिलीभगत कर जीडी रजिस्टर में गलत प्रविष्टि दर्ज करके और साक्ष्य गायब करके मामले की जांच को गुमराह करने की कोशिश की थी।


यूपी की अदालत से सुनवाई हुई थी दिल्ली स्थानांतरित 
उच्चतम न्यायालय द्वारा इस मामले की सुनवाई उत्तर प्रदेश की एक अदालत से दिल्ली की अदालत में स्थानांतरित की गई थी। इस मुद्दे पर शीर्ष अदालत ने कहा था कि केस दर्ज होने के बाद जिस तरह से छानबीन की गई है, उससे साफ पता चलता है कि राज्य में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष सुनवाई संभव नहीं है, क्योंकि आरोपी पुलिस बल के सदस्य हैं। 
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