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Faridabad News: धौज में बनेगा वन्यजीव अनुसंधान केंद्र, अरावली संरक्षण को मिलेगी नई ताकत

Fri, 26 Jun 2026 12:18 AM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Fri, 26 Jun 2026 12:18 AM IST
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Wildlife Research Centre to be set up in Dhauj; Aravalli conservation to get a boost.
लंबे समय से अटकी परियोजना को मिली गति, घायल वन्यजीवों के उपचार और निगरानी की बेहतर होगी व्यवस्था
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अमर उजाला ब्यूरो
फरीदाबाद। अरावली क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरणीय निगरानी को मजबूत करने की दिशा में धौज गांव में वन्यजीव अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की प्रक्रिया फिर से शुरू हो गई है। कुछ प्रशासनिक और तकनीकी कारणों से यह परियोजना बीच में अटक गई थी लेकिन अब वन विभाग ने इसे आगे बढ़ाने की कार्रवाई शुरू कर दी है। यह केंद्र मांगर बानी और धौज क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण गतिविधियों को नई मजबूती देगा।

धौज और मांगर बानी क्षेत्र अरावली की उन चुनिंदा जगहों में शामिल हैं जहां आज भी समृद्ध जैव विविधता मौजूद है। यहां तेंदुआ, सियार, नीलगाय, जंगली बिल्ली, साही और कई दुर्लभ पक्षी प्रजातियां पाई जाती हैं। वन विभाग का मानना है कि अनुसंधान केंद्र बनने के बाद वन्यजीवों की निगरानी, संरक्षण और उपचार संबंधी कार्यों को अधिक व्यवस्थित तरीके से संचालित किया जा सकेगा।
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घायल वन्यजीवों को मिलेगा मौके पर उपचार

अब तक अरावली क्षेत्र में किसी वन्यजीव के घायल होने या रेस्क्यू किए जाने पर उसे उपचार के लिए दूसरे केंद्रों तक ले जाना पड़ता था। इससे उपचार में देरी होने की आशंका बनी रहती थी। नए केंद्र में विशेष एनिमल एनक्लोजर विकसित किया जाएगा, जहां घायल अथवा बीमार वन्यजीवों को सुरक्षित रखकर प्राथमिक उपचार दिया जा सकेगा। इससे वन्यजीवों को समय पर चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो सकेगी।
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संरक्षण गतिविधियों का बनेगा प्रमुख आधार केंद्र
वन्यजीव अनुसंधान केंद्र को क्षेत्र में संरक्षण गतिविधियों के संचालन के लिए महत्वपूर्ण आधार केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा। यहां से वन कर्मी नियमित निगरानी, गश्त और संरक्षण अभियानों का संचालन कर सकेंगे। इससे वन क्षेत्र में अवैध गतिविधियों पर नजर रखने और वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। डीएफओ झलकार उईके के अनुसार, केंद्र के माध्यम से वन्यजीवों की गतिविधियों का अध्ययन, उनके आवासों की निगरानी और जैव विविधता संरक्षण से जुड़े शोध कार्य भी किए जाएंगे। इससे अरावली क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बेहतर ढंग से समझने और संरक्षित करने में सहायता मिलेगी।
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