मौत का मकान: एमसीडी की लापरवाही लील गई 7 जिंदगियां, निगम ने झाड़ा पल्ला
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एमसीडी ने समय पर कार्रवाई की होती तो शायद आज 7 लोगों को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ता। स्थानीय लोगों का कहना है कि हादसे के लिए एमसीडी की लापरवाही ही जिम्मेदार है। दरअसल, 20 साल पहले ग्राउंड और फर्स्ट फ्लोर बनी इस इमारत की छत बिल्डर धर्मेंद्र और सचिन ने खरीदी थी। करीब तीन साल पहले उस पर तीन और मंजिलें बना
दी गईं। नतीजा यह हुआ कि बिल्डिंग एक ओर झुकने लगी। पिछले एक साल से इमारत एक फुट से अधिक एक ओर झुक गई थी। ग्राउंड फ्लोर पर दुकान चलाने वाले पवन कुमार के बेटे शिव कुमार ने एक साल के भीतर इमारत को लेकर कई शिकायतें एमसीडी को दीं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई और हादसा हो गया।
शिव कुमार ने बताया कि 16 अगस्त को उसने एमसीडी से बिल्डिंग को खतरनाक घोषित कर उसे गिराने की गुहार लगाई थी। उसने यह मामला कई स्तर पर उठाया तो करीब 15 दिन पूर्व एमसीडी की टीम निरीक्षण करने पहुंची। इमारत की फोटोग्राफी की गई। बाद में अधिकारी कार्रवाई का आश्वासन देकर चले गए। इधर, उमेश और विमलेश ने बिल्डर धर्मेंद्र और सचिन से बिल्डिंग के एक ओर झुकने की शिकायत की, लेकिन उन्होंने हादसे की आशंका से ही इनकार कर दिया।
पहली मंजिल पर रहने वाला किराएदार डर की वजह से कुछ दिन पूर्व बिल्डिंग को खाली कर चला गया। इमारत के ठीक बराबर में शीशम का बड़ा पेड़ था। झुकने के बाद इमारत उससे टिक गई थी। अधिक बारिश और इमारत के बराबर में नाली बहने के कारण उसकी बुनियाद कमजोर होती जा रही थी। पिछले दिनों शीशम का पेड़ भी सूख गया और नतीजा यह हुआ कि बिल्डिंग बुधवार सुबह गिर गई। स्थानीय लोगों का यह भी कहना था कि पहली मंजिल से ही बिल्डिंग के छज्जों पर दीवार खड़ी कर उसके साइज को अवैध रूप से बड़ा किया गया था। इसकी वजह से बिल्डिंग पर भार बढ़ गया था और वह गिर गई।
एमसीडी ने झाड़ा पल्ला, कहा- कभी कोई शिकायत नहीं मिली
स्थानीय निवासी भले इस इमारत के खतरनाक होने की शिकायत एमसीडी को देने की बात कह रहे हैं, लेकिन उसने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। एमसीडी प्रवक्ता का कहना है कि उन्हें कभी बिल्डिंग के खतरनाक होने की न तो शिकायत मिली, न ही उसने बिल्डिंग को खतरनाक घोषित किया था।
एमसीडी प्रवक्ता ने बयान जारी कर कहा कि बिल्डिंग के गिरने की जानकारी सुबह कंट्रोल रूम को मिली। बचाव व राहत कार्य के साथ-साथ मलबा हटाने के लिए मशीनों के साथ एक टीम को घटनास्थल के लिए रवाना किया गया। केशवपुरम क्षेत्र के उपायुक्त भी घटनास्थल पर पहुंचे। प्रवक्ता के मुताबिक, इमारत का ढांचा 20-25 साल पुराना था और काफी कमजोर व खस्ताहाल था।
घटनास्थल पर निर्माण की गतिविधि या निर्माण सामग्री नहीं मिली। उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने अन्य विभागों से मिलकर बचाव अभियान चलाया। प्रवक्ता के अनुसार, निगम ने इस इमारत को खतरनाक घोषित नहीं किया था, न ही केशवपुरम भवन विभाग में इसे खतरनाक इमारत घोषित करने हेतु कोई आवेदन मिला। केशवपुरम जोन का गठन 1 सितंबर 2017 को हुआ था। दूसरी तरफ, स्थानीय लोगों का कहना है कि शिकायत की गई थी और 20 दिन पहले अधिकारियों ने इसका निरीक्षण किया था।