{"_id":"6ad900df8c7dc79af20fb039","slug":"use-of-forged-court-seals-in-fraud-is-a-direct-assault-on-public-trust-court-faridabad-news-c-26-1-fbd1023-83371-2026-10-21","type":"story","status":"publish","title_hn":"फर्जी अदालती मोहरों का ठगी में इस्तेमाल जनता के विश्वास पर सीधा हमला : कोर्ट","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
फर्जी अदालती मोहरों का ठगी में इस्तेमाल जनता के विश्वास पर सीधा हमला : कोर्ट
विज्ञापन
डिजिटल अरेस्ट कर 2.13 करोड़ की ठगी के आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। डिजिटल अरेस्ट के दौरान फर्जी अदालती आदेशों और मोहरों का इस्तेमाल न्याय प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास पर सीधा हमला है, जिसे किसी भी सूरत में सामान्य ठगी या साधारण साइबर अपराध नहीं माना जा सकता। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुरेंदर कुमार की अदालत ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी से डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 2.13 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी करने के मामले में यह टिप्पणी करते हुए आरोपी गौतम राजपूत की नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दी।
मामला साइबर थाना बल्लभगढ़ का है, जहां सीएजी से सेवानिवृत्त इंदर कुमार ने शिकायत दर्ज कराई थी। तीन सितंबर को उनकी पत्नी के पास फर्जी कॉल आई, जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाकर डराया गया। इसके बाद जालसाजों ने प्रवर्तन निदेशालय और अदालत के फर्जी आदेश व दस्तावेज भेजकर दंपती को डिजिटल अरेस्ट में रखा और 2.13 करोड़ रुपये ठग लिए गए। पुलिस ने अदालत को बताया कि ठगी की रकम में से 36.94 लाख रुपये एक बैंक खाते में पहुंचे थे। इसमें से 65,393 रुपये आगे आरोपी गौतम राजपूत निवासी लुधियाना के नाम पर खुले बैंक के खाते में ट्रांसफर हुए। आरोपी को चार सितंबर 2026 को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार, इसी बैंक खाते से संबंधित 2 अन्य शिकायतें भी दर्ज हैं।
सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख को बनाया फैसला का आधार
अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डिजिटल अरेस्ट के मामलों में ली गई स्वत संज्ञान याचिका का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि न्यायिक गरिमा, मोहरों और हस्ताक्षरों का इस तरह निर्भीकता से गलत इस्तेमाल करना कानून के शासन पर सीधा प्रहार है। अदालत ने कहा कि जब अपराधियों द्वारा न्यायपालिका के नाम का दुरुपयोग कर मासूम और बुजुर्ग लोगों की जिंदगीभर की जमापूंजी लूटी जा रही हो, तो ऐसे कृत्यों को सामान्य अपराध मानकर राहत नहीं दी जा सकती। इन कड़े तर्कों और आरोपी के खाते से जुड़ी अन्य शिकायतों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत देने से साफ इन्कार कर दिया।
विज्ञापन
विज्ञापन
संवाद न्यूज एजेंसी
फरीदाबाद। डिजिटल अरेस्ट के दौरान फर्जी अदालती आदेशों और मोहरों का इस्तेमाल न्याय प्रणाली के प्रति जनता के विश्वास पर सीधा हमला है, जिसे किसी भी सूरत में सामान्य ठगी या साधारण साइबर अपराध नहीं माना जा सकता। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सुरेंदर कुमार की अदालत ने नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी से डिजिटल अरेस्ट के नाम पर 2.13 करोड़ रुपये से अधिक की ठगी करने के मामले में यह टिप्पणी करते हुए आरोपी गौतम राजपूत की नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दी।
मामला साइबर थाना बल्लभगढ़ का है, जहां सीएजी से सेवानिवृत्त इंदर कुमार ने शिकायत दर्ज कराई थी। तीन सितंबर को उनकी पत्नी के पास फर्जी कॉल आई, जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप लगाकर डराया गया। इसके बाद जालसाजों ने प्रवर्तन निदेशालय और अदालत के फर्जी आदेश व दस्तावेज भेजकर दंपती को डिजिटल अरेस्ट में रखा और 2.13 करोड़ रुपये ठग लिए गए। पुलिस ने अदालत को बताया कि ठगी की रकम में से 36.94 लाख रुपये एक बैंक खाते में पहुंचे थे। इसमें से 65,393 रुपये आगे आरोपी गौतम राजपूत निवासी लुधियाना के नाम पर खुले बैंक के खाते में ट्रांसफर हुए। आरोपी को चार सितंबर 2026 को गिरफ्तार किया गया था। पुलिस के अनुसार, इसी बैंक खाते से संबंधित 2 अन्य शिकायतें भी दर्ज हैं।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख को बनाया फैसला का आधार
अदालत ने जमानत याचिका खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डिजिटल अरेस्ट के मामलों में ली गई स्वत संज्ञान याचिका का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि न्यायिक गरिमा, मोहरों और हस्ताक्षरों का इस तरह निर्भीकता से गलत इस्तेमाल करना कानून के शासन पर सीधा प्रहार है। अदालत ने कहा कि जब अपराधियों द्वारा न्यायपालिका के नाम का दुरुपयोग कर मासूम और बुजुर्ग लोगों की जिंदगीभर की जमापूंजी लूटी जा रही हो, तो ऐसे कृत्यों को सामान्य अपराध मानकर राहत नहीं दी जा सकती। इन कड़े तर्कों और आरोपी के खाते से जुड़ी अन्य शिकायतों को ध्यान में रखते हुए अदालत ने आरोपी को जमानत देने से साफ इन्कार कर दिया।
विज्ञापन